रोमिंग जर्नलिस्ट

शनिवार, 25 जून 2011

हाफीजा ने फाड़ डाले पाक डायरी के पन्ने

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 18

बेनजीर भुटïटो की मौत के बाद पाकिस्तान का सियासी पारा जितना चढ़ा उससे कम जम्मू-कश्मीर का भी राजनीतिक तापमान नहीं था। रियासत के हिंदी,अंग्रेजी,उर्दू अखबार बेनजीर की मौत की खबर से अंदर-बाहर रंगे हुए थे। आफिस में मीटिंग पहुंचने से पहले सभी अखबारों पर नजर डालने के साथ चाय की चुस्की लेने के दौरान दिमाग में और क्या खबरें इस इश्यू को लेकर की जा सकती है, इसको लेकर मंथन चल रहा था। चाय का आखिरी घूंट पीने के बाद पैसा देकर सिटी बस से विक्रम चौक दस मिनट में ही पहुंच गया। घड़ी की सुई दस बजने का इशारा कर रही थी, आधे घंटे का समय था। तवी नदी के किनारे पहुंच गया। तवी की अविरल धारा को देखकर हाफीजा मुज्जफ्फर से मिलने को लेकर सोचने लगा। तवी नदी के किनारे एक पत्थर पर बैठकर सोच-विचार में ढेरों आइडिया बनते-बिगड़ते रहे। मीटिंग का समय नजदीक आता देखकर बेमन से उठकर तवी के तट से आफिस के लिए चल दिया। आफिस में संपादक जी आने के बाद सबसे पहले सभी अखबारों की समीक्षा करने के साथ अमरउजाला की प्रस्तुति से खुश होने के साथ आज की प्लानिंग पर चर्चा में मशगूल हो गए। कौन क्या करेगा,यह सब तय होने के बाद मैं निकल पड़ा हाफीजा से मिलने। वूमेन कमीशन के दफ्तर पहुंचने पर पता चला कि अभी वह नहीं पहुंची है। फोन मिलाया तो पांच मिनट में दफ्तर पहुंचने की खबर मिली। दस मिनट के बाद काले रंग के सलवार सूट में हाफीजा का आगमन हुआ। दुआ-सलाम करने के साथ उनके कमरे की तरफ चल दिया। ‘...बहुत बुरा हुआ’ बेनजीर की मौत की खबर से गमगीन दिखी हाफीजा ने कहा कि जिस तरह से उनकी हत्या हुई,उसे देखकर तो मुझे लग रहा है, इसके पीछे सियासी हाथ जरूर होगा। लंदन में पढ़ी-लिखी हाफीजा से पूछा कि बेनजीर भुटटो से कभी मिली हैं? उन्होंने जवाब नहीं में देते हुए कहा कि ‘मगर उनके राजनीतिक संघर्ष से बखूबी वाकिफ हूं’। बेनजीर भुटटो की इंदिरा गांधी से तुलना करने वाली हाफीजा ने कहा पता नहीं क्यों मुझे लग रहा है कि इसके पीछे परवेज मुशर्रफ का भी कहीं न कहीं जरूर लिंक होगा। पाकिस्तान के सियासी हालात से शुरू हुई चर्चा आगे बढ़ते-बढ़ते हाफीजा के पाक दौरे की यादों से गुजरने लगी। बात उस समय की है जब देश के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए अटल जी जब खुद बस लेकर पाक गए थे तो प्रसिद्घ गांधीवादी निर्मलादेश पाण्डेय की अगुवाई में देशभर की महिलाओं का एक दल भी पाक गया था। इस दल में शामिल रही हाफीजा मुज्जफ्फर ने कहा कि पाकिस्तान भले ही हम दोस्ती का पैगाम लेकर गए थे, लेकिन वह दोस्ती लायक है नहीं। पाकिस्तान की चर्चा करते हुए हाफीजा ने यह भी बताया कि दूसरे दिन इस दल की मुलाकात परवेज मुशर्रफ से होना तय थी। परवेज मुर्शरफ आए तो तो वह अपनी मां के बारे में बाते करते हुए बोले कि वह जितना प्यार मुझे करती थी, उतना प्यार आज तक मुझे नसीब नहीं हुआ। मां के लाड़,प्यार,दुलार के किस्से के साथ भारत-पाकिस्तान में महिलाओं की साक्षरता पर चर्चा होने लगी तो मुशर्रफ मियां का मानना था कि औरतों के लिए तालीम बहुत जरूरी है।  जब तक तालीम नहीं मिलेगी तब तक उनके साथ होने वाले भेदभाव और जुल्म को रोका नहीं जा सकता है। सियासत में महिलाओं की भागीदारी की बात चली तो इंदिरागांधी का नाम लेते हुए उनकी काबिलियत पर चर्चा हुई, जब बेनजीर भुटटो का नाम मैने लिया तो परवेश मुशर्रफ के चेहरे पर घिनौनी कुटिल मुस्कान दिखी। बेनजीर की मौत की खबर के बाद परवेज मुशर्रफ का वहीं घिनौना चेहरा बार-बार दिमाग के परदे पर उभरकर आ जाता है। दिनेश तुमको बता रही हूं कि मुझे लग रहा है बेनजीर की मौत में परवेज मुशर्रफ का हाथ है। आज भले ही दुनिया में इस बात को कोई नहीं कह रहा है लेकिन तुम देख लेना वह दिन दूर नहीं जब लोग बेनजीर भुटटो की मौत के लिए इसको ही जिम्मेदार मानेंगे। हाफीजा ने अपनी बात की पुष्टिï के लिए पाकिस्तान दौरे के दौरान लिखी गई उस डायरी को भी दिखाया, जिसमे कई पन्नों पर परवेज मुशर्रफ से मुलाकात के साथ उनके हावभाव का जिक्र किया गया था। मैने उस डायरी को हाफीजा से देखने की गुजारिश की तो उन्होने बेहिचक डायरी मेरे हाथ में दे दी। उस डायरी पर परवेज मुशर्रफ के साथ लाहौर और रावलपिंडी के कुछ ऐसे बाजारों का भी जिक्र था, जिनके बारे में जानकर हर हिंदुस्तानी के कान खड़े हो जाएंगे। हाफीजा की पाक डायरी काफी रोचक लग रही थी। इस डायरी के साथ दिमाग में खबरों की खिचड़ी भी पकने लगी। सोचने लगा कि आखिर इस डायरी का उपयोग किस तरह किया जाए कि अमर उजाला के पहले पन्ने पर जगह मिले। दस मिनट तक डायरी के पन्ने पलटने के साथ दिमाग के मेमोरी कार्ड पर उसको कापी करने का काम भी चलता रहा। पाक डायरी के आखिरी पन्ने को पलटते हुए मैने कहा कि यह तो मुशर्रफ से आपके मुलाकात की यादगार चीज है। यह सुनते ही हाफीजा बोली दिनेश मुझे उस आदमी से नफरत हो गयी है, साथ ही इस डायरी से भी। जी में आता है इसको जला दें। हाफीजा की यह डायलाग सुनकर मेरा दिल इस बात को लेकर खुश हो गया कि बेटा दिनेश जो स्टोरी दिमाग में सोची, उसी दिशा में यह खुद चल रही है। दिल अंदर से भले ही हंस रहा था लेकिन चेहरे पर मातमी भाव पसरा हुआ था। मातमी भाव के बीच एक मिन्नत करते हुए मैने कहा कि अगर आप इस डायरी के पन्ने फाड़ दें तो एक बड़ी खबर मेरे लिए बन जाएगी। हाफीजा बोली मैं तो इस डायरी को ही आग में जला देना चाहती हूं। मैने कहा कि डायरी के पन्ने ही फाडऩा काफी होगा। एक पन्ना खुद फाड़ते हुए उन्होने कहा प्लीज तुम मेरी मदद करो। मैं पाक डायरी के पन्ने फाडऩे में जुट गया। इसके पीछे का मकसद केवल यह था कि दूसरा अखबार वाला आकर इन पन्नों की खोजबीन ना करे। पाक डायरी के पन्नों को फाडऩे के बाद कश्मीरी चाय की चुस्की लेकर वहां से चल दिया। दिमाग में खबर के साथ हेडिंग भी पक गयी थी। हाफीजा ने फाड़ डाले पाक डायरी के पन्ने! यह खबर अमर उजाला के सभी संस्करणों में बेनजीर भट्ïटो की मौत के दूसरे दिन प्रमुखता से छपी। इस खबर को पढक़र जम्मू-कश्मीर के तमाम अखबारों के नुमाइंदे फोन करने लगे कि भाई पाक डायरी के पन्नों में और क्या-क्या था? जवाब था जनाब याद नहीं है, जितना याद है अमर उजाला के पहले पेज पर छपा है पढ़ लिजिए। इस खबर से हुई खुशी को शेयर करने के लिए तवी मइया के पास शाम को पहुंचा, दिल खोलकर हंसते हुए सोचा लाहौर व रावलपिड़ी के बाजार में सूट खरीदने गई हाफीजा ने क्या देखा था जो डायरी में लिखा, उसकी खबर कल लिखेंगे।
क्रमश:

बुधवार, 22 जून 2011

सर्द सरहद पर सदमे के बीच सनसनी

 

सन् 2007 का दिसंबर का महीना था। सर्दी से आदमी हो या जानवर सब परेशान थे। सडक़ों पर आवाजाही कम थी तो सरकारी दफ्तरों में भीड़ नहीं के बराबर थी। जम्मू में पचास दिन से ऊपर हो चुके थे। घर-परिवार के साथ दोस्तों की याद भी सता रही थी। बनारसी ठंडई का भी मोह जाग गया था। तारीख 27 दिसंबर थी, सर्दी के कारण कुछ देर घूमने-फिरने के बाद आफिस में आकर नेट पर कुछ जानकारी बटोरने में जुटा था। कब शाम हो गई पता ही नहीं चला। संपादक  प्रमोद भारद्वाज ने आफिस आने के बाद कमरे में लगे टीवी पर न्यूज चैनल को स्टार्ट कर दिए थे। अचानक वह अपने कमरे से माइ गाड कहते हुए निकले। आफिस में बैठे लोग उनसे कुछ पूछते इससे पहले बेनजीर भुटटो की आत्मघाती हमले में मौत की खबर देते हुए पूरी रियासत के सभी रिपोर्टरों को एलर्ट जारी करने के लिए कहा। बेनजीर भुटटों की मौत की खबर तब तक नोएडा में बैठे समूह संपादक शशि शेखर के संज्ञान में आ गयी थी। उन्होंने फोन करके प्रमोद जी को इसको लेकर एलर्ट करने के साथ कुछ आइडिया भी दिए। सर्द मौसम में आफिस के भीतर सदमे भरी सनसनी फैल गयी थी। बेनजीर भुट्टïों की मौत को लेकर राजनैतिक दल, महिला संगठनों की प्रतिक्रिया के साथ महिला राजनीतिज्ञों से भी बातचीत के साथ और क्या-क्या किया जाए, यह सवाल खड़ा होने पर पाकिस्तान से भारत में शादी के बाद आई लड़कियों से बातचीत करने का सुझाव दिया। संपादक जी ने इसके लिए सभी जिला मुख्यालयों पर तैनात रिपोर्टरों से ऐसी लड़कियों से बातचीत करके खबर भेजने के लिए फोन करने को कहा। किसी का फोन स्विच आफ मिला तो कोई रात के नाम पर कन्नी काटने में लग गया। सूर्य अस्त होने के बाद अपने काम-धंधे में मस्त हो जाने वाले रियासत के अधिकांश रिपोर्टरों की इस आदत से मैं पहले ही वाकिफ हो चुका था। बेनजीर की मौत के बाद देश-दुनिया में हो रही प्रतिक्रिया के साथ जम्मू-कश्मीर में हाई एलर्ट के साथ कुछ लीक से हटकर खबरों को लेकर  माथापच्ची के साथ एक घंटे की फोन पर हुई मशक्कत का परिणाम शून्य देखकर निराशा हुई। संपादक जी भी अपनी कोफ्त छिपा नहीं पा रहे थे। यूपी-बिहार में खबरों को लेकर रिपोर्टरों के जूझने की ताकत से वाकिफ प्रमोद जी ने कहा कि दिनेश अब तुम देखो क्या इसमें किया जा सकता है। पाकिस्तान से भारत में शादी के बाद आयी बेटियों से बातचीत का आइडिया भी मेरा ही था,इसलिए मैं खुद जुटा। अमर उजाला की पुरानी फाइल खंगालने पर आरएसपुरा में ऐसी एक लडक़ी का पता चला। धूल भरी अखबार की फाइलों को खंगालने के दौरान ऐसी तीन लड़कियों का पता चलने के बाद उनके या उनके घर वालों की प्रतिक्रिया जानने के लिए दो महीने के दौरान जो जनसंपर्क कमाया था, वह काम आया। बालदिवस के एक दिन पहले आरएसपुरा सेक्टर के पास पाक बार्डर जाने के दौरान सेना के जिन जवानों से दोस्ती हुई थी उनमे राजस्थान के साथ यूपी के भी कुछ थे। मोबाइल नंबर पास में ही था। कानपुर के रहने वाले सेना के एक जवान कुलदीप को फोन लगाया तो पता चला कि वह श्रीनगर में पहुंच गया है। बेनजीर भुट्ïटो की मौत की खबर से वाकिफ हो चुके कुलदीप को फोन करने का मकसद बताया तो बोला जहां मैं तैनात हूं, वह सज्जाद मियां का मकान है, उनके घर कुछ पाकिस्तानी मेहमान आए हैं। उनसे बात करा सकता हूं। पाकिस्तान से आए गुलाम रसूल जब फोन पर आए तो सिर्फ इतना कहा कि जनाब हम क्या बताएं अल्ला जाने पता नहीं कौन-कौन सा दिन इस मुल्क को देखने होंगे? गुलाम रसूल के बाद जेहन में जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी हाफीजा मुज्जफ्फर का नाम आया तो उनको भी फोन लगाया। वह बोली पाकिस्तान से एक..दो नहीं सैकड़ों बेटियां रियासत में आयी हैं और यहां की सैकड़ों बेटियां पाकिस्तान में भी गयी है। बेनजीर की मौत से खुद सदमे में आ गयी हाफीजा ने पाकिस्तान सरकार को कोसने के साथ ऐसा करने वालों को इस्लाम का कटटर दुश्मन व वहशी तक ठहराने से गुरेज नहीं किया। पाकिस्तान से आयी बेटियों के घर का फोन नंबर देने में असहाय दिखी हाफीजा ने कहा कि कल आफिस आइएगा फिर बात करेंगे, इस मसले पर। डोडा,किश्तवाड़, रियासी जैसे छोटे-छोटे बाजारों में बेनजीर की मौत के खबर के बाद चाय-पान की दुकानों पर पाकिस्तान के हालात को लेकर हो रही चर्चा का इनपुट आता रहा। जम्मू दफ्तर में बैठकर पाकिस्तान से आयी बेटियों की टोह में जुटा रहा। रियासी में एक परिवार के बारे में पता चलने के साथ फोन नंबर  िट्राई करना प्रारंभ किया तो दिस रुट इज बिजी, दिस नंबर नाट वैलिड सहित कई रिकार्डेड जुमले सुनने के बाद आखिरकार बीएसएनएल का नंबर लग गया। परिचय देने के बाद जब हिंदुस्तान की बहू बनी पाकिस्तान की बेटियों से बातचीत  के मकसद से फोन करने की बात बताई तो कयूम मियां ने कहा कि मेरी बहू शबाना इस घटना के बाद गुस्से से लाल है। उसका गुस्सा जायज भी है। दोनों मुल्कों के माहौल में ऐसी घटनाओं का जो असर पड़ता है, उससे ज्यादा तो बहू-बेटियों के रिश्तों की डोर पर फर्क पड़ता है। रात के नौ बज गए थे,लेकिन पाकिस्तान की बेटियों की तलाश में फोन पर फोन करके खोजबीन का मिशन जारी था। रात दस बजे तक दो और पाकिस्तान बेटियां मिल गयी। कोई गुस्से में लाल थी तो कोई खौफजदा। सर्द सरहद पर सदमे के बीच फैली सनसनी में सिसकती सांसों की कहानी पर खबर तैयार हो गयी। कुर्बानी पर बरस पड़ी सांझी बेटियां। बेनजीर की मौत के बाद जम्मू-कश्मीर में हाई एलर्ट के साथ इस खबर को भी पहले पेज पर जगह मिली। आफिस में काम खत्म करके निकलते-निकलते रात के डेढ़ बजे गए थे। सर्द सरहद पर सख्ती का कड़ा पहरा दिखा। आफिस से घर पहुंचने तक रास्ते में कई जगह चेकिंग हुई। घर पहुंचने के बाद हाथ-मुंह धोकर बिस्तर पर आने के बाद सोचने लगा कि हाफीजा ने कल किसलिए बुलाया है?
क्रमश:

सोमवार, 13 जून 2011

हया के डर से हिना बनी आतंकी हथियार

जम्मू यूनिवर्सिटी में एलएलबी की छात्रा नाहिदा राकेट लांचर और आरडीएक्स लेकर जब कश्मीर से जम्मू आ रही थी तो उसको सेना ने तलाशी के दौरान पकड़ लिया। नाहिदा को पकड़े जाने के बाद जम्मू यूनिवसिर्टी के उन लडक़े-लड़कियों पर सेना की खास निगाह हो गयी थी जो कश्मीर से पढऩे आते थे। नाहिदा के पकड़े जाने की खबर सभी अखबारों में पहले पन्ने पर छपी। वहां के पत्रकारों के लिए यह खबर रुटीन खबर जैसी थी, लेकिन मेरे मन-मस्तिष्क में नाहिदा छायी थी। नाहिदा वाकई में आतंकी संगठनों से मिली है या आखिर कौन सी मजबूरी है जो वह यह काम कर रही थी? ऐसे कई सवाल नाहिदा की खबर के तह में जाने के लिए मजबूर कर रहे थे। इस खबर के छपने के दूसरे दिन पहुंच गया जम्मू यूनिवर्सिटी के विधि विभाग में नाहिदा का एजुकेशन बैकग्राउंड पता करने। काफी पापड़ बेलने के बाद खैर पता चला कि नाहिदा पढऩे में बहुत मेधावी थी। उसकी दो सहेलियों से मिला तो पता चला कि नाहिदा हमेशा सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस का ख्वाब बुना करती थी। पिछले एक महीने से वह काफी गुमसुम सी हो गयी थी, उसकी चहक पता नहीं कहां गायब हो गयी थी। नाहिदा के बारे में जितनी जानकारी मिली वह एक खबर के लिए पर्याप्त कही जा सकती थी, लेकिन दिल संतुष्टï नहीं हुआ। जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी हाफीजा मुज्जफ्फर ने बताया था कि जब कोई महिला आतंकी पकड़ी जाती है संयुक्त पूछताछ जब होती है तो उसमे उनको या किसी प्रतिनिधि को भी जाना होता है। पिछले दिनों हाफीजा से हुई मुलाकात में यह जानकारी मिली थी। जम्मू-यूनिवर्सिटी से विक्रम चौक की तरफ पैदल चलते ही हाफीजा को फोन लगा दिया। फोन उठाते ही हाफीजा की आवाज गूंजी हैलो मिस्टर जर्नलिस्ट.. हाउ आर यू। मैं ठीक हूं मैडम, आप कैसी हैं? मैं भी ठीक हूं, कैसे याद किया? नाहिदा की खबर की चर्चा करते हुए कहा कि वह तो बहुत मेधावी लडक़ी थी, ऐसे काम कैसे कर सकती है, यह किसी को समझ में नहीं आ रहा है। जम्मू यूनिवर्सिटी के विधि विभाग में कई घंटें की मेहनत के बाद मिली जानकारी जब हाफीजा को दी तो वह चौंक गयी। बोली आज पूछताछ के दौरान सेंट्रल इंट्रोगेशन सेंटर गयी थी, नाहिदा के आंतकी हथियार बनने की कहानी बहुत चौंकाने वाली है। हाफीजा को फोन करने के पीछे का मकसद पूरा होता दिख रहा था। मैने कहा मैडम अगर आपके पास समय हो तो मैं आपके आफिस आ जाऊं । अभी तो रास्ते में हंू, आधे घंटे बाद मैं आफिस पहुंच जाऊंगी। ओके मैडम, मैं आपकी कश्मीरी चाय पीने आता हूं। बात करते-करते विक्रम चौक पहुंच गया था। साइकिल पर पावभाजी की दुकान लगाने वाले पंडित जी मिल गए। पांच रुपए में मक्खन की टिक्की के साथ छोला-मटर की जो पावभाजी वह बनाते थे, एक खा लेने के बाद पेट में पर्याप्त ईंधन महसूस होने लगा। नाहिदा की पूरी कहानी जानने के लिए फिर चल दिया जम्मू कश्मीर वूमेन कमीशन के दफ्तर। आधे घंटे में पहुंच गया। हाफीजा मुज्जफ्फर आ चुकी थी। देखते ही बोली आइए जनाब, कैसे आपके मिजाज है? मैं बोला आपको यहां देखकर ठीक हूं। मेज पर चाभी भरने वाली घंटी घुमाकर बजाया तो चपरासी आ गया। चाय पिलाइए मियां। चाय का हुक्म देने के बाद बातचीत शुरू हुई। नाहिदा के सहेलियों से बातचीत प्रारंभ हुई, उसके सपने, उसकी पढ़ाई का जेयू से मिला रिकार्ड दिखाया तो वह चौंकते हुए बोली लडक़ी पढऩे वाली थी, लेकिन क्या करें बेचारी? मैने कहा समझ में नहीं आया नाहिदा की मजबूरी, ऐसी कौन सी मजबूरी थी जो उसको राकेट लांचर और आरडीएक्स के लिए कैरिएर बनने को मजबूर करे। कुछ न कुछ मजबूरी रही होगी, तभी तो इतनी पढ़ी-लिखी लडक़ी ने यह काम किया। आखिर कौन सी मजबूरी रही होगी? काफी कुरेदने के साथ आफ द रिकार्ड बातचीत रखने पर हाफीजा पूरी कहानी बताने को राजी हुई। मान-मनौव्वल के दौरान कश्मीरी चाय आ चुकी थी। चाय की एक चुस्की लेने के बाद हाफीजा बोली, सेंट्रल इंट्रोगेशन सेंटर जाने पर उसका हुलिया देखकर मैं खुद परेशान हो गयी। कश्मीर की हूर दिखने वाली नाहिदा पूछताछ के दौरान हद से अधिक डरी और सहमी थी। वहां पर दर्जनभर से ज्यादा विभिन्न जांच एजेंसियों के अधिकारियों के बीच तीन महिला कांस्टेबिल किनारे तमाशबीन बनकर खड़ी थी। कोई पूछ रहा था लश्कर-ए-तोयबा से कैसे जुड़ी हो?, पाकिस्तान ट्रेनिंग के लिए गयी हो क्या? ऐसे कई चुभने वाले सवालों के बीच नाहिदा का हाल देखकर मुझे उस पर तरस आ गया। मैने अधिकारियों से कुछ देर के लिए उसको अकेला छोडऩे को कहा। नाहिदा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि बेटी तुम घबड़ाओ मत। तुम मुझे अपनी मां समझकर सब बताओ। मां का नाम सुनकर मेरी ओर जब नाहिदा मुखातिब हुई तो उसके चेहरे पर जम गए आंसुओं को पोछते हुए कहा बताओ बेटी तुमको न्याय मिलेगा, अगर तुमने कोई गलती नहीं की होगी तो रियासत की सरकार भी तुम्हारी मदद करेगी। चाय का आखिरी घूट पीते हुए हाफीजा ने बताया कि दस मिनट तक ढांढ़स देने के बाद नाहिदा ने रोते हुए जुबान खोली। बताया दो महीने पहले हमारे गांव(डोडा के नजदीक) में कुछ चरमपंथी आए, रात का समय था। मैं उस वक्त खाना पका रही थी, मां की तबियत खराब थी, उसको कमरे में बंद कर दिया। खाना खाने के बाद उन सबने मेरे साथ रेप किया। मेरी अश्लील फोटो बंदूक की नोक पर खींची। मेरे मुंह में एके-47 की नोंक डालकर कई तरह से फोटो खींचने के बाद दिखाया और कहा कि अगर कुछ बोलोगी तो तुम्हारी पिक्चर पूरे गांव के साथ जम्मू यूनिवर्सिटी में लगवा दी जाएगी। कहीं की नहीं रहोगी। मैं उनके जाने के बाद बहुत रोई। मां को सारी बात बतायी। मां ने कहा कि बेटी हम लोगों की किस्मत में यहीं सब लिखा है। एक महीने बाद उनमे से एक मुझे घर में एक खत दे गया। इस खत में लिखा था कि जम्मू एक सामान ले जाना है, इसको जम्मू पहुंचा देना, अगर यह काम नहीं करोगी तो तुम्हारी फोटो पूरे रियासत में बांट दी जाएगी। उसकी यह धमकी सुनकर बहुत घबड़ा गई, समझ में नहीं आ रहा था क्या करे। एक तरफ हया दूसरी तरफ आतंकी हथियार बनने की मजबूरी। आखिर में मैने इस पार्सल को जम्मू पहुंचाने का फैसला किया और रास्ते में पकड़ी गयी। रोते-रोते हुए नाहिदा ने पूरी आपबीती सुनाते हुए कहा कि दीदी मैं लश्कर-ए-तोयबा की आतंकवादी नहीं हूं। प्लीज दीदी मुझे बचा लीजिए। नाहिदा की आपबीती हाफीजा के मुंहजुबानी सुनने के बाद वहां से चल दिया। रास्ते में सोचने लगा कि आखिरी स्टोरी क्या बनाया जाए। हाफीजा से आफ द रिकार्ड बातचीत का टेप भले ही मेरे जेब में मौजूद मोबाइल में रिकार्डेड था, लेकिन क्या स्टोरी बनाए? यही सब सोच-विचार करते हुए मैं आफिस पहुंच गया। आफिस में कम्प्यूटर के सामने बैठने के बाद काफी सोचने के बाद स्टोरी बनायी ‘हया की डर से आतंकी हथियार बन गई हिना।’ इसमें काल्पनिक नाम ‘हिना’ से नाहिदा की आपबीती बताते हुए खबर बनायी। आखिर में जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी की सचिव को भी बयान के लिए राजी करते हुए उनका भी जिक्र किया। उनका बयान था ऐसे मामले आयोग के संज्ञान में आए हैं, इन पर आगे कार्रवाई की जाएगी। स्टोरी संपादक जी को दिखाने के साथ पूरी बात बतायी। वह स्टोरी पढऩे के बाद अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि कश्मीर में तमाम लड़कियों के साथ आतंकवादियों का यह सलूक वहां के कट्ïटरपंथियों को नहीं दिखाई देता। सब साले अंधे हैं। खैर खबर संवेदनशील थी, नोएडा में समूह संपादक शशिशेखर के ध्यानार्थ भेजी गयी। खबर के बारे में देररात को नोएडा से जानकारी मिली कि बास ने खबर को न छापने को कहा है। बास इज आलवेज राइट का जुमला आज भी याद है, लेकिन इतनी शिद्ïदत के साथ बनाई गई खबर न छपने की बात पता चली तो मूड आफ हो गया। रुटीन का काम निपटाकर गांधीनगर की ओर रात में जब चला तो रास्ते में इस खबर की चर्चा छिड़ गयी। समूह संपादक जी के प्रति शब्दों से कितना गुस्सा उतारा इसको लिखूंगा तो मामला अंससदीय हो जाएगा। रात में अपनी स्टोरी की खुशरंग नहीं बदनसीब हिना याद आती रही, इसी सोच-विचार में सो गया। सबेरे समूह संपादक का एक संदेश मेरे लिए जम्मू के संपादक के पास था। मीटिंग के बाद संपादक जी ने कहा कि बिग बास ने कहा है दिनेश से कह दो ज्यादा जेहादी न बने, उतना ही बने, जिससे अमर उजाला भी सुरक्षित रहे और वह खुद भी। बिग बास का यह संदेश सुनने के बाद उनको दिल से धन्यवाद बोलते हुए फिर खबर की खोज में निकल पड़ा।
क्रमश:

शुक्रवार, 10 जून 2011

अ से आतंकी, ब से बंदूक, स माने सेना

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 15...
बात सन् 2007 की है। नवंबर का दूसरा सप्ताह शुरू होने के साथ ही जम्मू का जाड़ा जानलेवा हो गया था। आफिस में तो बड़े-बड़े हीटर लगे थे,लेकिन बाहर निकलने पर ठिठुरन से हालत खराब हो जाती थी। इस धंधे में अपने शौक के कारण आया था सो मुसीबत मुंहमांगी ही थी। सर्द सुबह में रजाई छोडऩे में आलस बहुत महसूस होता था फिर भी छोडऩी पड़ती थी। जम्मू की सर्दी को नजदीक से महसूस करने के साथ सबसे बुरा उस समय लगता है जब बादल का कोई टुकड़ा अचानक बरस का चला जाता है। अगर आप सडक़ पर है तो सिर छुपाने तक की जगह पहुंचते-पहुंचते ही ऊनी कपड़े तरबतर हो जाते हैं । ऐसे कई अनुभवों से यहां आने के बाद गुजर चुका था। रजाई छोडऩे के बाद आफिस जाने के लिए बाहर निकला तो फिर बूंदाबांदी स्टार्ट हो गयी थी। भीगते हुए गांधीनगर के बस स्टैंड मोड़ तक पहुंचा। लेदर जैकेट के साथ पैंट भी भीग गया था,लेकिन चाय पीकर आफिस के लिए निकल पड़ा। आफिस में गार्ड व बंटी सरदार मिल गए। भीगते हुए आते देखकर बोले सर आप भीगते हुए आ गए। रद्ïदी अखबार से हाथ-मुंह पोछने के बाद बंटी को चाय के लिए आर्डर दिया। बंटी के साथ चाय की चुस्की लेते हुए इधर-उधर की बात करने के साथ अखबार की फाइल पलटने के दौरान एक छोटी सी खबर दिखी। रियासत में बाल दिवस पर स्टेडियम में होने वाले सालाना कार्यक्रमों की तैयारियों को लेकर बैठक की सिंगल कालम खबर थी। संपादक को मीटिंग में एक खबर का आइडिया देने के लिए दिमाग अब दौडऩे लगा। बाल दिवस पर क्या खबर की जाए? जो थोड़ा अलग हो। चाय की चुस्की संग दिमाग में आइडिया के घोड़े दौडऩे लगे थे। होटल में जूठे बर्तन धोते बच्चों और कारखानों में काम करने बच्चों को लेकर इस धंधे में आने के बाद कई रिपोर्ट करने का मौका मिला,लेकिन यहां आकर क्या अलग किया जाए? कुछ अलग करने का कीड़ा दिमाग में एक कोने से दूसरे कोने में कुलबुलाते हुए दौड़ लगा रहा था। दिमागी कीड़ा अभी दौड़ ही रहा था कि अचानक संपादक जी भी रेनकोट पहनकर आते दिखे। मुझे भीगा देखकर बोले एक रेनकोट या छाता भी खरीद लो। जम्मू में बड़ी कड़ी सर्दी पड़ती है, कब अचानक पानी बरसने लगे कहां नहीं जा सकता है। यूपी नहीं है कि भीगते हुए लोगों को छत का सहारा बेहिचक दे देते हैं। यहां अगर कोई दरवाजे के बाहर खड़ा होता है तो संदेह की नजर से देखा जाता है। तुम आज ही जाकर रघुनाथ मार्केट में छाता या रेनकोट ले लेना। दस मिनट बाद मीटिंग स्टार्ट हुई। मीटिंग को पहला एजेंडा मौसम को लेकर था। जम्मू विश्वविद्यालय के साथ आर्ट एंड कल्चर व मौसम बीट कवर करने वाले संजीव पंगोत्रा ने इसकी जिम्मेदारी संभाली। उसके बाद एक-एक रिपोर्टर से आज क्या करेंगे? का सवाल उछलने लगा। मेरे नंबर आने से पहले पांच लोगों को इस सवाल का सामना करना था। कौन क्या जवाब दे रहा है, यह अपने दिमाग के पल्ले नहीं पड़ रहा था, क्योंकि आइडिया का कीड़ा अभी मेरे दिमाग में चक्रमण कर रहा था। अचानक जेहन में फ्लैश बैक की बिजली कौंधी। अपने को हाथ में तख्ती,पीठ पर बस्ता लादे उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के गांधीनगर में मौजूद प्राइमरी पाठशाला की ओर बढ़ते पाया। पिता जी राजकीय इंटर कालेज बस्ती में गणित पढ़ाते थे, इसलिए अपने स्कूल से नजदीक इसी पाठशाला में नाम लिखवाया था। मैं अपने छोटे भाई के साथ पिता जी के साथ इसी स्कूल में जाता था, वहां का समय याद आ गया जब तख्ती पर लिखने के बाद क से कबूतर, ख से खरगोश, ग से गमला पढ़ता था। फ्लैश बैक तब ब्रेक हो गया जब संपादक जी ने कहा कि दिनेश जी कहां खो गए हैं? हड़बड़ाकर कहा कहीं नहीं सर। आज क्या स्टोरी करेंगे? सर आज मैं भारत-पाकिस्तान सरहद पर मौजूद गांवों में जाऊंगा। वहां जाकर देखना चाहता हूं कि वहां के बच्चों के दिमाग में समाज कौन से ककहरा पढ़ा रहा है? प्राइमरी की किताब में क से कबूतर नहीं तो कमल पढ़ाया जाता होगा लेकिन बच्चों के दिमाग में कौन सा ककहरा चल रहा है? इस पर रिपोर्ट करेंगे। संपादक जी को आइडिया पसंद आया। मीटिंग खत्म होने के बाद इस खबर के लिए जम्मू से सबसे नजदीक सरहद के किस गांव में जाए, इसकी टोह लेने में जुट गया। आरएसपुरा सरहद के नजदीक है। यह जानकारी मिली तो चल दिया बस से आरएसपुरा को। एक घंटे के सफर के बाद आरएसपुरा से सक्तेशवरगढ़ के लिए टेंपो में सवार होकर चला तो रास्ते कारगिल शहीद जवानों के नाम पर बने गांवों के मुख्यद्वार देखकर दिल श्रद्घा से भरता गया। हर दूसरे गांव में दो-तीन शहीद परिवार मिले। सक्तेशवरगढ़ पहुंचा तो संयोग से स्कूल में छुट्ïटी नहीं हुई थी, वहां पहुंचने के बाद सबसे पहले मास्टर साहब के पास पहुंचकर परिचय दिया। नाम दिनेश चंद्र मिश्र, अमर उजाला में पत्रकार हूं, काशी से आया हूं। काशी का नाम सुनते ही मास्टर साहब बहुत खुश हुए। ऐसा लगा जैसे उनके सामने काशी का कोई बड़ा पंडित आया हो। कुर्सी छोडक़र खड़े होने बाद बैठने का आग्रह करने लगे। बगल में पड़ी लकड़ी की कुर्सी खींचकर बैठने के बाद काशी की गलियों से लेकर गंगा मइया तक का कुशलक्षेम बताने के बाद मैं अपनी खबर की दिशा में वाक्ï मार्ग पर उनको लेकर चल निकला। पंद्रह मिनट बाद स्कूल में छुट्ïटी की घंटी बजी तो आधा दर्जन बच्चों के नाम लेकर अपने पास बुलाया। जिन बच्चों को अपने पास बुलाया उनके समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर क्यों बुलाया जा रहा है। मास्टर साहब ने बच्चों को मेरा परिचय कराया। उसके बाद बच्चों से मुखातिब होकर सरहद के हालात पर चर्चा करने के बाद जब पता किया उनके जेहन में कौन सा ककहरा चल रहा है, तो मालूम हुआ अ से आतंकी, ब से बंदूक, स माने सेना। इस ककहरा की जानकारी होने के बाद वहां से गुरुजी को प्रणाम करके चल दिया। आरएसपुरा से जम्मू आने तक छह बज गए थे। संपादक जी भी आ गए थे। दिनभर के दौरे के बाद निकली खबर को बताया तो वह सबेरे की मीटिंग से ज्यादा खुश हुए। आधे घंटे के अंदर खबर फाइल होने के बाद प्रिंट दिया तो उसको पढऩे के बाद उन्होंने सभी संस्करणों में भेजने के लिए कह दिया। अ से आतंकी, ब से बंदर और स माने सेना। यह खबर अमर उजाला के सभी संस्करणों में बेहतर तरीके से परोसी गयी। दूसरे दिन यह ककहरा तमाम दोस्तो को पसंद आया। कुछ ने एसएमएस तो कुछ फोन से बधाई दिए। सबसे ज्यादा खुशी तब हुई जब आरएसपुरा के जिस स्कूल में गया था वहां से एक ग्रामीण का फोन आया, उसने कहा कि हमारा बच्चा आपसे बात करना चाहता है। फोन पर हैलो किया तो उधर से आवाज आयी अंकल नमस्ते, मेरा नाम विक्रम है। आपने मेरी जो खबर छापी है, पापा ने पढक़र सुनायी। मास्टर साहब ने स्कूल में सबको सुनायी। हमको अच्छा लगा, इसलिए पापा से कहा कि अंकल को थैंक्स बोलना है। मासूम बच्चे के प्रति प्यार उमड़ पड़ा, सोचने लगा कि इन मासूमों को समाज कौन दिशा दे रहा है? जिन बच्चों के कंधों पर देश का भविष्य टिका है, यह ककहरा अगर उनके दिमाग में बैठ रहा है तो आगे उनका भविष्य क्या होगा?

सोमवार, 6 जून 2011

इतिहास चीरकर लिखेगा एक चिनार अपना नाम

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 14
लंदन में पढ़ी लिखी हाफीजा मुज्जफ्फर को फिरदौस के साथ आतंकवादियों द्वारा की गयी जुल्म-ज्यादती का मामला सौंपने के बाद दिल में बहुत सुकून मिला। जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन के दफ्तर से लौटते हुए विक्रम चौक से पहले ही रघुनाथ मंदिर के पास उतर गया। पता नहीं दिल क्यों किया आज फिर रघुनाथ मंदिर में भगवान का दर्शन किया जाए। मंदिर में दर्शन करने गया तो गाजीपुर वाले अजब सिंह यादव बाहर ही टकरा गए। मुझे देखते ही उनकी आंखों में आज वही चमक दिखाई पड़ी, जो पहले पहल इसी मंदिर में मिलने पर उनका नाम पढऩे के बाद मुझे महसूस हुई थी। ..आइए गुरु जी! गुरु सुनकर बनारसीपन का ऐसा अहसास हुआ कि मजा आ गया। हाथ मिलाने के बाद मंदिर में दर्शन करने से पहले चाय पीने की गुजारिश को विनम्रता पूर्वक कुछ देर के लिए स्थगित करके अंदर चला गया। दर्शन करके बाहर लौटा तो मंदिर के सामने मौजूद एक चाय की दुकान पर ले गए। चाय का आर्डर देने के बाद बोले गुरु जी आप से बातचीत के बाद दूसरे दिन जब गाजीपुर में गांव के साथ अन्य जानने वालों ने फोन करके बधाई दी तो मामला समझ में नहीं आया। शाम को जब आसमान में चांद दिखाई देने के बाद पत्नी को फोन किया तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बोली आज आपका नाम अमर उजाला में निकला है। गांव भर में आपकी चर्चा के साथ मेरी भी करवाचौथ से जुड़ी खबर होने के कारण हो रही है। मैने गुरु जी पत्नी को करवाचौथ की शुभकामना दी, लेकिन आपने जो खबर लिखी थी उसे पढक़र उसका दिल पहले ही बाग-बाग हो चुका था। गुरु जी मजा आ गया। अजब सिंह मेरी तारीफ में पुल बांध रहे थे, लेकिन मैं अपनी पत्नी का उस खबर के बारे में फोन पर मिले कमेंट्ïस को याद करने लगा। करवाचौथ के दिन ही अमर उजाला के कई संस्करणों में छपी इस रिपोर्ट को पढक़र पत्नी ने कहा कभी पत्रकारों की पत्नियों की पीड़ा पर भी खबर बनाइए। जेहन में आयी इस बात को जुबान तक न लाकर अजब भाई की दास्तान सुनता रहा। चाय का कप हाथ में आ गया था बोला भाई अपना काम खबर लिखना। यह संयोग की बात है आप अपने इलाके के ही निकल आए। चाय पीने के बाद अजब सिंह यादव से विदा लेकर आफिस के लिए चल दिया। जम्मू कश्मीर वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी हाफीजा मुज्जफर से मिलने के बाद जेब में खबरों की कमी नहीं थी, लेकिन अपने पास खबरें और भी थी। लखनऊ के रहने वाले भारतीय वन सेना के आरसी शर्मा से मिलने के बाद जो खबरें मिली थी, उसमें एक खबर काफी रोचक थी। वह थी चिनार के पेड़ के  बारे में। कश्मीर स्थित दुनिया के सबसे पुराने चिनार के पेड़ को ऐतिहासिक धरोहर बनाने की दिशा में वन विभाग द्वारा कदम उठाने के लिए क्या प्रस्ताव बनाया जा रहा है। इस पर चर्चा हुई थी। देश के सबसे पुराने चिनार के पेड़ पर रिपोर्ट बनाने का प्लान बनाया। बडग़ाम जिले के छत्तरगाम गांव में स्थित चिनार के एक विशाल पेड़ को दुनिया का सबसे पुराना चिनार होने का गौरव हासिल है । गांव में स्थानीय जियारत से कुछ दूरी पर स्थित यह पेड़ गांव वालों की आस्था का प्रतीक भी है।   इसके बावजूद यह अतिक्रमण की मार झेल रहा है । यूरोप में भी एक ऐसी जगह है जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। गूगल बाबा से इसकी जानकारी मिलने के बाद हमने इस पेड़ को बतौर ऐतिहासिक धरोहर व पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित करने की दिशा में शर्मा जी के प्रयासों के साथ पर्यटन विभाग के अधिकारियों से बात करके खबर बनायी। लगे हाथ बडग़ाम के डीसी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि पर्यटन इस गांव की रूपरेखा बदल सकता है और यह पेड़ इनके लिए तरक्की का माध्यम होगा। उन्होंने कहा कि पेड़ तक पहुंचने के लिए कम से कम सडक़ तो खुली मिलनी चाहिए व उसके नीचे बैठने की जगह होनी चाहिए। छत्तरगाम में चिनार का पेड़ दुनिया का सबसे विशाल और बड़ा चिनार है । इस पेड़ को सन् 1374 में सैय्यद कासिम ने लगाया था। यह पेड़ शुरू से ही लोगों की आस्था का केन्द्र रहा है। इसका व्यास 31.85 मीटर और ऊंचाई 14.78 मीटर है। इस पेड़ का संरक्षण अब बतौर सांस्कृतिक व ऐतिहासिक धरोहर की तर्ज पर करने के वन विभाग की खबर को आकर्षण बनाने के लिए हेडिंग दिया..इतिहास चीरकर का लिखेगा एक चिनार अपना नाम। चिनार पेड़ की महत्व को देखते हुए हेडिंग मुझे अच्छी लगी। संपादक जी के आने से पहले पूरी रिपोर्ट तैयार करने के बाद उनके आने से पहले मेज पर रख दी। संपादक प्रमोद भारद्वाज जी आए तो वह भी खबर देखकर खुश हो गए। अचानक उनके कमरे की घंटी बजी चपरासी से मुझे बुलवाया। अंदर घुसते ही बोले दिनेश तुम्हारी खबर पढक़र मजा आ गया। अगर इस तरह की खबर रोजाना अखबार में एक या दो हो तो अखबार ‘बम-बम’ है। खबर पढक़र खुश प्रमोद जी ने कहा कि दिनेश इसको सभी संस्करणों में भेज दो। खबर फाइनल होते ही सभी संस्करण में चल गयी। नोएडा ने देश-विदेश का जो पेज बनाया उसमें आठ कालम फोटो के साथ खबर डिस्पले की। नोएडा डेस्क से खबर का डिस्प्ले देखकर दिल खुश हो गया। जम्मू में खबर पहले पन्ने पर प्रमुखता के साथ ली गई। खबर छपते ही जम्मू-कश्मीर सरकार भी हरकत में आ गई। सरकार का दरबार जम्मू आया था। आमतौर पर उर्दू और अंग्रेजी अखबारों की खबरों को संज्ञान में लेने वाले मुख्यमंत्री ने हिंदी अखबार की इस खबर को भी संज्ञान में लिया। सरकारी न्यूज एजेंसी ने शाम को इस पेड़ के बारे में खबर रिलीज की चिनार के इस पेड़ को वल्र्ड हेरिटेज में शामिल कराने के लिए रियासत की सरकार केंद्र सरकार को मसौदा भेजेगी। इसके साथ उस पेड़ के नीचे पर्यावरण दिवस पर विशेष आयोजन होगा। चिनार के इस पेड़ को पर्यटन स्थल घोषित करने की दिशा में विचार किया जाएगा। इस पेड़ को लेकर अपनी स्टोरी में जितने भी प्रो-एक्टिव होकर आइडिया डाले गए थे, उस दिशा में जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा सोचे जाने और प्रयास किए जाने की खबर मिलने के बाद वाकई में प्रसन्नता हुई। सबसे ज्यादा खुशी तब हुई जब जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन की सेक्रेटरी हाफीजा ने फोन करके फिरदौस के बारे में हुई बातचीत और राज्य सरकार को कार्रवाई के साथ मदद की सिफारिश संबंधी रिपोर्ट भेजने की बात बतायी। फोन रखने से पहले उसने चिनार की खबर की तारीफ करते हुए कहा कि उस पेड़ के नीचे मेरी ढेरों रोमांटिक यादें जुड़ी हैं। मैने कहा कि आपकी मोहब्बत इस चिनार की तरह सलामत रहे, यह मेरी दुआ है। यह सुनकर हंसते हुए वह बोली.. यू आर सो क्रेजी। 
                     
क्रमश:

शुक्रवार, 3 जून 2011

‘हिंदुस्तान की गांधीवादी’ पाक में आवारा औरत!

रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 13
‘हिंदुस्तान की गांधीवादी’ पाक में आवारा औरत!
नाम- हाफीजा मुज्जफर, उम्र चालीस पार, कद पांच फुट आठ इंच से कम नहीं होगा। हल्के हरे रंग के सलवार-सूट के साथ सिर पर दुपटटा ओढ़े, हाथ में किसी उर्दू नामानिगार की किताबों में खोई हाफीजा को देखकर कुछ देर के लिए ठिठक गया। सोचने लगा कि डिस्टर्ब करें या ना करें। एक क्षण के लिए दिमाग में उभरे इस सवाल को वहीं दफन करकमरे के अंदर दाखिल हो गया। अध्ययन में खलल पडऩे पर मेरी ओर मुखातिब हुई हाफीजा कुछ पूछती इसके पहले ही अपना परिचय दिया। एक मीठी मुस्कान के साथ बैठने के लिए कहते हुए कहा आठ महीने पहले एक उूर्द अखबार के पत्रकार आए थे, उसके बाद आप आए हैं। कहिए मैं आपकी क्या मदद कर सकती हंूं। मैने कहा कि मैं आपको अक्सर खबरों के लिए डिस्टर्ब करता रहूंगा। बातचीत से पहले हाफीजा ने आईकार्ड मांगा तो अमर उजाला बनारस का ही कार्ड दिखाया। दिनेश चंद्र मिश्र नाम उच्चारण के साथ पढ़ते हुए बोली आपका तो यहां का कार्ड ही नहीं है। मैने बताया अभी एक महीने आए हुआ है, इसलिए कार्ड बनने में देर हैं, अगर आपको मेरे ऊपर कोई शक हो तो अमरउजाला दफ्तर या संपादक जी को फोन कर सकती हैं। मेरी बातों को सुनकर मुस्कराते हुए हाफीजा बोली ऐसी कोई बात नहीं है। सुरक्षा कारणों से यहां कब कौन किस शक्ल में आ जाए कहां नहीं जा सकता है। काशी से जम्मू-कश्मीर कैसे पहुंच गए, छोटी सी कहानी बताने के बाद जेब में पड़े फिरदौस की मां की दरख्वास्त निकालकर हाथ में पकड़ लिया। श्रीनगर के पास फिरदौस के साथ जो आतंकवादियों ने जुल्म किया, उसका जिक्र करते हुए गर्वमेंट मेडिकल कालेज में भर्ती होने की पूरी कहानी सुनाई। दिल से गहरा अफसोस जाहिर करते हुए हाफीजा ने कहा कि यहां की बदकिस्मती है कि महिलाओं के साथ ऐसा बर्ताव हो रहा है। बलात्कार की शिकार फिरदौस की मां जाहिरा का उूर्द में लिखा प्रार्थनापत्र देते हुए कार्रवाई की गुजारिश की। जाहिरा का प्रार्थनापत्र हाथ में लेते हुए कहा कि यहां महिलाओं के साथ जुल्म-ज्यादती जहां कम नहीं हो रहे हैं, वहीं चाहकर भी महिला आयोग कुछ कड़ा कदम नहीं उठा पा रहा है। इसके पीछे का कारण पूछने पर हाफीजा ने सबसे पहले रियासत में वूमेन कमीशन के ढांचे के बारे में बताने के साथ मूलभूत सुविधाओं की बदहाली का बखान किया। पंद्रह दिन श्रीनगर और पंद्रह दिन जम्मू में बैठने के बाद भी महिलाओं के उत्पीडऩ के मामले में कार्रवाई न हो पाने की पीड़ा का जिक्र करते हुए उनके चेहरे पर इसका दर्द साफ दिखाई पड़ रहा था। वूमेन कमीशन का हाल जानने के बाद जाहिरा के प्रार्थनापत्र पर क्या कार्रवाई और मदद हो सकती है? यह सवाल उसकी तरफ उछाला तो बोली आज ही उसका बयान लेने जाएंगे। बयान होने के बाद सरकार को इस मामले में कार्रवाई के लिए लिखने के साथ आर्थिक मदद की भी सिफारिश करेंगे। घटनाक्रम में हाफीजा की दिलचस्पी देखते हुए दिल में इस बात का संतोष हुआ कि फिरदौस के चेहरे पर नूर वापस न भी लौटे लेकिन घाव पर कुछ तो मरहम लगेगा।
फिरदौस के मामले पर चर्चा करने के दौरान एक और बात सामने आयी कि जम्मू-कश्मीर में महिलाओं की साक्षरता दर कम होने से ऐसी घटनाएं तमाम होती है, लेकिन उनकी आवाज कहीं नहीं उठती है। फिरदौस का मामला वूमेन कमीशन के सामने लाने पर शुक्रिया कहने के साथ चाय का आर्डर दिया। चाय आने तक दिमाग में यहां से कुछ और खबर निकालने की तरफ ध्यान केंद्रित किया। बातचीत के दौरान हाफीजा ने बताया कि वह लंदन के स्कूल आफ इकनामिक्स में पढ़ी है। हाफीजा की पढ़ाई और जानकारी के चलते उसके प्रति मेरी दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी, पूछा वूमेन कमीशन में आने से पहले क्या किया। बताया देश की प्रसिद्घ गांधीवादी निर्मला देशपाण्डेय के साथ समाजसेवा करती रहीं। जम्मू-कश्मीर में महिलाओं के लिए काम करने की ललक देखकर निर्मला देशपाण्डेय अपने साथ पाकिस्तान दौरे पर भी ले गयी थी। बात उस समय की है जब देश में अटल जी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे। वह खुद बस लेकर पाकिस्तान गए। इसके साथ महिलाओं का एक दल निर्मलादेशपाण्डेय की अगुवाई में लाहौर गया। नाम रखा गया शांति का कारवां। इस दल का वहां की मशहूर समाजसेवी महिला आसमां जहांगीर ने खैरमकदम किया। सिगरेट पीने की आदी आसमां के साथ महिलाओं ने मोमबत्ती जलाकर भारतीय महिलाओं का स्वागत किया। दूसरे दिन लाहौर के अखबारों को देखकर तो सबका माथा ठनक गया। लाहौर के अखबारों ने छापा कि पाकिस्तान की आवारा औरतों ने हिंदुस्तान की बदनाम औरतों का सिगरेट के छल्ले उड़ाकर स्वागत किया। पाकिस्तानी मीडिया को कोसते हुए हाफीजा ने कहा कि हिंदुस्तान की मीडिया दुनिया में सबसे अच्छी है। पाक मीडिया का हाल सुनने के दौरान कश्मीरी चाय सामने आ गयी थी। कश्मीरी चाय का जायका लेने के साथ यह जानने में लगा रहा कि जम्मू-कश्मीर में वूमेन कमीशन के सामने एक साल के दौरान कितने मामले आए, कितने में क्या कार्रवाई हुई। जुबानी याद आंकड़ा बताते हुए हाफीजा ने कहा कि जागरुकता कम होने के कारण अधिकांश मामले यहां तक नहीं आ पाते हैं। आतंकवादी संगठनों की सक्रियता के कारण किस कदर महिलाओं के ऊपर जुल्म होते हैं? आतंकवादी संगठनों की मदद में हाल के दिनों में कई महिलाओं की खबर सामने आयी थी। इन महिलाओं की मजबूरी पर चर्चा हुई तो पता चला कि जे एंड के में अगर कोई महिला आतंकवादी संगठन की मदद या सांठगांठ के आरोप में पकड़ी जाती है तो केंद्रीय खुफिया जांच एजेंसियों पूछताछ के दौरान मैं या मेरे द्वारा नामित कोई महिला जरूर रहती है। ऐसी महिलाओं की मजबूरी की बड़ी दर्दनाक और लंबी कहानी है। आज नहीं फिर आइएगा मेरे साथ चाय पीने तब इस बारे में आगे बात करेंगे। वूमेन कमीशन की भूमिका सहित ढेरों बातचीत करते हुए एक घंटे से ज्यादा वक्त बीत गया, लेकिन बातचीत से पेट नहीं भरा था। मैने घड़ी की सुई देखते हुए हाफीजा से विदा लेते हुए कहा कि आप जाहिरा और फिरदौस से मिल लीजिए हम फिर आपको तकलीफ देंगे कि इस मामले में क्या हुआ? हाफीजा को खुदा हाफिज करके बाहर निकलते ही गर्वमेंट मेडिकल कालेज की नर्स रेशमा को फोन मिलाते हुए आज की मीटिंग के बारे में बताया और कहा कि आज शाम को या कल सबेरे हाफीजा फिरदौस से मिलने जाएंगी। रेशमा मेरे भागदौड़ से खुश होते हुए ढेरों दुआएं देने लगी। मैने कहा दुआएं तब देना जब फिरदौस के चेहरे पर नूर वापस लौट आए।

क्रमश:  
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.