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शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

सिंगल स्क्रीन सिनेमा को सीएम ही देंगे संजीवनी



- सिंगल स्क्रीन सिनेमा को जिंदा रखने की मुलायम की सोच का मायावती ने गला घोंटा
- बंद सिनेमाघरों को जिंदा करने की मुलायम नीति को अखिलेश से लागू करने की मांग
- उत्तर प्रदेश सिनेमा एग्जीबिटर्स फेडरेशन ने मुख्यमंत्री को खत भेजकर किया गुजारिश
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। मल्टीप्लेक्स की चकाचौंध ने दशर्कों को एक नया एहसास दिया है लेकिन इसकी चकाचौंध में प्रदेश के पचास प्रतिशत से ज्यादा सिनेमाहल बंद हो चुके हैं तो वहीं गरीबों को सस्ता और सुलभ मनोरंजन उपलब्ध कराने का प्रदेश सरकार का संकल्प भी बेमानी लगने लगा है। सैकड़ों की तादाद में बंद हो गए सिंगल स्क्रीन सिनेमा को नई जिंदगी के लिए सांस कोई दे सकता है तो वह है प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव। कारण प्रदेश की पिछली सरकार की मंशा गरीबों के मनोरंजन के साधन कहे जाने वाले सिंगल सिनेमा स्क्रीन को जिंदा करने की होती तो मुलायम सिंह यादव जब मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने इसके लिए पांच साल की जो प्रोत्साहन नीति बनायी थी, सन्ï २०१० में खत्म होने के बाद छूट की तिथि आगे बढ़ाने की काम करती। मुलायम की सिंगल स्क्रीन सिनेमा को जिंदा रखने की दम तोड़ चुकी सोच को अब नई जिंदगी के लिए संजीवनी कब मुख्यमंत्री देंगे? उम्मीद भरी नजरों से सैकड़ों सिनेमामालिकों के हाथ हजारों सिने कर्मचारी इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
प्रदेश में अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा मनोरंजन कर, पायरेसी,केबिल टीवी के चलते सालों से दम तोड़ रहे सिंगल स्क्रीम सिनेमाहालों की संख्या ५३४ हो गयी है। प्रदेश में जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे तो सन २००४-२००५ में सिंगल स्क्रीन सिनेमाहालों को प्रोत्साहित करने को नई नीति लागू की गई थी। इस नीति के तहत सिनेमाहाल को पूरा तोडऩे व 300 सीटों का बनाने पर ही व्यावसायिक गतिविधि की अनुमति देने जैसी शर्ते थी। मुलायम की इस नीति के प्रति प्रदेश के कई जिलों में सिनेमा मालिक आकर्षित हुए। मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में सिंगल स्क्रीन सिनेमा को जिंदा करने के लिए इस संबंध में शासनादेश संख्या-१५६०/११ क-नि-६-२००५-बीस.एम.(१०६)/२००५ दिनांक-२७-०९-२००५ को जारी किया गया था। मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में जारी इस नीति के पीछे सिनेमाहाल के व्यवसाय को पुर्नजीवित कराने की मंशा थी। इस नीति के तहत प्रथम तीन वर्षों के लिए मनोरंजनकर में १०० प्रतिशत की छूट व चौथे व पांचवे वर्ष में ७५ प्रतिशत की छूट दी गयी थी। मुलायम राज के इस शासनादेश की अवधि मायावती राज में सन्ï २०१० में खत्म हो गया। इसकी समय सीमा बढ़ाने के लिए  उत्तर प्रदेश सिनेमा एग्जीबिटर्स फेडरेशन के कई पदाधिकारी तत्कालीन मुख्यमंत्री व मनोरंजन कर आयुक्त से मिलकर गुहार लगाए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। मायावती राज में सिंगल स्क्रीन सिनेमा को जिंदा रखने की बनी नीति के शासनादेश की अवधि तो नहीं बढ़ायी गयी लेकिन मल्टीप्लेक्स को छूट प्रदान करने के लिए एक नया शासनादेश जरूर जारी कर दिया गया। मायावती के इस फैसले से मल्टीप्लेक्स तो चांदी कांट रहे हैं लेकिन सिंगल स्क्रीन सिनेमा दिनोंदिन दम तोड़ रहे हैं। खण्डहरों की शक्ल में तब्दील हो रहे सिंगल स्क्रीन सिनेमा को जिंदा करने की नीति को मायावती राज में सन्ï २०१० में गला घोंटने के बाद से आज तक ही ६५ सिनेमाघर प्रदेश में बंद हो चुके हैं। मायावती सरकार की सिंगल स्क्रीन सिनेमा को जिंदा करने के प्रति बरती गयी उदासीनता के चलते मुलायम राज में राजधानी के आलमबाग में स्थित कृष्णा सिनेमा की जगह बन रहे मिनीप्लेक्स का निर्माण अधर में लटका है, वहीं कैसरबाग स्थित आनंद सिनेमा के शुरू होने पर शासनादेश का ताला लटका है। उत्तर प्रदेश सिनेमा एग्जीबिटर्स फेडरेशन ने प्रदेश के मुख्यमंत्री को खत भेजकर मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में सिंगल स्क्रीन सिनेमा को लेकर जारी नीति संबंधित शासनादेश संख्या-१५६०/११ क-नि-६-२००५-बीस.एम.(१०६)/२००५ दिनांक-२७-०९-२००५ को पुन: जारी करने की मांग की है। उम्मीद है ‘मनोरंजन के मंदिरों’ का कब्रिस्तान बन गये उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री के फैसले से गीत-संगीत की झंकार खण्डहर बने सिनेमाहालों में फिर सुनाई देगी।

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

‘मनोरंजन के मंदिरों’ में सरकारी आदेश से मातम


- एक तरफ सन् १९८८ में सरकार ने दिया पहला आदेश सिनेमा तोड़वाकर व्यावसायिक इमारत नहीं बनवा सकते
-दूसरी तरफ चलचित्र निगम के ४३ सिनेमाघर बंद होने पर प्रदेश सरकार ने खुद उसके दूसरे उपयोग को दे दिया 
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। इक्कीस करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में गरीब और मध्यमवर्ग के लोगों के लिए मनोरंजन के मंदिर कहे जाने वाले पांच सौ से ज्यादा सिनेमाघरों में पसरे मातम के पीछे सरकारी फरमान प्रमुख कारण है। सरकारी आदेशों के चलते किस कदर साल दर साल १०१८ में से ५३४ सिनेमाघर बंद हो गये, इसको जानने के लिए सरकारी आदेशों की फाइलों के पुराने पन्नों पर नजर डालनी होगी। बात सत्तर के दशक से शुरू होगी, जब सिनेमाहाल में टिकटों के लिए मारामारी के साथ छोटे-बड़े शहरों में हाउसफुल का बोर्ड अक्सर टंगा दिखते थे। सिनेमाघरों से उत्तर प्रदेश सरकार देश में सबसे ज्यादा मनोरंजन कर वसूलने के कारण मालामाल हो रही है।  
सन्ï १९८८ में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक आदेश पास किया था कि सिनेमाघर मालिक अपना सिनेमा तोड़वा कर कोई भी व्यावसायिक इमारत नहीं बनवा सकते और अगर वे ऐसा करते है तो उन्हें भारी जुर्माना देने के बाद ही यह अनुमति मिलेगी। जब सरकार ने यह आदेश लागू किया तो तर्क दिया कि सिनेमा आम आदमी के मनोरंजन का साधन है और किसी को भी यह हक नहीं है कि वह आम आदमी के मनोरंजन को रोके। सत्तर के इसी दशक में सरकार ने उत्तर प्रदेश चलचित्र निगम बनाने के साथ प्रदेश में ४३ सरकारी सिनेमाघरों का निर्माण करवाया। दस साल के भीतर चलचित्र निगम के सभी सिनेमाघर बन्द हो गये और बाद में उन्हें दूसरे व्यावसायिक कामों में लगा दिया गया। उस समय उत्तर प्रदेश सरकार को आम आदमी के मनोरंजन का ख्याल नहीं आया।  सरकार की इस दोहरी नीति से प्रदेश में सिनेमहाल घाटे के कारण बंद होने लगे। सिनेमाघरों का बंद होना न थमने के कारण सन २००४-२००५ में सिंगल स्क्रीन सिनेमाहालों को प्रोत्साहित करने को नई नीति लागू की गई। इस नीति के तहत सिनेमाहाल को पूरा तोडऩे व ३०० सीटों का बनाने पर ही व्यावसायिक गतिविधि की अनुमति देने जैसी शर्ते थी जिससे सिनेमा मालिक उसके प्रति आकर्षित ही नहीं हुए। आम आदमी के मनोरंजन के साधन बने सिनेमाघरों का बंद होना भूलकर सरकार मल्टीप्लेक्स को स्वागत करने के लिए कई सहूलियत देने में जुट गयी। प्रदेश सरकार ने सन्ï २००९ में मल्टीप्लेक्सेस को ५ वर्ष तक मनोरंजन कर में छूट देने के साथ कई सहूलियत देने की घोषणा की।  दूसरी तरफ जून २००९ में सिंगल स्क्रीन सिनेमा में सरकार ने टिकटों के रेट कम करने का एलान किया। टिकट कम करने का एलान करने के पीछे सरकार की जेब भरने की मंशा थी। पहले सरकार नेट पर ६० प्रतिशत टैक्स लेती थी पर इस एलान के बाद सरकार ने टोटल पर टैक्स लेना चालू किया। पहले १६ रुपये में ६ रुपये बतौर टैक्स मिलता था, तो इस एलान के बाद उसे ६ रुपए ४० पैसे मिलने लगे। सिनेमाघरों के हर टिकट में से ५० पैसे फिल्म विकास निधि को जाता है। आज की तारीख में उत्तर प्रदेश के फिल्म विकास निधि के पास अरबों की सम्पत्ति है पर फि र भी इस प्रदेश में खंडहर में तब्दील होते मनोरंजन के मंदिरों की संख्या पर रोक नहीं लग पा रहा है। प्रदेश के आधे से ज्यादा जिलों में कोई सिनेमाघर आज की तारीख में चालू नहीं है। धुंआधार बंद हो रहे छोटे सिनेमाहाल के मुकाबले राजधानी सहित कई बड़े महानगरों में जहां मल्टीप्लेक्स हाल हैं जिसमें एक साथ छह सिनेमा लगाये जाते हैं जिसका टिकट दर १०० रुपये से लेकर २०० रुपए तक है। जिसमें साधारण आदमी मनोरंजन के नाम पर इतना पैसा खर्च करने की स्थिति में नहीं होता है। ऐसे में सिंगल स्क्रीन सिनेमा को किस तरह जिंदा रखा जाये ताकि गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के मनोरंजन का साधन जिंदा रहें? प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सामने आज की तारीख में यह भी एक चुनौती ही है। 


बुधवार, 28 नवंबर 2012

यूपी बना ‘मनोरंजन के मंदिरों’ का कब्रिस्तान



दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन सहित सैकड़ों अभिनेता और अभिनेत्री जिस उत्तर प्रदेश की सरजमीं में पैदा हुए, वह अब ‘मनोरंजन के मंदिरों’ का कब्रिस्तान बन गया है। मध्यमवर्ग के लिए मनोरंजन मुहैया कराने के लिए छोटे शहरों से लेकर प्रदेश की राजधानी तक सिंगल स्क्रीन सिनेमाहालों के बंद होने से इस कब्रिस्तान की झलक आप देख सकते हैं। बड़े महनगरों में सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर बंद होने के बाद मल्टीप्लेक्स खुलने से मनोरंजन के साधन जिंदा हैं, लेकिन सूबे के दो तिहाई जिलों में तो एक भी सिनेमाघर जिंदा नहीं बचा है। मनोरंजन के इन मंदिरों का कब्रिस्तान पूर्वांचल के पिछड़े जिले बस्ती हो या धार्मिक व सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी कहीं भी देखा जा सकता है। मल्टीप्लेक्स के युग में सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के बंद होने से मध्यमवर्ग मनोरंजन से मरहूम हो गया है।
एक तरफ मल्टीप्लेक्स को बढ़ावा देने के लिए पिछली सपा सरकार के समय लागू की गई प्रोत्साहन योजना से सूबे में मल्टीप्लेक्स तो धड़ाधड़ खुले लेकिन उनकी चकाचौंध के आगे सिंगल स्क्रीन सिनेमाहाल का वजूद न सिर्फ खतरे में पड़ता जा रहा है,बल्कि बंद होने की संख्या बढ़ती जा रही है। मल्टीप्लेक्स के युग में सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के सामने दर्शक घटने की जहां चुनौती थी, वहीं खर्चो के बढ़ते रहने से सिनेमाहाल चलाना घाटे का सौदा दिखने पर इसके मालिक बंद करना ही मुनासिब समझ रहे हैं। इसी कारण  प्रदेश के १०१८ सिंगल स्क्रीन सिनेमाहालों में से अब तक ५३४ में ताले लग चुके हैं। मनोरंजन के इन मंदिरों के रजत कपाट बंद होने से उसके मालिक जहां अपने को असहाय पा रहे हैं, वहीं यहां काम करने वाले कर्मचारी रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं। सिनेमाहाल बंद होने के बाद उसे तोडक़र उस भूमि के व्यावसायिक उपयोग पर प्रतिबंधित लगने के कारण है प्रदेश की राजधानी हो या पड़ोसी जिला सीतापुर ऐसे खंडहर की शक्ल में तब्दील ऐसे मनोरंजन के मंदिरों को देखा जा सकता है। इनके सामने से जब वहां के लोग गुजरते है तो उनके जेहन में मनोरंजन के मंदिरों से जुड़ी ढेरों यादें ताजा हो जाती है। मध्यम वर्ग के साथ गरीबों का मनोरंजन का साधन कहे जाने वाले सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के बंद होने के पीछे सिनेमा मालिक को उठाना पड़ा घाटा जहां प्रमुख कारण के रूप में उभरा वहीं इनमें दर्शकों की संख्या घटने से राजस्व की कमी के चलते सरकार भी उदासीन हो गयी। गरीबों का मनोरंजन का साधन कहे जाने वाले सिंगल स्क्रीन सिनेमानघरों के प्रति सरकार की उदासीनता के चलते पूर्वांचल में पचास फीसदी से ज्यादा सिनेमाघर बंद हो गये। एक तरफ  सरकार मल्टीप्लेक्स सिनेमाहालों को मनोरंजन कर में छूट दे रही है तो दूसरी तरफ  सिंगल स्क्रीन के सिनेमाहालों पर ६० प्रतिशत मल्टीप्लेक्स टैक्स लगा कर उन्हें हतोत्साहित भी कर रही है। उत्तर प्रदेश सिनेमा एग्जीबिटर्स फेडरेशन के महामंत्री आलोक दूबे ने बताया कि पूर्वाचल के अधिकांश सिनेमाहाल बंद हो चुके हैं और जो बचे हैं वे बंद होने के कगार पर हैं। वह बताते हैं वाराणसी में कभी २७ सिनेमाहाल हुआ करते थे लेकिन अब १२ ही रह गए हैं। चंदौली जिले में १२ सिनेमा हाल थे लेकिन अब सिर्फ  ४ ही रह गए हैं। इसी तरह मिर्जापुर में १३ में से ७ बंद हो चुके हैं। गाजीपुर में चार सिनेमाहाल हाल हुआ करते थे लेकिन अब सिर्फ  एक ही हाल रह गया है। बस्ती जिले में कभी छह सिनेमाहाल हुआ करता था, आज की तारीख में सब बंद हो गये हैं। गरीब और मध्यमवर्ग को मनोरंजन का साधन मुहैया कराने के लिए सत्तर के दशक में सरकार ने उत्तर प्रदेश चलचित्र निगम बनाया था। जिसका उद्देश्य था कि इसके माध्यम से सरकार गरीबों को सस्ते दर पर मनोरंजन उपलब्ध कराने का उत्तरदायित्व पूरा करेगी। इसके लिए उस समय निगम ने पूरे प्रदेश में ४३ सिनेमाहालों का निर्माण भी करवाया था लेकिन इनका भी वही हश्र हुआ जो अन्य सरकारी प्रयासों का होता है। चलचित्र निगम द्वारा बनाये गए सभी सिनेमाहाल दस साल के भीतर ही प्रदेश में बंद हो गए हैं। उत्तर प्रदेश में मनोरंजन के मंदिरों का जितना बड़ा कब्रिस्तान आज की तारीख में दिखाई दे रहा है, उतना बड़ा देश के किसी भी प्रदेश में नहीं है।

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

आसमां में दिखेगा चांद आवाज में दिखेगी अक्स




दिनेश चन्द्र मिश्र
भारत-चीन सीमा से : भारत-चीन सीमा पर नाथुला के पास तैनात सेना के जवान 
रणधीर सिंह पंजाब के कपूरथला के रहने वाले हैं। रणधीर के पर्स में पत्‍‌नी 
की फोटो हमेशा रहती है। पिछले साल वैसाखी में घर गए थे, पत्‍‌नी से फोन पर 
बातचीत करीबन रोज होती है। भारत मां के इस सपूत पिछले तीन साल से पत्‍‌नी 
की एक शिकायत नहीं दूर कर पा रहे हैं। शिकायत है करवाचौथ पर साथ रहने का, 
ताकि वह अपने चांद का चेहरा देख सके। इस बार चौथा साल है जब वह फिर नहीं जा
पाये। करवाचौथ के दिन क्या करेंगे? इस सवाल पर गहरी आह भरते हुए कहते हैं 
क्या करेंगे, नाथुला हिल्स पर जब चांद दिखाई देगा तो पत्‍‌नी को फोन करके 
हैप्पी करवाचौथ बोलने के बाद आवाज में ही हम दोनों एक दूसरे का अक्स देख 
लेंगे। यह बताने के साथ इस जवान के दिल के साथ आंखों की नमी साफ-साफ दिखाई 
पड़ने लगी। यह दर्द सिर्फ रणधीर का नहीं बल्कि उसके जैसे हजारों जवानों का 
है, जिनके लिए होली, दीपावली, ईद, बकरीद हो या करवाचौथ सब कुछ सरहद पर ही 
मनता है। चीन सीमा पर ही तैनात उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के राम प्रवेश 
सिंह के दिल में भी करवाचौथ को लेकर ऐसा ही दर्द है। शादी के बाद आज तक 
करवाचौथ के दिन पत्‍‌नी के साथ नहीं रह सके। पत्‍‌नी जब उनके लंबी उम्र की 
कामना करती है तो उनकी आंखें सरहद पर निगाहबान होती है। चांद दिखाई देने पर
फोन करके करवाचौथ की बधाई देते हुए पानी पी लेने को कहते हैं। पति-पत्‍‌नी
के संबंधों की इस गहराई को भारत मां भी सलाम करती है। अमृतसर के जोगेंद्र 
सिंह की पत्‍‌नी करवाचौथ मनाती है, इस दिन वह सोलह श्रृंगार करके बाद छत पर
पूजा की थाली के साथ मोबाइल फोन लेकर बैठती है। चांद के दीदार के साथ उसके
कान फोन की घंटी सुनने को बेताब रहते हैं। जोगेंद्र के फोन के बाद ही व्रत
पूरा होता है। पिछले साल तो नेटवर्क प्राब्लम के चलते वह रात बारह बजे फोन
कर सके तब तक वह बिना अन्न-जल के उनके फोन का इंतजार करती रही। फोन जब 
मिला होगा तो बातों में प्यार के सागर की गहराई के साथ मजबूरी की खाई का 
अंदाजा आप खुद लगा सकते होंगे। जलपाईगुड़ी जिले के जयगांव से सटा भूटान 
बार्डर है। यहां तैनात सेना के सतपाल तोमर तो करवाचौथ का गिफ्ट कोरियर से 
भेज दिए हैं, लेकिन पत्‍‌नी के पास न होने का दर्द इनका भी सबके ही तरह है।
सिलीगुड़ी से 26 किमी दूर फूलबाड़ी के पास बांग्लादेश बार्डर पर तैनात 
बीएसएफ जवानों के दिल में भी करवाचौथ को लेकर ऐसा ही दर्द भरा है। बिहार के
आरा के रहने वाले शिवमंगल की पत्‍‌नी तो छठ और करवाचौथ दोनों मनाती है, 
लेकिन वह चाहकर भी नहीं पहंुच पाते हैं। सरहद पर ऐसे दर्द को दिल में 
समेटकर भारत मां की सुरक्षा में तैनात जवानों के साथ उनकी पत्नियों को भी 
दिल से प्रणाम करने का दिल करता है। एक सरहद पर दूसरा घर में अपनी 
तमन्ना,खुशियों की कुर्बानी देकर भारत मां की आन, बान और शान के लिए जी-जान
से जुटा है। इन जवानों को एक बार फिर सलाम।

गुरुवार, 18 अक्तूबर 2012


नकली निविदाओं से निगला ७००० करोड़

दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। प्रदेश की पूर्ववर्ती बहुजन समाज पार्टी की सरकार में हुए एनआरएचएम,लैकफेड सहित कई घोटालों की जांच अभी अंजाम पर नहीं पहुंची है कि हजारों करोड़ रूपए का एक और बड़े घोटाले का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। यह घोटाला उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम से जुड़ा है। प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में ७००० करोड़ रूपए से ज्यादा के निर्माण कार्य नकली निविदाओं से बीस कंपनियों ने निगल लिया। नकली निविदिाओं से हजारों करोड़ रुपए के काम को हथियाने के साथ आधा-अधूरा छोडक़र पूरा पेमेंट करने के हुए संगीन खेल में राजकीय निर्माण निगम के अधिकारियों के साथ पूववर्ती सरकार के एक विभागीय कैबिनेट मंत्री का नाम सामने आया है। प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकार के तमाम घोटालों की जांच सीबीआई के साथ अन्य जांच एजेंसियों से हो रही है,वही करोड़ों रुपए के इस खेल के जिम्मेदारों पर कार्रवाई तो दूर जांच भी किसी एजेंसी को नहीं सौंपी गयी है।
राजकीय निर्माण निगम द्वारा पूर्ववर्ती सरकार में विभागीय मंत्री के दबाब में पहले से चली आ रही कार्यप्रणाली को कारपोरेट सेक्टर की कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए बैक टू बैक आधार पर अपनो को काम बांटने का खेल हुआ। इसके पहले राजकीय निर्माण निगम के जिम्मे जो काम आता था, उसके इंजीनियर और आर्कीटेक्टों की फौज डिजाइन बनाकर लागत का मूल्य तय करने के बाद दस प्रतिशत ज्यादा रखकर ठेकेदारों से अपनी देखरेख में काम करवाती थी। डीसीयू पैटर्न कहे जाने वाले इस तरीके से जहां निर्माण कार्य होता था, उस इलाके के मजदूरों को बाजार से ज्यादा मूल्य पर काम मिलने के साथ स्थानीय लोगों को बड़ी संख्या में रोजगार मिलता है। इस सिस्टम को ताक पर रखकर प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकार में बैक टू बैक सिस्टम के आधार पर कारपोरेट कंपनियों को काम सौंपने के लिए नकली निविदाओं को फाइलकापी के लिए ही छपने वाले अखबारों में प्रकाशित करवाने के बाद काम हथिया लिया गया। नियमत: जिस क्षेत्र में काम होना है वहां के साथ प्रदेश की राजधानी में छपने वाले प्रमुख चार समाचारपत्रों में कम से कम विज्ञापन छपने के बाद आने वाली टेंडर के आधार पर होता है। पूर्ववर्ती सरकार में इस नियम को ताक पर रखकर बैक टू बैक से प्रदेश ही नहीं देश के कई राजनेताओं से जुड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनियों को ठेका दे दिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह भी रही जो काम होना है, कार्यदायी संस्था राजकीय निर्माण निगम को बनाया गया लेकिन उस प्रोजेक्ट में कितनी लागत आएगी, इसका वेल्यूशन रानिनि से कराने की बजाए कारपोरेट कंस्ट्रक्शन कंपनियों के जेबी संस्थाओं से पचास से साठ प्रतिशत ज्यादा लागत का कराने के बाद ठेका रेवडिय़ों की तरह बांटा। नकली निविदाओं से एक..दो नहीं बल्कि सात करोड़ रुपये से ज्यादा का काम निगलने का हुआ है। रानिवि के ग्रेजुएट इंजीनियर्स एसोसिएशन ने उसी समय तत्कालीन प्रमुख सचिव को खत लिखकर आपत्ति जतायी लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। प्रदेश की वर्तमान सरकार द्वारा पूर्ववर्ती सरकार में हुए कथित भ्रष्टाचार की जांच की बात कही लेकिन रानिनि में हुए करोड़ों रुपए के खेल का पड़ताल न होता देखकर प्रदेश के लोकायुक्त एनके वर्मा के पास इस मामले की जांच के लिए शिकायत इसी महीने प्रतापगढ़ के रहने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कर दी है, सुनवाई होनी बाकी है।


चाचाओं का चक्रव्यूह तोड़ रहा सियासत का अभिमन्यु

दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ । धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक छत्रछाया में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री की अभी तक सबसे कम उम्र में जिम्मेदारी संभालने वाले अखिलेश यादव अब अपनी अलग धमक बनाने में जुट गए हैं। प्रदेश में सपा सरकार बनने के छह माह तक पार्टी के पुराने नेताओं के साथ बहुत कुछ सीखने के बाद अब अखिलेश यादव अपनी हनक बनाने के लिए पार्टी और सरकार के भीतर मौजूद चाचाओं का चक्रव्यूह अभिमन्यू की तरह तोडऩे में जुट गये हैं। चाचाओं का चक्रव्यूह तोडऩे के पीछे विपक्षी दलों के तमाम आरोपों का मुंहतोड़ जवाब देने के साथ अपनी राजनीति और प्रशासनिक कौशलता का लोहा बीस करोड़ की आबादी वाले सूबे के साथ देश को दिखाना है।

प्रदेश में समाजवादी पार्टी को बहुमत मिलने के बाद अखिलेया यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने से पहले पार्टी और परिवार के भीतरखाने में उपजा असंतोष सरकार बनने के बाद भी रह-रहकर विरोधाभासी बयानों के बहाने बाहर आता रहा है। सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों की बयानबाजी और मुख्यमंत्री के  रूख में भिन्नता के कारण विपक्षी दलों के निशाने पर अक्सर सरकार आती रही है। युवा मुख्यमंत्री के कामकाज को लेकर विपक्षी दलों की टीका-टिप्पणी को लेकर कई बार सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव को मंत्रियों के साथ सपा कार्यकर्ताओं को नैतिकता का पाठ पढ़ाना पड़ा। सपा मुखिया द्वारा नैतिकता का सबक सुनने के बाद भी अमल में लाने में मंत्रियों द्वारा गंभीरता न दिखाने के कारण गोण्डा में सीएमओ को अगवा करने जैसी घटना सरकार के गले की हड्डी साबित हुई। राजस्व राज्यमंत्री विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह की दबंगई के पीछे सरकार मेें मुख्यमंत्री के चाचाओं की भूमिका में अपने को जगह-जगह दिखाने वाले वरिष्ठ मंत्रियों का शह माना जा रहा है। गोण्डा में सीएमओ के  साथ बदसलूकी के समय जिले में आला अधिकारियों की मौजूदगी न होना भी इस विवाद के बढऩे का अहम कारण रहा। सपा सरकार बनने के बाद प्रदेश के कई हिस्सों में हुई अप्रिय घटनाओं को लेकर भी सरकार के इकबाल पर असर पड़ा।
अखिलेश की अगुवाई में सरकार के कार्यकाल को आठ माह पूरा होने के बाद अब मुख्यमंत्री पार्टी और सरकार के भीतर मौजूद चाचाओं के चक्रव्यूह  को तोडक़र अपनी हनक बनाने की दिशा में काम करने लगे हैं। अखिलेश यादव का दो दिन पहले प्रदेश के पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को कामकाज में बदलाव लाने का अल्टीमेटम पहला कदम  है। मुख्यमंत्री के साथ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे अखिलेश यादव ने ऐसे चाचाओं के चक्कर में ही सपा से बाहर निकाले गए युवजन सभा के अध्यक्ष संजय लाठर को दुबारा पार्टी में शामिल करने के साथ युवजन सभा के अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपना भी इसी रूप में देखा जा रहा है। सपा और सरकार में शामिल वरिष्ठ नेताओं की शिकायत पर मुलायम सिंह यादव ने संजय लाठर को पार्टी से बर्खास्त कर दिया था, बुधवार को सपा प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने संजय को फिर वही पद सौंपकर संदेश दे दिया है, अब अखिलेश की ही चलेगी। सरकार के साथ पार्टी में अपनी मजबूत पकड़ बनाने की दिशा में अखिलेश यादव आगे क्या क्या करते हैं, यह देखने लायक होगा।

सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

सात समंदर पार फंसे सैकड़ों हिन्दुस्तानी


दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। मर्चेंट नेवी में नौकरी दिलाने के नाम पर जाब जालसालों ने पूर्वांचल के सैकड़ों युवकों को सात समंदर पार भेजकर बंधक जैसी जिंदगी जीने को मजबूर कर दिया है। मचेंट नेवी पर नौकरी दिलाने के नाम खाड़ी देशों में भेजों में गए अधिकांश युवा उन होटलों में बंधक बन गए है, जहां उनको नौकरी तक ठहरने के लिए कहा गया। पिछले कई महीने से ठहरे ऐसे युवा खाने-पीने को दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए हैं। तीन से पांच लाख रुपए तक लेकर ऐसे युवाओं को इरान,सऊदी अरब सहित कई खाड़ी देशों में भेजा गया है। विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर ठगे गए युवाओं के मां-बाप ने प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को खत भेजकर इस मामले में फौरी कार्रवाई करने की मांग की है।
श्री टाइम्स के इस खबरनवीस से सात समंदर पार नौकरी के नाम पर बंधक से बन गए कुछ युवाओं के मां-बाप से अपनी पीड़ा बखान की। इरान के एक होटल में तीन महीने तक रहने के बाद नौकरी न मिलने पर बिल न चुका पाने पर बंधक बन गए महाराजगंज जिले के मनकधरा गांव के सुजीत मिश्रा भी है। सुजीत के पिता गांव में किसानी करते हैं, अपनी खेती को बेचकर इन्होंने तीन लाख रुपए बनारस में रहने वाले जाब जालसाज शैलेंद्र सिंह को दिया। तीन लाख रुपए लेने के बाद मर्चेंट नेवी में नौकरी दिलाने के लिए पासपोर्ट और बीजा बनवाने के नाम पर एक लाख रूपया और लेने के बाद इसी साल जून में इरान भेज दिया। इरान में एक होटल में सुजीत मर्चेंट नेवी में नौकरी की आस रोजाना लगाए हैं, होटल का बिल एक लाख रुपए से ऊपर हो गया। भुगतान के लिए पैसा न होने पर होटल में बीजा-पासपोर्ट रखने के बाद से  लिया गया तो सुजीत बंधक बन गया है। होटल में ही उससे छोटे-मोटे काम कराने के साथ उससे घर वालों को फोन कराया गया। फोन पर एक लाख रुपए भेजने पर ही शैलेंद्र को रिहा करने की बात कही गयी। सुजीत अकेले ही नहीं इरान में बंधक बना है, बल्कि उसके साथ इलाहाबाद,बनारस,गाजीपुर,आजमगढ़ के कई दर्जन युवा है। इलाहाबाद के मुठ्ïठीगंज के रहने वाले रोशन भी है। रोशन के पिता परचून की दुकान करते हैं। वह भी बेटे को मर्चेंट नेवी में नौकरी के लिए तीन लाख रुपए बनारस के शैलेंद्र सिंह को दिया। बीजा-पासपोर्ट के लिए अलग से धन देने के बाद उसको भी इरान भेजा गया, आज वह भी बंधक बन गया है। आजमगढ़ के मोहम्मद रिजवान को भी इसी जालसाज ने नौकरी दिलाने के नाम पर खाड़ी देश भेजा, वहां उसको मर्चेंट नेवी में नौकरी की बजाए एक कंपनी में हेल्पर की नौकरी लगी। उसका बीजा-पासपोर्ट रखने के बाद उसको भी बंधक बना लिया गया है, उसकी सितंबर के आखिरी सप्ताह से तबियत खराब है। खून की उल्टी हो रही है लेकिन घर नहीं जाने दिया जा रहा है। उसका पासपोर्ट नंबर जी.७५०३९७३ और मेरा वीजा नंबर ४१०१२६७६२२ है। रिजवान की तरह कई भारतीयों के एडवांस विजन नामक कंपनी में बंधक बन गए हैं। मो. रिजवान के अब्बा मोहम्मद खालिद ने बताया कि रिजवान ने कंपनी के अधिकारियों से जब अपनी बीमारी के कारण भारत जाने के लिए पासपोर्ट मांगा तो उसे चोरी के केस में फंसा देने की धमकी दी जा रही हैै। रिजवान के साथ बिहार के पूर्वी चंपारण के रहने वाले तौफीक भी बंधक बने हैं।  मर्चेंट नेवी की नौकरी के नाम सात समंदर पार जाकर बंधक बन गए हिन्दुस्तानियों के परिजनों ने भारत सरकार को खत भेजकर कार्रवाई की मांग पिछले महीने की है। इनकी मांग पर कोई न कार्रवाई न होने पर ऐसे युवाओं के परिजनों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप करके भारत सरकार से इस दिशा में ठोस कार्रवाई करने की मांग किए हैं।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

माँ इंडिया चली जाओ,मुझे मरने को छोड़ दो



दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। माँ मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो और इंडिया चली जाओ ताकि मैं आसानी से मर सकूं। ये लोग मुझे ब्लैक मेल कर रहे हैं की अगर मै खाना नहीं खाऊंगी तो मेरे पूरे परिवार को खत्म कर देंगे मुझे बन्दूक की नोक पर दिन में एक बार खाना खिलाया जाता है। मियां मिठ्ïठू (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सांसद)ने कहा कि जब घोटकी कोर्ट में मेरे रिश्तेदार मुझे नहीं बचा सके तो सुप्रीम कोर्ट और पुनर्वास केंद्र मुझे क्या बचा पाएंगे। मैंने कहा न मंै कभी मुस्लिम थी न कभी बनूंगी,ये लोग जबरन मुझे गाय का मांस खाने में देते हैं पर मै फेंक देती हूं। मैं जिंदा रहने भर को शाकाहार लेती हूं, माँ प्लीज मुझे बताओ कि आप कब इंडिया जा रही हो ताकि मैं आसानी से मर सकूं। 
यह दर्दभरा पैगाम है २२ साल की रिंकल का। पाकिस्तान के सिंध प्रांत के मीरपुर मथेलो की रिंकल कुमारी का फरवरी में अपहरण करने के बाद उसका धर्म परिवर्तन कराकर उसे मुसलमान बनाया गया फि र 24 फ रवरी को पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सांसद मियां मिठ्ïठू के कारिंदे नावीद शाह नामक युवक से उसकी शादी करा दी गई। रिंकल मां-बाप के पास जाना चाहती है, मामला पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट में गया लेकिन वहां से भी इंसाफ  नहीं मिला है। सुप्रीम कोर्ट ने रिंकल को फिलहाल संरक्षण गृह भेज दिया है। संरक्षण गृह के नाम पीपीपी सांसद के घर पहुंच गयी रिंकल ने अपनी मां के मोबाइल पर यह एसएमएस भेजा। रिंकल के इस पैगाम को पाकिस्तान हिंदू सेवा वेलफेयर ट्रस्ट ने सोशल नेटवर्किंग साइट्ïस पर रोमिंग जर्नलिस्ट के नाम से मौजूद इस खबरनवीस के साथ शेयर किया है। गौरतलब है रिंकल के जबरन धर्म परिवर्तन व कथित निकाह की खबर को दुनियाभर की मीडिया में जगह मिली लेकिन भारत सरकार के लचर रुख के कारण इस लडक़ी को न्याय नहीं मिल सका। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल की मंगला शर्मा ने रिंकल ने जो एसएमएस अपनी मां को संबोधित करके भेजा है, उसको इस खबरनवीस के साथ शेयर करते हुए पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ हो रहे इंसाफ  के हाल को बताया है। रिंकल ने अपनी मां को जो एसएमएस से संदेश भेजा है उसमें आगे लिखा है माँ मंै मरना चाहती हूँ पर भगवान मुझे इसकी भी इजाजत नहीं दे रहे हैैं, मुझे पता चला है कि मेरे भाई कि शादी हो गई है, मेरी बदकिस्मती देखो कि मै अपने इकलौते भाई कि शादी में सेहरा तक नहीं गा सकी जबकि मैंने कितने सपने सजाए थे पवन  की   शादी को लेकर, माँ कितना प्रयास करने पर भी आप मुझे बचा नहीं पाएं, मै मीडिया के सामने कितना गिड़गिड़ाई कि ये देश कट्टर मुस्लिमों का है हिन्दुओं  को यहाँ न्याय कभी नहीं मिलेगा। माँ मै कल भी आपकी थी और हमेशा आपकी ही रहूंगी, भले ही अपहरणकर्ता मेरे शरीर पर कब्जा कर ले पर मेरी आत्मा 
सदैव मरते दम तक आपकी ही रहेगी। रिंकल के दर्दभरे इस संदेश को पाकिस्तान सरकार द्वारा सुने नहीं जाने के कारण पाकिस्तान हिंदू काउंसिल ने इस खबरनवीस को भेजा ताकि भारत सरकार की आंख खुल सके कि पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ क्या हो रहा है। उधर रिंकल को अगवा करके जबरन निकाह करने की घटना के बाद उसके मनोहर हिन्दुस्तान आ गए हैं। उनका कहना है कि मुझे कई बार लूटा गया पर मेरे पास और कोई चारा नहीं था। सरकार और पुलिस ने भी साथ नहीं दिया। उनका कहना है पाकिस्तान में हिंदुओं की नाबालिग लड़कियों का अपहरण करके जबरन धर्मांतरण के बाद निकाह किया जाना आम बात हो गई है। 

सोमवार, 10 सितंबर 2012

पाक में हिंदुओं के पासपोर्ट पर अघोषित प्रतिबंध



दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। भारत के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा और पाक की विदेश मंत्री हिना रब्बानी हाथ मिलाते हुए नए वीजा समझौते पर हस्ताक्षर करके दुनिया को दोस्ती में गर्माहट आने का संदेश दिया लेकिन हकीकत यह है कि पाकिस्तान में हिंदुओं को वीजा तो दूर पासपोर्ट बनने पर तीन महीने से अघोषित प्रतिबंध लगा है। कराची स्थित पासपोर्ट कार्यालय पर जून २०१० से अगस्त २०१० तक १५ हजार हिंदुओं के पासपोर्ट आवेदन पर विचार ही नहीं किया जा रहा है। पाक में हिंदुओं का पासपोर्ट बनने पर लगी अघोषित रोक के पीछे वहां हिंदू लड़कियों के साथ हो रही जोर-जबरदस्ती के बाद हो रहे हिंदुओं का पलायन मुख्य कारण है। पाक सरकार ने हिंदुओं के तेजी से हो रहे भारत पलायन को देखते हुए अन्तरराष्टïीय मंच पर किरकिरी होने से बचने के लिए यह कदम उठाया है। सोशल मीडिया पर रोमिंग जर्नलिस्ट के नाम से मौजूद श्री टाइम्स के इस खबरनवीस को पाकिस्तान हिंदू सेवा वेलफेयर ट्रस्ट ने हिंदुओं के पासपोर्ट पर लगे अघोषित प्रतिबंध की जानकारी दी है।
पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ हो रहे जुल्म के साथ उनकी बेटियों को अगवा करने के बाद जबरन निकाह करने की बढ़ती घटनाओं के बाद सिंध प्रांत से हिंदुओं के पलायन को लेकर पाकिस्तान सरकार ने पासपोर्ट जारी करने पर अघोषित रोक लगा रखी है। एक तरफ पाक में हिंदुओं का पासपोर्ट नहीं बन रहा है दूसरी तरफ पासपोर्ट के बाद भारत आने के लिए वीजा जारी होने के बाद अटारी बार्डर पर तीर्थयात्रियों को जबरन रोककर पूछताछ करने की घटनाएं थम नहीं रही है। पाकिस्तान हिंदू सेवा ट्रस्ट की मंगला शर्मा ने इस खबरनवीस को बताया कि छह माह पहले जो हिंदू पासपोर्ट के लिए आवेदन किए हैं, उनको अभी तक पासपोर्ट नहीं जारी किया। इसके पीछे कारण वह बताती है पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नुमाइंदों द्वारा जिस तरह सलूक किया जा रहा है, उसके कारण हिंदू अपने का पाक में महफूज नहीं समझ रहा है। पाकिस्तान हिंदू सेवा वेलफेयर ट्रस्ट के पास सिंघ प्रांत १४६७० हिंदुओं के नाम पते मौजूद है, जिनका पासपोर्ट कराची स्थित रीजनल पासपोर्ट आफिस में छह माह से लटके हैं। हिंदुओं के पासपोर्ट न बनने के पीछे सिंध व पंजाब प्रांत के हालत के कारण हो रहा हिंदुओं का पलायन है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में घोटकी के रहने वाले विजय तुलस्यानी ऐसे लोगों में शामिल है, जिन्होंने जनवरी में पासपोर्ट आवेदन किया लेकिन अभी तक नहीं मिला। कराची स्थित पासपोर्ट मुख्यालय पर जाने पर जवाब मिलता है अभी हिंदुओं को पासपोर्ट देने में सरकार ने रोक लगा रखी है,जब सरकार का आदेश होगा, तभी पासपोर्ट बनेगा। बताया जा रहा है पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के सलाहकार रहमान मलिक की ओर से मौखिक आदेश के बाद पाक में हिंदुओं के साथ ऐसा हो रहा है। गौरतलब है पिछले महीने भारत तीर्थ यात्रा पर आने वाले १९१ पाकिस्तानी हिंदुओं को अटारी बार्डर पर रोक लिया गया है। पाकिस्तान के अधिकारियों ने जब उनसे यह वादा करवा लिया कि वह पाक लौटकर आएंगे तभी भारत जाने दिया गया। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के सलाहकार रहमान मलिक ने भारतीय उच्चायोग द्वारा बड़ी संख्या में हिंदू परिवारों को वीजा देने को साजिश करने का बयान पहले ही दे चुके है। पाक में हिंदुओं के दुकानों में लूटपाट, मकानों पर हमले और महिलाओं को जबरन इस्लाम कबूल करवाने की घटनाओं के बाद तमाम हिंदू पाकिस्तान से पलायन कर रहे हैं। हिंदू परिवारों को भारतीय उच्चायोग द्वारा वीजा जारी करने में बरती जा रही नरमी के कारण पाक सरकार ने हिंदुओं को पासपोर्ट जारी करने पर अघोषित प्रतिबंध लगा दिया है ताकि न पासपोर्ट न भारतीय उच्चायोग से वीजा के लिए मांग करेंगे। पाकिस्तान हिंदू सेवा वेलफेयर ट्रस्ट की मंगला शर्मा का कहना है वह इस मामले को अन्तरराष्टï्रीय मानवाधिकार मंच पर ले जाने की तैयारी में जुटी है।

बुधवार, 16 मई 2012

नेत्रहीनों के लिए धृतराष्ट्र सत्ता!




दिनेशचंद्र मिश्र
लखनऊ। पंजाब नेशनल बैंक की हलवासिया शाखा में काम करने वाले एसके सिंह की आंखें दुनिया की रंगीनी नहीं देख सकतीं, लेकिन वे यह महसूस जरूर कर रहे हैं कि भारत सरकार देश के अर्थ को लेकर अंधी तो है ही, अंधों को लेकर भी अंधी है। रिजर्व बैंक की ओर से जारी किए गए एक, दो व पांच रुपए के नए सिक्के नेत्रहीनों के लिए मुसीबत बन गए हैं। इससे सरकार की नेत्रहीनों प्रति संवेदनशीलता का भी पता चलता है। श्री सिंह का कहना है कि पचास पैसे व एक रुपए के नए सिक्के एक ही आकार के हैं। वहीं पांच रुपए का नया छोटा सिक्का भी एक रुपए के नए सिक्के के समान ही है। नेत्रहीन सिक्कों को टटोलकर ही पहचानते हैं। नए सिक्के में नेत्रहीनों के लिए कोई पहचान का निशान न होने के कारण काफी दिक्कतें हो रही हैं। कई बार एक के धोखे में पांच का सिक्का चला जाता है। यह दर्द सिर्फ नेत्रहीन एसके सिंह का ही नहीं बल्कि उनके जैसे हिन्दुस्तान के एक करोड़ से ज्यादा लोगों का है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में एक करोड़ 25 लाख लोग दोनों आंखों से और करीब 80 लाख लोग एक आंख से देखने में अक्षम हैं। यह संख्या पूरे विश्व के नेत्रहीनों की एक चौथाई है।
भारत में नेत्रहीनों की इतनी संख्या होने के बाद भी केंद्र सरकार द्वारा रुपए के नए लोगो को जारी करने के बाद जो नए सिक्के जारी किए गए हैं, उसको लेकर अपने ही निर्देश को ताक पर रख दिया गया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को भारत सरकार ने सिक्कों में एक विशेष पहचान कट और नोट में खास पहचान बनाने का निर्देश है, ताकि इनको नेत्रहीन आसानी से टटोलकर पहचान कर लें। आरबीआई द्वारा जारी नए सिक्कों में इसका ध्यान न रखने के कारण नेत्रहीनों के साथ बुजुर्ग भी भ्रम के शिकार हो जाते हैं। 
बीए करने के बाद स्पेशल बीएड कर रहे अनिल कुमार वर्मा की आंखों में भी रौशनी नहीं है। नए सिक्के को लेकर अक्सर यह भी भ्रमित हो जाते हैं। पुराना जो सिक्का होता था, उसमें नेत्रहीनों के लिए कट होता था, लेकिन नए सिक्के जो जारी किए गए हैं, उसमें मानक का ध्यान न रखने से नेत्रहीनों को सबसे ज्यादा दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। अनिल का कहना है एक रुपए, पांच रुपए का नया सिक्का व पचास पैसे का पुराना सिक्का एक ही तरह का है। इस कारण हम लोगों को काफी परेशानियां आ रही है। लखनऊ आए ललितपुर कलक्ट्रेट में तैनात नेत्रहीन संतबली चौधरी से जब नए सिक्कों को लेकर बात हुई तो वह भी अपनी पीड़ा छिपा नहीं सके। उनका कहना है पांच रुपए का नया सिक्का और पचास पैसे व एक रुपए का सिक्का लगभग एक ही आकार और वजन का है। इन सिक्कों में किसी कट का निशान न होने के कारण रोजाना दिक्कतों से दो-चार होना पड़ता है। 
नेत्रहीन क्षत्रपाल शर्मा भी नए सिक्कों को पहचानने में होने वाली परेशानी से दुखी है। उनका कहना है लगता है सरकार को अब पैसे से मतलब है, संवेदनशीलता उसके अंदर खत्म हो गई है। एक करोड़ से ज्यादा नेत्रहीन किस तरह नए सिक्कों को पहचानेंगे? इसके बारे में सरकार ने सोचा ही नहीं है। आरबीआई द्वारा जारी नए सिक्कों को जारी करने से पहले नेत्रहीनों के बारे में न ध्यान देने को लेकर राष्ट्रीय दृष्टिबाधित संस्था इस मुद्ïदे को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित करने की रणनीति बना रही है। संघ के अध्यक्ष जेपी कांडवाल का कहना है कि वित्त मंत्री के साथ प्रधानमंत्री को इस बारे में खत भेजा जाएगा। खत पर ध्यान नहीं जाएगा तो नेत्रहीन सरकार की आंखें खोलने के आंदोलन की अगली रणनीति बनाएंगे। 

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

मरते दम तक मैं कहूंगी कि हिंदू हूं

दिनेश चंद्र मिश्र
‘किस तरह करूं फरियाद मैं, यकीन हो दुनिया को कि मैं हिंदू हूं, मैं होश में हूं, मैं जानती हूं, मेरा नाम रिंकल हैं, मैं हिंदू हूं, पढ़ाया गया कलमा वो सबको दिखता है, अब क्यों नहीं माना जा रहा मैं हिंदू हूं, मालूम है नहीं मिलेगा इंसाफ मुझे, मेरे खिलाफ सब हैं क्योंकि मैं हिंदू हूं, और क्यों मैं इस दुनिया को सबूत दूं, दुनिया को चीख-चीख कर कह रही हूं कि मैं हिंदू हूं, मेरा रब करेगा इंसाफ मुझसे, मैं मरते दम तक कहूंगी कि हिंदू हूं।’ यह पैगाम है रिंकल का। पाकिस्तान के सिंध प्रांत के मीरपुर मथेलो की रिंकल कुमारी का पिछले दिनों अपहरण किया गया था। उसका धर्म परिवर्तन कराकर उसे मुसलमान बनाया गया फि र 24 फरवरी को नावीद शाह नाम के एक मुस्लिम युवक से उसकी शादी करा दी गई। रिंकल को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया। रिंकल मां-बाप के पास जाना चाहती है, मामला सुप्रीम कोर्ट में गया लेकिन अभी तक वहां से भी इंसाफ नहीं मिला है। सुप्रीम कोर्ट ने रिंकल को फिलहाल संरक्षण गृह भेज दिया है, इस मामले की फिर सुनवाई 18 अप्रैल को होनी है। संरक्षण गृह से रिंकल ने एक पैगाम अपनी मां और पाकिस्तान की हिंदू आवाम के नाम भेजा है। इस पैगाम को रिंकल की मां ने सोशल नेटवर्किंग साइट्ïस पर ‘कैनविज टाइम्स’ के साथ शेयर किया है। इस मामले की कोर्ट में सुनवाई के दौरान रिंकल ने रोते हुए कहा ‘हम मां के पास जाना चाहते हैं।’ लेकिन दूसरे पक्ष के वकील ने कहा लडक़ी ने कलमा पढ़ लिया है, अब वह हिंदू नहीं है। पाकिस्तान के नारी संरक्षण गृह दारुल अमीन जाने से जब रिंकल ने इंकार कर दिया तो पुलिस उसको घसीटते हुए ले गई। दारुल अमीन में रो-रोकर बेहाल रिंकल   ने उनसे मिलने गईं पाकिस्तान हिंदू काउंसिल की मंगला शर्मा के हाथों एक पैगाम भिजवाया। उस पैगाम में उसका दर्द, मजबूरी और पाकिस्तान में इंसाफ के हाल को बखूबी समझा जा सकता है।
रिंकल की दर्दभरी अपील के बाद पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं की आवाज उठाने के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट पर एक अभियान छिड़ गया है। पाकिस्तान हिंदू वायस सहित कई पेज फेसबुक पर बने हैं, जहां रिंकल को न्याय दिलाने के लिए साथ में आवाज उठाने की गुजारिश की जा रही है।
पाकिस्तान में हिंदुओं की नाबालिग लड़कियों का अपहरण करके जबरन धर्मांतरण के बाद निकाह किया जाना आम बात हो गई है, लेकिन रिंकल की बहादुरी को देखकर इसके पहले ऐसे हादसे से गुजर चुकी कई महिलाएं भी अब अपना इंसाफ मांगने के सामने आने लगी हैं। पाकिस्तान में हिंदुओं के खिलाफ  अत्याचार की एक और घटना की शिकार लता तेजाब से झुलसे अपने चेहरे के साथ न्याय के लिए सामने आई है। घटना सिंध प्रांत के ग्रामीण इलाके की है जहां हिंदू समुदाय की एक नाबालिग लडक़ी लता की शादी जबरन एक मुसलमान युवक के साथ करा दी गई। लता ने बंदूक की नोक पर भी निकाह कबूल नहीं किया तो उसका चेहरा जला दिया गया। चेहरे पर तेजाब का घाव लेकर लता ने भी बुधवार को पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के पदाधिकारियों से मुलाकात करके इंसाफ की गुहार लगाई है। पाकिस्तान सरकार हिंदुओं के साथ हो रही जुल्म-ज्यादती की घटनाओं पर चुप्पी   साधे है।
इसको लेकर भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ई-मेल भेजकर गुहार लगाई गई थी, लेकिन पाक राष्टï्रपति जरदारी के दौरे के दौरान मनमोहन सिंह की चुप्पी से पाकिस्तान के हिंदू मर्माहत हैं। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के पदाधिकारियों ने इस मामले में विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारियों के साथ सांसद योगी आदित्यनाथ से भी सम्पर्क साधा है ताकि भारत की संसद में पाकिस्तान के हिंदुओं के साथ हो रही जुल्म-ज्यादती की कहानी वह अंतरराष्टï्रीय मंच पर उठा सके।

सोमवार, 26 मार्च 2012

अजब की आंखों में दिखी भरत मिलाप की गजब चमक



रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 26
पहली जनवरी की सुबह जब नींद खुली तो भगवान भास्कर के तेज से सर्द हवाएं थोड़ा गर्म हो चली थी। फ्रेश होने के बाद मीटिंग के आफिस पहुंचा तो संपादक जी आ चुके थे। एक दूसरे को हैप्पी न्यू ईयर कहने का दौर दस-पंद्रह मिनट तक चलता रहा। मीटिंग का कोरम पूरा होने के बाद सबसे पहला काम पिता जो को फोन लगाने का किया, क्योंकि पहली जनवरी को पिता जी का जन्मदिन होता है। नौकरी से पहले बस्ती में जब घर पर सभी लोग रहते थे तो पिता जी के जन्मदिन को गर्मागर्म जलेबी और दही खाकर मनाया जाता था। जुबान आज भी वह जायका नहीं भूली। पिता जी को प्रणाम करके आर्शीवाद लेने के बाद जब उन्हें इस जायके की याद दिलाई तो उन्होंने बड़े प्यार से समझाते हुए कहा कि नौकरी के चक्कर में तुम घर से इतनी दूर चले गए हो, वहां पर घर जैसा जायका कहां मिलेगा। मेरी बात मानो तो अभी भी घर आ जाओ, मैने उनको आश्वस्त करते हुए कहा कि जल्दी ही आएंगे। पिता जी से बात करने के बाद बनारस में फोन मिलाया तो छोटी बेटी ने फोन उठाते ही उलाहना भरे स्वर में कहा पापा मुझे अपने सहेलियों को न्यू ईयर कार्ड देना है कौन खरीदवाएगा। घर में मेरी छोटी बेटी को मेरी इस पत्रकारिता की नौकरी से होने वाली दूरी की सबसे ज्यादा शिकायत रहती है। उसको  समझाते हुए कहा कि तुम्हारे लिए ग्रीटिंग कार्ड यहां से ले आऊंगा। साल के पहले ही दिन अपनो से इतनी दूरी होने के कारण मन बहुत उदास हो गया था। आफिस से पैदल ही तवी नदी का पुल पार करते हुए रघुनाथ बाजार पहुंच गया। दिल में भगवान राम का दर्शन करने की इच्छा जागृत हुई। रघुनाथ मंदिर के सामने जम्मू में मित्र बन गए नवीन की ड्राई फ्रूट की दुकान पर पहुंचा। बेल्ट और मोबाइल रखकर दर्शन के लिए लाइन में लग गया। गेट पर तैनात सीआरपीएफ के जवान अजब सिंह यादव से एक बार फिर मुलाकात हुई। हैप्पी न्यू ईयर बोलने के बाद उसकी आंखों में जो अपनत्व की चमक दिखी, उसे देखकर लगा राम-भरत का जब चित्रकूट में मिलाप हुआ होगा तो शायद उनकी आंखों में यही चमक रही होगी। अजब सिंह बोले दर्शन करके वापस आइए फिर आपसे बात करते हैें। भगवान का स्मरण करते हुए मंदिर के अंदर पहुंचा सामने रामदरबार सजा था, आंख बंदकर शीश झुकाकर मन में कहा कि आप तो भगवान है, सर्वज्ञ है। मेरी व्यथा से भलीभांति परिचित है। इसलिए मेरे लिए जो उचित समझे वही कीजिएगा,जरूर कीजिएगा प्रभु। प्रार्थना करने के बाद मंदिर से बाहर निकला तो अजब सिंह यादव राह ही देख रहे थेे। देखते ही बोले गुरु जी नववर्ष पर मेरी तरफ से एक चाय स्वीकार लीजिए। उनके आग्रह भरे स्वर को सुनकर उनके साथ चाय की दुकान की तरफ बढ़ गया। अजब सिंह बोले मिश्रा जी आपने करवाचौथ पर जो खबर लिखी थी.. आसमां में निकलेगा चांद, आवाज में दिखेगी अक्स, उसको मेरी घरवाली ने भी पढ़ा था। करवाचौथ के अगले दिन उसका फोन आया। वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है, सिर्फ दस्तखत बना लेती है, अखबार पढ़ लेती है। एकाध बार मेरे साथ पिक्चर देखने गयी है। उस खबर को पढक़र इतना खुश हुई कि पूछिए मत। मैने हंसते हुए कहा चलिए आप लोगों के दिल की बात मैं आपके घरवालों तक पहुंचा सका, इससे बड़ी खुशी मेरे लिए और कुछ नहीं हो सकती। अजब सिंह का दिल अभी कुछ कहने को बेताब था, चाय की चुस्कियों के संग मैने कहा भाई आपकी खुशी मेरी खुशी है। वह बोले मिश्रा जी दस साल शादी को हो गए हैं, पहली बार मेरी घरवाली ने उस खबर को पढक़र बोला आई लव यू। बीबी का इतना प्यार पहली बार देखा, उसने अगल-बगल में सबको उस खबर पढ़ाया। अजब सिंह भाव-विह्वïल हो गए थे, बोले मिश्रा जी आपके लिए मैं कुछ नहीं कर सकता लेकिन आपका यह भाई अगर किसी भी दिन थोड़ा सा भी आपके काम आ गया तो अपने को धन्य  समझेगा। अजब की बातों को सुनकर मैं भी अपने को रोक नहीं सका, बोला भाई आप मेरे लिए क्या भारत मां की रक्षा के लिए जिस तरह सतत जुटे हैं, उसके लिए मैं आपके किसी काम आया, तो यह मेरा अहोभाज्य है। इसके लिए आप अमर उजाला को धन्यवाद दीजिए जिसने आपके  दिल की बात को देश के कोने-कोने तक पहुंचायी। चाय खत्म हो चली थी, अजब सिंह से विदा लेकर सूरी ड्राई फ्रूट पर पहुंचा तो नवीन को देखते ही जय माता की कहकर अभिवादन किया। बेल्ट और मोबाइल थमाते हुए नवीन बोले आपके फोन पर कई काल आए हैं,चेक कर लीजिएगा। जींस में बेल्ट लगाने के बाद मोबाइल पर निगाह डाली तो चौंक गया। अमर उजाला के तत्कालीन समूह संपादक शशि शेखर और जम्मू के संपादक प्रमोद भारद्वाज के पांच मिस्ड काल थे। दिमाग में तरह-तरह के अच्छे-बुरे ख्याल आने लगे और सोच में पड़ गया कि अचानक ऐसा क्या हो  गया  कि जो शशि शेखर जी को दो बार फोन करने की जरूरत पड़ी। दिमाग में यही उधेड़बुन चल रही था कि प्रमोद भारद्वाज का फिर से फोन आ गया.. मैने कहा प्रणाम सर.. वह बोले कहां हो तुम, न मेरा फोन उठा रहे हो व न बिग बास का? उनको अपने रघुनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन करने के बारे में बताया तो वह शांत स्वर में बोले बास(शशि शेखर) का फोन आया था, उन्होंने वह कल तुमको नोएडा में बुलाया हैं। मैने तुम्हारा पूजा एक्सप्रेस मैं रिर्जवेशन करा दिया है, तुम आज रात को नोएडा से निकल जाओ, तुम्हारे पास यहां सामान क्या है? केवल एक एयर बैग सर..उन्होंने उसको भी लेते जाना। अचानक इस आदेश को सुनकर दिल में कई तरह के सवा उठने लगे। मैने पूछा कोई खास बात है सर? प्रमोद जी बोले मुझे कोई जानकारी नहीं है, बास का जिनता आदेश था, उतना बता दिया, बाकी माता रानी का आर्शीवाद तुम्हारे साथ है। घड़ी की ओर नजर डाली तो दोपहर के एक बज गया था। रघुनाथ मंदिर से सीधे गांधीनगर स्थित मकान पर पहुंचा। तो अचानक दोपहर में आया  देखकर अनिमेष और योगेंद्र चौंक गए, बोले सर.. आप इस समय कैसे? उनको पूरी बात बताते हुए बैग पैक करने में लग गया। एक घंटे में अनिमेष के साथ अमर उजाला आफिस पहुंचा। बैग रखने के बाद रघुनाथ बाजार पहुंचकर कुछ जरूरी खरीदारी की, पुन:वापस पहुंचा। आफिस पहुंचा तो प्रमोद भारद्वाज जी आफिस में नहीं थे, उनसे फोन पर बात हुई तो उन्होंने अनुमति देते हुए कहा कि तुम चले जाओ फिर मुलाकात होगी। पर इतने दिनों में उनसे जो आत्मीयता और प्रगाढ़ता हो गयी थी, उस कारण उनसे बिना मिले चले जाना दिल को गवारा नहीं था।  मैने अनिमेष से पूछा संपादक जी का घर जानते हो, उसने जैसे हामी भरी हम दोनों तुरंत संपादक जी के घर पहुंचे। मैने उनके चरण स्पर्श कर आर्शीवाद लिया तो मिठाई खिलाने के बाद उन्होंने कहा कि इतने दिनों में तुम्हारे साथ काम करने में जो आनंद आया है, उसको मैं हमेशा मिस करता रहंूगा। जाओ बास से मिलो और संपर्क बनाए रखना। भगवान ने चाहा तो फिर मुलाकात होगी। उनकी आत्मीयता की मिठास से भरी बातों को सुनकर मेरी आंखें नम हो गयी। नमी को रोकते हुुए,उनके विदा ली। विक्रम चौक आने के बाद अनिमेष और बाकी साथियों से मिलकर विदा लेने के बाद जम्मू रेलवे स्टेशन के लिए आटो में सवार हुआ। स्टेशन पर पहुंचा तो ट्रेन लग चुकी थी, अपनी सीट पर बैठने के बाद मैं फिर सोचने लगा कि जम्मू से अचानक नोएडा के लिए आए बुलावे में, मेरे लिए क्या संदेश हो सकता है। और इस खबर को घर पर दूं या नहीं? ऐसे सैकड़ों सवाल के साथ पूजा एक्सप्रेस में नईदिल्ली के लिए यात्रा प्रारंभ की। ट्रेन की सीटी के साथ माता रानी को दिल से प्रणाम करने के साथ कहा मां अपना आर्शीवाद सदैव बनाए रखिएगा।
क्रमश: 

गुरुवार, 22 मार्च 2012

यूपी के बेरोजगारी बम में बड़ा दम

दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। टीईटी उत्तीर्ण मोर्चा के बैनर तले मंगलवार को राजधानी की सडक़ों पर बेरोजगारी बम की शक्ल में युवा से लेकर अधेड़ हो गए हजारों लोग को हुजूम दिखा। इनके कंधों पर टंगे झोले में टीईटी उत्तीर्ण प्रमाणपत्र संग जाब की जंग में काम आने वाले जरूरी कागजात तो दिल में हक के लिए किसी से भी टकराने की ताकत की झलक आपको हाव-भाव देखकर हो जाएगा। लाठी-गोली और पानी की बौछार खाकर तरबतर होकर घर लौट रहे दर्जनों अभ्यर्थियों से चारबाग रेलवे स्टेशन पर इस खबरनवीस ने बात की। उनके दिल,दिमाग से जुडऩे की कोशिश में हुए सवाल-जवाब में बेरोजगारी बम से वास्ता पड़ा।
हुसैनचौराहे के पास से पुलिस ने लाठी से मारने का डर दिखाने पर भी दीवार की तरह खड़ा रहे सैकड़ों नौजवानों ने पानी की बौछार अपने सीने पर रोकते हुए यह बताया कि गोली खाने का भी दम है, क्योंकि बेरोजगारी बम में बड़ा दम है। पानी की बौछार को छाती पर रोकने के बाद पुलिस जब अचानक बर्बर तरीके से पीटने लगी तो आठ-दस लाठी खाने के बाद भी दर्द को चेहरे पर न लाने देने वालों में इलाहाबाद के सौरभ सिंह  उत्सर्ग एक्सप्रेस का इंतजार करते मिले। अपना परिचय देते हुए जब कहा कि तुम्हारे अंदर दम है तभी लाठी-डंडा खाने के बाद भी फिर लडऩे के मूड में बैठे हो। सौरभ का जवाब सुनकर कान खड़े हो गए, बोला यह हमारा नहीं यूपी के बेरोजगारी बम का दम है। डिग्री लेकर नौकरी के लिए दर-दर ठोकर खा रहे करोड़ों अभ्यर्थियों की भीड़ कभी सेवायोजन दफ्तर पर लैपटाप से लेकर बेराजगारीभत्ता पाने की आस में टूट पड़ती है तो कभी लाखों की शक्ल में टीईटी की डिग्री लेकर न्याय की जंग लड़ रहे है। न्याय के लिए टकराने की ताकत शरीर से नहीं दिल,दिमाग के साथ पेट से भी पैदा होता है। यही ताकत मेरे अंदर है..सौरभ की यह बात सुनकर दो बच्चों की मां सुषमा भी बोल पड़ी, हमारे अंदर भी यही ताकत है। यही ताकत पोलिंग बूथ पर उमड़ी तो कांग्रेस के सियासी युवराज की मेहनत मिट्ïटी में मिल गई तो मिट्टïी से पले-बढ़े अखिलेश यादव को प्रदेश का युवराज बना दिया। .. सौरभ को बंदे में है दम की तर्ज पर सलाम करने के बाद पीनी से भीगने के बाद चाय की चुस्की ले रहे सहारनपुर से आए विनोद बोले सरकार को टेट पास बेरोजगारों को टेट मैरिट के आधार पर नौकरी देनी चाहिए। उत्तर प्रदेश में टेट पास बेरोजगारों पर लाठियां चलाना सरासर अन्याय है। इस अन्याय को टेट पास बेरोजगार कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे। टेट पास बेरोजगारों को आर्थिक और मानसिक बहुत नुकसान हुआ है। टेट में आवेदन प्रक्रिया से लेकर अब तक हजारों रुपये बर्बाद हो चुके हैं और अब वे न्याय की उम्मीद में यहां आए तो सरकार ने उन पर लाठियां बरसाकर टेट पास बेरोजगारों के दुखों में और इजाफ ा ही किया है। हमारी सरकार से गुजारिश है कि टेट पास बेरोजगारों के साथ न्याय करते हुए अविलम्ब उनके लिए नौकरी का रास्ता साफ  किया जाये। गाजियाबाद के दीपक का कहना है टेट स्टूडेंट के साथ अन्याय की हद हो गयी है। मासिक आर्थिक और शारीरिक शोषण किया जा रहा है। मेरठ के अविनाश सिंह का कहना है कुछ अफसरों की वजह से 270000 युवा निराश हो रहे है उन्हें अपना भविष्य अंधकार मय दिखाई दे रहा है। अगर सरकार ने इस मुद्ïे को गंभीरता से न लिया तो यह मंडल आयोग की तरह बड़ा आंदोलन हो जाएगा। हमारी मांग है सरकार जल्दी से जल्दी भर्ती करे। इटावा के बृजेश दीक्षित ने कहा हमारी प्रार्थना नेता जी से है, जिस तरह वह बेरोजगारों की जिंदगी बदलने के लिए लैपटाप,भत्ता आदि बांट रहे हैं, उसी तरह लाखों बेरोजगारों के साथ न्याय करें। गोरखपुर की कृष्णा का कहना है हमारे साथ धोखा हो रहा है। टेट से लेकर आवेदन तक औसतन एक लडक़े का 10000 रुपये का खर्चा हुआ है। माननीय अखिलेश जी से विनम्र निवेदन है कि अब देर न करें और जल्द से जल्द भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाये, हमें आपसे बहुत आशाएं है।  गाजीपुर के चंदकमल ने कहा अगर सरकार ने भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं करायी तो टेट अभ्यर्थी आत्मदाह भी करने के लिए तैयार हैं।

मदर इंडिया का जमीदार दाने-दाने को मोहताज

दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। सुपर-डुपर हिट फिल्म मदर इंडिया आपने देखी तो वह दृश्य याद ही होगा जब गांव का जमींदार सुनील दत्त को मारता है तो नरगिस दत्त रोते हुए कहती है..मेरे बेटे पर रहम करो, मत मारो। मदर इंडिया में जमींदार का रोल करने वाले कलाकार का नाम था संतोष कुमार खरे। मदर इंडिया में जमींदार तो मेरा नाम जोकर में राजकपूर के साथ सर्कस का सहयोगी कलाकार सहित सैकड़ों फिल्मों में यादगार रोल करने वाला यह शख्स आज दाने-दाने को मोहताज है। सत्तर बसंत देख चुके संतोष आज राजधानी के ह्दयस्थली हजरतगंज स्थित हनुमान मंदिर के इर्दगिर्द लोगों के हाथ फैलाकर जीवन गुजर-बसर कर रहे हैं। 
छह महीने पहले शराब के नशे में धुत एक कार चालक द्वारा हजरतगंज चौराहे पर कार चढ़ा देने से चलने-फिरने से लाचार संतोष वैशाखियों के सहारे ही चलते हैं। शनिवार को इस खबरवीस का कान उस वक्त खड़ा हो गया जब अंग्रेजी मेें इस शख्स ने एक कप चाय पिलाने की गुजारिश की। फटेहाल बुजुर्ग के अंग्रेजी में मिन्नत को सुनकर संतोष के साथ इस खबरनवीस ने एक कप चाय पीने के साथ जिंदगी के तार छेड़े तो जो कहानी निकलकर आयी, उसे सुनकर पीड़ा,करुणा के साथ फिल्मी दुनिया के रंगीन चकाचौंध के पीछे का काला सच दिखेगा। चाय की गुजारिश सुनकर चौधरी स्वीट से चाय के साथ आलू टिक्की लाकर देने के बाद उनसे दोस्ताना अंदाज में बात हुई तो दाने-दाने को मोहताज इस कलाकार की जो कहानी सामने आयी उसे सुनकर सूखी आंखों से भी पानी निकल आएगा। सन्ï 1942 में बांदा जिले के कटरा मोहल्ले में अधिवक्ता परिवार में पैदा हुए संतोष बीकाम करने के बाद मुंबई चले गए। नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन में जूनियर आर्टिस्ट के रुप में भर्ती होने के बाद फिल्मों में छोटे-मोटे रोल उस समय दस रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मिलने लगे। मदर इंडिया में सुनील दत्त के साथ जमींदार के चंद मिनट के रोल में एक छाप छोडऩे के बाद फिल्मी दुनिया में संतोष की गाड़ी चल निकली। दिलीप कुमार के साथ यहूदी की लडक़ी, मुगले-ए-आजम,राजकपूर के साथ मेरा नाम जोकर, बारिश,,कमाल अमरोह की पाकीजा सहित सैकड़ों फिल्मों में काम किए संतोष को गंूज उठी शहनाई फिल्म में एक बेहतरीन रोल मिला। मुंबई से पूना के रास्ते में सतरा जिले में शूटिंग के दौरान आयशा नामक की जूनियर आर्टिस्ट से प्यार भी हुआ। गंूज उठी शहनाई की शूटिंग के बाद जब फिल्म यूनिट मुंबई लौटने लगी तो आयशा को रोते हुए छोडक़र संतोष आए, आज भी उसकी याद में वह अक्सर अकेले रोते हैं। आयशा को अपना नहीं बना सके तो शादी न करने का वचन लेते हुए ब्रम्ह्चारी बन गए। प्यार के पुराने तार छेडऩे पर वह कहते प्यार की याद मत दिलाइए अकेले अक्सर रोता हूं, फिर रुलाएंगे क्या आप। आज आयशा पता नहीं किस हाल में हो, लेकिन उसकी याद में अक्सर वह रोते हैं। लखनऊ कैसे पहुंचे? मुंबई में जब भीषण बाढ़ आयी थी तो उस दौरान मुंबई के विले पार्ले में वचन फिल्म बनाने वाले एके गोयल के घर पर ही रहते थे। फिल्मों में काम मिलना कम हो गया था, उसके बाद मुंबई से बांदा के लिए निकल दिया, अब लखनऊ पहुंच गया हूं, तबसे यहीं बजरंगबली के भरोसे जिंदगी कट रही है। कोई कुछ खाने को दे देता है तो उसके सहारे ही गुजारा बसर हो रहा है। एनएफडीसी जूनियर आर्टिस्टों की मदद के लिए साढ़े चार हजार रुपए महीने में मदद मिलती थी, पिछले सात महीने से वह भी बंद है। वेलफेयर फंड से मिलने वाला पैसा बैंक एकाउंट में आ जाता था, एटीएम से निकाल लेता था। अब तो एकांउट में चार हजार रुपए बचे हैं, रात दारुलशफा के बी ब्लाक में पूर्व मंत्री पारसनाथ मौर्य के घर के बाहर सोता हूं। उनको एटीएम का पासवर्ड दे दिया हूं, कह दिया हूं जिस दिन मर जाऊं तो मेरी लाश जलवा दीजिएगा। घर में कोई नहीं है? मां-बाप है नहीं छोटा भाई जबलपुर रेलवे में एकाउंटेंट के पद पर है। आनंद खरे नाम है, वह जानता है मैं लखनऊ में दाने-दाने को मोहताज हूं, लेकिन कभी देखने नहीं आया। अब तो बजरंगबली ही बेड़ा पार करेंगे। दिमाग कम काम करता है, शरीर भी जवाब दे रहा है। लखनऊ के लोग दिलदार है, खाने-पीने को दे देते हैं, उससे ही गुजारा होता है।

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

पाकिस्तान के हिंदुओं का मायावती को पैगाम

पाकिस्तान के हिंदुओं का मायावती को पैगाम
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। पाकिस्तान के हिंदुओं ने प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को एक पैगाम भेजा है। इस पैगाम में पाक के दलितों के दर्द संग मदद की गुहार की आस भी है। यह पैगाम हिंदुओं के भलाई के लिए काम करने वाली पाकिस्तान हिंदू समिति(पीएचएस)ने भेजा है। पीएचएस के पैगाम में पाकिस्तान के दलितों के उत्पीडऩ की नहीं बल्कि मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार स्थल की बदहाली की कहानी है। पीएचएस को आस है कि मायावती ने दलितों के लिए जिस तरह उत्तर प्रदेश में ढेरों योजनाएं चलाई उसी तरह पाकिस्तान के हिंदू दलितों के अंतिम संस्कार स्थल के पुर्ननिर्माण के लिए मदद करेंगी। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो व प्रदेश की मुख्यमंत्री को पीएचएस की ओर से भेजे गए पैगाम में कराची शहर में मौजूद दलितों के अंतिम संस्कार स्थल की बदहाली का जिक्र करते हुए वहां की एक फोटो भी भेजी गयी है। इस फोटो को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि दलितों के अंतिम संस्कार स्थल किस हाल में है। कराची में हिंदुओं के अंतिम संस्कार के लिए तीन स्थान हैं, इसमें से एक दलितों का प्राचीन कब्रिस्तान है। जंगली झाडिय़ों से घिरे अंतिम संस्कार स्थल में कचरा भरमार होने से अंतिम यात्रा में शामिल होने वाले लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। आवारा जानवरों की भरमार के साथ शव को दफनाने की कोई व्यवस्था नहीं है। हिंदू दलितों की संख्या पाकिस्तान में ज्यादा है। इसमें अंतिम विश्राम के लिए यही शवों को लाया जाता है। इस अंतिम संस्कार स्थल में मारवाड़ी, मद्रासी, मराठा के साथ सिखों को भी लाया जाता है। हजारों हिंदुओं की कब्रों के होने के बाद रखरखाव की व्यवस्था न होने के कारण टूटी दीवार के चलते नशेडिय़ों का अड्ïडा भी यह स्थान बना है। अंतिम यात्रा के लिए आने वाले लोगों को यहां भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि कोई भी सुविधा नहीं है। अंतिम संस्कार स्थल पर कब्र खोदने का काम करने वाले सुहेल अहमद ने पाकिस्तान हिंदू
समिति से संपर्क करने के बाद इसके पुर्ननिर्माण की गुजारिश की। पीएचएस के पदाधिकारी वहां जाकर देखे तो सुविधाओं के नाम पर सन्ï 1984 से एक कोने में एक टूटी हुई बेंच भर है, जो श्री महाराष्ट्र पंचायत द्वारा दान किया गया  है। दिन में आने वाले शवों को किसी तरह तो दफना दिया जाता है लेकिन रात में आने वाले शवों को दफनाने के लिए बिजली तक की व्यवस्था न होने से मशाल का सहारा लेना पड़ता है। पीएचएस से जुड़े कालिदास ने कहा कि इसके पुर्ननिर्माण और सुविधाओं के लिए पाकिस्तान सरकार के पास 18.5 लाख रुपए का प्रोजेक्ट सालों से लंबित पड़ा है। इस धनराशि के न मिलने के कारण सडक़, बिजली जैसी मामूली सुविधाएं भी अंतिम संस्कार स्थल पर नहीं मिल पा रही है। कराची में तीन अंतिम संस्कार स्थलों में से एक ऊंची जातियों के लिए आरक्षित है। हिंदू दलितों के इस अंतिम संस्कार स्थल की साफ-सफाई के लिए पाकिस्तान हिंदू सेवा के कल्याण संगठन के स्वयंसेवकों ने एक दिन सफाई दिवस का आयोजन किया। पीएचएस ने ङ्क्षहदू दलितों के इस अंतिम संस्कार स्थल के पुर्ननिर्माण के लिए प्रदेश की मुख्यमंत्री को ई-मेल से खत भेजने के साथ इस सोशल
नेटवर्किंग साइट्ï पर रोमिंग जर्नलिस्ट के नाम से मौजूद खबरनवीस को भी इसकी कापी भेजी है। इस खत में बसपा सुप्रीमो से मदद की गुहार लगाई गई है ताकि हिंदू दलितों के अंतिम संस्कार के वक्त जो बदइंतजामी है, उसको खत्म किया जा सके।
दलित चिंतक व प्रमुख साहित्यकार मुद्राराक्षस का कहना है जिस तरह हिंदुस्तान में भेदभाव है, उसी तरह पाकिस्तान में भी स्थिति है। भेदभाव मनुष्य का स्वभाग है। वहां भी सामाजिक परिवर्तन के प्रयास चल रहे हैं, काफी लोग लगे हैं, खासकर महिलाओं की अच्छी-खासी संख्या है। पाकिस्तान में हिंदू दलितों के अंतिम संस्कार स्थल की दुर्दशा की जो कहानी सामने आयी है, वह पीड़ादायक है। हर जगह भेदभाव मुनुष्य का स्वभाव है। इस मामले में भारत सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए।  बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति व जनजाति छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष व युवा दलित चिंतक डा.प्रमोद कुमार का कहना पाकिस्तान की जो सामाजिक संरचना है वह हिंदुस्तान से अलग नहीं है। हिंदुस्तान में दलितों को मुख्य धारा में लाने के लिए संविधान निर्माता डा.भीम राव अंबेडकर ने जो पहल की है, उसे आज  यूपी की मुख्यमंत्री मायावती जी जो आगे बढ़ाई उसके कारण सामाजिक सोच में परिवर्तन हुआ। पाकिस्तान में आजादी के बाद ऐसी कोई पहल नहीं हुई, जिसके कारण हिंदू दलितों की बात हो या समग्र हिंदू समाज की दयनीय स्थिति है। वहां हिंदू  समाज के सामाजिक सरोकार की सुधबुध सरकार नहीं लेती। पाकिस्तान हिंदू समिति ने जो पैगाम मुख्यमंत्री जी को भेजा है, उस पर उनको गंभीरता से विचार करना चाहिए।

 

दिग्गी राजा की जब हो गई बोलती बंद

दिग्गी राजा की जब हो गई बोलती बंद
लखनऊ। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव दिग्विजय सिंह के बोल के आगे सबके बोल बेकार हैं, अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आपका नजरिया सोमवार को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दफ्तर में उनकी प्रेसवार्ता में जो कुछ हुआ, ...उसका हाल जानने के बाद बदल जाएगा।
चुनावी मौसम में पत्रकारों की जिस तरह संख्या बढ़ जाती है, उसी तरह आज टीवी चैनलों की तादाद में कई गुना इजाफा हो जाता है। बड़े नेताओं की प्रेसवार्ता का लाइव प्रसारण के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया के ओवी वैन के साथ कैमरों की भी भरमार रहती है। ऐसे माहौल के बीच आमतौर पर सभी दलों में प्रेसवार्ता होती है, लेकिन कांग्रेस के बड़े नेताओं का नखरे कुछ अलग रहते हैं। सोमवार को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव व प्रांतीय प्रभारी दिग्विजय सिंह की प्रेसवार्ता को कवर करने प्रिंट मीडिया के फोटोग्राफर भी दर्जन संख्या में उनके हाव-भाव को कैमरे में कैद करने के लिए पहुंचे थे। मीडिया रूम में आने के बाद दिग्विजय सिंह ने दो मिनट का समय प्रिंट फोटोग्राफरों को देते हुए बोले ‘अच्छा आप लोग अब चलिए’ एक बार उनकी आवाज जब पे्रस फोटोग्राफर नहीं ध्यान दिए तो फिर बोले ‘चलिए-चलिए’। चुनाव के मौसम में कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद सहित कई बड़े नेताओं के साथ दिग्विजय सिंह के मुंह चलिए-चलिए का डायलॉग सुनने के बाद फोटोग्राफर उनके ऊपर भडक़ उठे। द हिंदू के वरिष्ठ फोटोजर्नलिस्ट सुबीर दा दिग्विजय सिंह को अंगुली दिखाते हुए बोले जब यह सलूक करना है तो प्रेसवार्ता में क्यों बुलाते हैं। दिग्विजय सिंह ने कहा मुझे कोई दिक्कत नहीं है इलेक्ट्रानिक मीडिया के फोटोग्राफरों को दिक्कत है। दिग्विजय सिंह अपनी बात में इलेक्ट्रानिक मीडिया के फोटोग्राफरों से हां में हां करवाने में जुट गए। खैर पांच मिनट तक प्रेस फोटोग्राफर और दिग्विजय के बीच इस मुद्ïदे को लेकर कहासुनी होती रही। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दो नेता जब फोटोग्राफरों को समझाने आए तो उनको डांट कर किनारे कर दिया गया। पांच मिनट तक कहासुनी के बाद प्रेस फोटोग्राफर वहां से चले गए। दिग्विजय सिंह को पूरे घटनाक्रम के दौरान ऐसा लगा जैसे उनकी बोलती बंद हो गई। दिग्विजय सिंह के चलिए-चलिए के अंदाज पर नाराजगी जाहिर करने वालों में सुबीर दा के साथ प्रमोद शर्मा, मो. अशफाक, मो. अतहर, रितेश यादव, सुशील सहाय सहित कई लोग थे।

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

राष्टपति शासन या जनादेश का शासन!

राष्टपति शासन या जनादेश का शासन!
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। यूपी में सत्ता हथियाने की जो रण छिड़ा है, उसमें सबके अपने-अपने हथियार है। चुनाव जैसे-जैसे सूबे में हो रहे हैं, वैसे-वैसे रणनीति की राह पर राजनीतिक दलों के सूरमा अपने हथियारों को चमकाने लगे हैं। सबके अपने हथियार अपनी रणनीति है वोट हथियाने से लेकर कुर्सी पाने तक की। इस सियासी संग्राम में प्रदेश की सत्ता से 22 साल से दूर कांग्रेस की रणनीति की जो राह दिखाई पड़ रही है, उसमें कुर्सी से पहले राष्टï्रपति शासन दिखाई ही नहीं दे रहा है बल्कि धमकी के अंदाज में सुनाई पडऩे लगा है। कभी यह धमकी मतदाताओं को कांग्रेस के बड़े नेता तो कभी केंद्रीय मंत्री दे रहे हैं। कांग्रेस के बड़े नेताओं की धमकी को राजनीतिक पंडित जुबान फिसलने या मीडिया द्वारा बयान को तोड़मरोड़ कर पेश करने की तर्क को खारिज करते हुए कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा बताते हैं। राजनीतिक जानकार भी इन सबको देखने और सुनने के बाद रणनीति की राह में राष्टï्रपति शासन को देखने लगे हैं।
यूपी में तेरहवीं बार राष्टï्रपति शासन की आहट को समझने के लिए आपको चुनाव की तारीखों की घोषणा से समझना होगा। वर्तमान समय में प्रदेश में पंद्रहवी विधानसभा विद्यमान है, तेरह मई 2007 को इसका गठन हुआ था, पांच साल के हिसाब से कार्यकाल तेरह मई 2012 को पूरा होगा। ऐसा लगता है यूपी में वापसी के लिए बेताब कांग्रेस की बैचेनी को समझते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने आनन-फानन में तारीख की घोषणा कर दी। हड़बड़ाहट इस कदर थी कि देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी ने पहले चरण का चुनाव मुसलिमों के पाक त्योहार वारावफात के दिन ही रखने के साथ इसकी घोषणा कर दी। चुनाव तरीखों की घोषणा के बाद जब राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया तो पहले चरण का चुनाव तीन मार्च को कर दिया। वोटों की गिनती छह मार्च को होगी, आठ मार्च को होली है। होली के त्योहार को राजनीति के रंग से बदरंग बना दिया। होली के बाद सोलहवीं विधानसभा के गठन की घोषणा निर्वाचन आयोग द्वारा कर दी जाएगी। अब सवाल यह उठता है कि मान लीजिए प्रदेश में किसी दल को बहुमत नहीं मिला तब क्या-क्या होगा। एक तरह छह मार्च को निर्वाचन का प्रमाणपत्र लिए नए परिसीमन के हिसाब से चुने गए विधायक होंगे तो दूसरी वह विधायक होंगे जिनका कार्यकाल कायदे के हिसाब से 13 मई 2012 को पूरा होगा। छह मार्च से तेरह मई के बीच लगभग सवा दो महीने तक सूबे में क्या-क्या होगा? अगर किसी दल को बहुमत नहीं मिला तो विधायकों की खरीद-फरोख्त का खेल होगा। यूपी के राजनीतिक इतिहास को देखे तो चुनाव परिणाम आने के एक सप्ताह के भीतर अक्सर यह खेल हो गए हैं। किसी दल को बहुमत न मिलने पर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के साथ वर्तमान विधायक बने रहेंगे, ऐसे में संख्याबल में जो भारी होगा, उसके पक्ष में खड़े होने के लिए पालाबदल करने वाले नवनिर्वाचित विधायकों को रोकने के लिए प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करवाना कांग्रेस की पहली वरीयता होगी। विधानसभा का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही चुनाव होने के बाद नए विधायकों के सामने वेतन से लेकर तमाम संवैधानिक सहूलियत का संकट प्रदेश में इसके पहले दो बार खड़ा हो चुका है। एक बार मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे तो दूसरी बार राजनाथ सिंह प्रदेश की मुख्यमंत्री थे। तीसरी बार यह संकट प्रदेश में छह मार्च के बाद खड़ा होने जा रहा है। किसी दल को बहुमत न मिलने पर कांग्रेस के पास इसके लिए सियासी शस्त्र राष्टï्रपति शासन है।
प्रदेश में पांच चरणों के चुनाव में मतदाताओं को रिकार्ड तोड़ रुझान किसी खास दल के पक्ष में देखने को नहीं मिल रहा है, उसे देखकर राजनीतिक विश्लेषक ही नहीं कई पार्टियों के नेता भी मान रहे हैं प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा का गठन होगा। चुनाव परिणाम से पहले राजनीतिक पूर्वनुमान को भांपकर ही शायद कांग्रेस के नेता राष्टï्रपति शासन का बयान देने लगे हैं। आज कानपुर में श्रीप्रकाश जयसवाल ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने की बात कहकर राजनीति गरम कर दी। राज्य में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना है लेकिन यदि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति आती है तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगेगा। इससे पहले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की संभावना जताई थी। कांग्रेस के बड़े नेता अपने बयान से भले ही पलटी मार दे लेकिन प्रदेश में जिस तरह वोट पड़ रहा है, उससे किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलने की संभावना फिलहाल नहीं दिखाई दे रही है। सियासी संग्राम के इस मुकाम पर आपको भी अब कांग्रेस की रणनीति की राह में राष्टï्रपति शासन खड़ा दिखाई देने लगा होगा।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी कहते हैं पंद्रहवीं विधानसभा का कार्यकाल तेरह मई 2012 को पूरा हो रहा है। चुनाव आयोग ने जिस तरह हड़बड़ी में तारीख की घोषणा वारावफात और होली को नजरअंदाज करके  की, उसके बाद कांग्रेस के बड़े नेताओं व केंद्रीय मंत्रियों के जो बयान आ रहे हैं, उससे साफ जाहिर है यूपी में सत्ता के लिए कांग्रेस कुछ भी कर सकती हैं। राष्टï्रपति शासन की धमकी कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस का सच नेताओं के जुबान पर अक्सर आ जा रहा है। धारा 356 का प्रयोग करके जनमत को कुचलने का कांग्रेस का गंदा इतिहास है। कांग्रेस यूपी के गवर्नर हाउस को कांग्रेस हाउस बनाने के लिए परेशान है।
पंद्रहवीं विधानसभा का कार्यकाल तेरह मई 2012 को पूरा होगा, सोलहवें विधानसभा चुनाव का परिणाम छह मार्च को आ जाएगा, उसके बाद क्या होगा? यह धर्म संकट का छह मार्च के बाद खड़ा होगा। आसन्न संकट के इस सवाल पर विधानसभा के वर्तमान अध्यक्ष सुखदेव राजभर ने कहा कि  सोलहवीं विधानसभा के चुनाव परिणाम भारत निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित कर दिए जाने के बाद पंद्रहवीं विधानसभा को भंग करने के लिए मुख्यमंत्री राज्यपाल से सिफारिश करेंगी। विधानसभा कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव परिणाम आ जाने से एक धर्म संकट खड़ा होगा। किसी दल को बहुमत न मिलने पर राज्यपाल की रिपोर्ट पर प्रदेश में राष्टï्रपति शासन लागू हो सकता है।
सूबे में कब-कब राष्टï्रपति शासन
पहली बार- 25 फरवरी 1968 से 26 फरवरी 1969
दूसरी बार- पहली अक्टूबर 1979 से 18 अक्टूबर 1970
तीसरी बार- तेरह जून 1973 से 8 नवंबर 1973
चौथी बार- 30 नवंबर 1975 से 21 जनवरी 1976
पांचवीं बार- 30 अप्रैल 1977 से 23 जून 1977
छठवीं बार- 17 फरवरी 1980 से 9 जून 1980
सातवीं बार - 6 दिसंबर 1992 से 4 दिसंबर  1993
आठवीं बार- 18 अक्टूबर 1995 से 17 अक्टूबर 1996
नौवीं बार- 17 अक्टूबर 1996 से 21 मार्च 1997
दसवीं बार- 8 मार्च 2002 से 3 मई 2002

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

रोमिंग जर्नलिस्ट: सिब्बल जब भी मुंह खोलते हैं कोई ....

रोमिंग जर्नलिस्ट: सिब्बल जब भी मुंह खोलते हैं कोई ....: सिब्बल का अब सुप्रीम कोर्ट से पंगा सिब्बल जब भी मुंह खोलते हैं कोई हंगामा जरूर खड़ा होता है। पहले उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त फिर चुनाव आयोग ...

सिब्बल जब भी मुंह खोलते हैं कोई ....

सिब्बल का अब सुप्रीम कोर्ट से पंगा
सिब्बल जब भी मुंह खोलते हैं कोई हंगामा जरूर खड़ा होता है। पहले उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त फिर चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाया था और इस बार सुप्रीमकोर्ट के निर्णय पर ही उंगली उठा दी है। सुप्रीमकोर्ट के 2जी घोटाले पर फैसले से अन्य क्षेत्रों पर असर पडऩे की बात कह कर एक तरह से सर्वोच्च अदालत की अवमानना की है। याद रहे कुछ वर्ष पहले सिब्बल ने स्पेक्ट्रम घोटाले से हुए नुकसान पर लेखा महापरीक्षक की रिपोर्ट के खिलाफ बयानबाजी की थी।
दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर आवंटित 122 दूरसंचार लाइसेंस रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का खनन जैसे क्षेत्रों पर दूरगामी असर पड़ेगी। खनन जैसे क्षेत्रों में भी पहले आओ, पहले पाओ की नीति का पालन किया जाता है। सिब्बल ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, ‘मैं बार-बार कहता रहा हूं कि फैसले का दूरगामी असर पड़ेगा। इसका प्रभाव सिर्फ  दूरसंचार क्षेत्र पर ही नहीं बल्कि अन्य क्षेत्रों पर भी  पड़ेगा।’
उल्लेखनीय है कि शीर्ष अदालत ने तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा द्वारा आवंटित लाइसेंस को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन का बेहतर तरीका नीलामी है। सिब्बल ने कहा कि सरकार फैसले के प्रभाव का अध्ययन कर रही है और इस मामले में आगे बढऩे के बारे में निर्णय करेगी। उन्होंने खनन एवं खनिज नियमन एवं विकास कानून का उदाहरण दिया जो देश में खनिज संसाधनों का संचालन करती है और इन संसाधनों की नीलामी से चुनौतियां सामने आ सकती हैं। सिब्बल ने कहा, ‘मान लीजिए हम किसी विशेष खनिज का खनन करना चाहते हैं और हमें यह पता नहीं होता कि भूगर्भ में खनिज की मात्रा कितनी है और यह कहां है। ऐसे में आप उद्यमियों को अनुरोध करेंगे कि वे आगे आएं और उसकी संभावना के बारे में पता लगाएं।’ दूरसंचारमंत्री ने कहा कि अगर उद्यमी 60 करोड़ डालर खर्च कर खनिज की संभावना के  बारे में पता करता है तो क्या इसकी नीलामी के लिए नीति होनी चाहिए। यह सब कुछ ऐसे सवाल हैं, जिस पर गौर किए जाने की जरूरत है।’ उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का देश में भविष्य में आने वाले निवेश पर पड़ेगा। सिब्बल ने कहा कि हमें प्रत्येक चीजों का अध्ययन करना होगा। उसके बाद हम इस पर कोई निर्णय करेंगे।’

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

काला धन ले आइए हम करे देंगे सफेद


काला धन ले आइए हम करे देंगे सफेद
लखनऊ। काले धन की महिमा अपरंपार है। नेताओं का काला धन भले ही विदेश से नहीं आ पाया लेकिन राजनीति और काले धन में किस कदर गठजोड़ है इसका अंदाजा चुनाव आयोग की सख्ती से पकड़़े गए करोड़ों रुपए को देखकर लगाया जा सकता है। टिकट बेचने की बात राजनीतिक गलियारों में अब खेल नहीं है, लेकिन काले धन का सियासी गणित समझने के लिए कैनविज टाइम्स की विशेष संवाददाता दिनेश चंद्र मिश्र पहुंच गए टिकटार्थी बनकर राजनीतिक पार्टियों की मंडी में। यह संवाददाता जब टिकटार्थी बनकर उत्तर प्रदेश विधानभवन के सामने दारुलशफा जाने वाले गेट के रास्ते सत्याग्रह मार्ग पर पहुंचा तो चंद कदम चलते ही नजर पड़ी विकास पार्टी के बोर्ड पर। विकास की बात करने वाली राजनीतिक पार्टियों की पड़ताल करने लिए इस पार्टी का नाम लुभावना लगा। नेताओं की तरह दिखावटी विन्रम मुद्रा के साथ हाथ जोड़े पार्टी दफ्तर के अंदर दाखिल हुआ तो सामने सूट-बूट में पार्टी अध्यक्ष दिख गए। चरणों में लोटकर प्रणाम करने की मुद्रा में अभिवादन करने के बाद चुनावी महासंग्राम में आशीर्वाद देने की आकांक्षा जाहिर की। विकास पार्टी के राष्टï्रीय अध्यक्ष जीतू राम रत्ना से एक घंटे की मीटिंग के बाद टिकटार्थी बने इस पत्रकार को न सिर्फ पार्टी में शामिल कराया गया बल्कि बस्ती सदर विधानसभा से पार्टी प्रत्याशी घोषित करने का खत और पार्टी का झंडा भीे थमा दिया। फुर्सत के क्षण बैठकी लगाने वाले एक छायाकार साथी ने भी इस यादगार क्षण को कैमरे में कैद किया। विकास पार्टी के राष्टï्रीय अध्यक्ष और टिकटार्थी बने खबरनवीस के बीच हुई रिकार्डेड वार्तालाप को सुनेंगे तो आपको छोटी-मोटी राजनीतिक पार्टियां किस कदर काले धन से चोली-दामन का रिश्ता रखती हैं? बखूबी जान सकते हैं। अब आप खुद पढि़ए टिकटार्थी बने खबरनवीस और विकास पार्टी के राष्टï्रीय अध्यक्ष जीतू राम रत्ना के बीच हुई बातचीत...
संवाददाता- अध्यक्ष जी चरणों में लोटकर मेरा सादर प्रणाम स्वीकार करें (पार्टी आफिस अंदर घुसते ही राष्टï्रीय अध्यक्ष को देखकर)
राष्टï्रीय अध्यक्ष- आशीर्वाद..आशीर्वाद....आइए बैठिए, मैने आपको पहचाना नहीं, आपका परिचय !
संवाददाता- अध्यक्ष जी मेरा नाम दिनेश चंद्र मिश्र है, बस्ती जिले का रहने वाला हूं, छात्र राजनीति में सक्रिय रहा हूं, आज भी युवाओं के बीच अच्छी पैठ है। बस आपका आशीर्वाद चाहिए, इस बार विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरना चाह रहा हूं। आपका आशीर्वाद मिल जाए तो कुछ करके दिखा दूंगा।
राष्टï्रीय अध्यक्ष (बुझी आंखों में अचानक चमक आ जाती है)-आप अपना बायोडाटा दे दीजिए, विचार किया जाएगा, टिकट के लिए आवेदन बहुत हैं फिर भी आपके अंदर कुछ कर गुजरने की ऊर्जा दिखाई दे रही है। आपके  नाम पर गंभीरता से विचार होगा।
संवाददाता (राष्टï्रीय अध्यक्ष को बायोडाटा थमाते हुए)- अध्यक्ष जी यह है बायोडाटा, आप आज आशीर्वाद दे दीजिए, बस्ती शहर में विकास पार्टी के नाम के साथ आपका भी नाम गूंजेगा।
राष्टï्रीय अध्यक्ष- बस्ती तो जगदम्बिका पाल का इलाका है, इस बार तो उनका बेटा लड़ रहा है, उसके सामने टिक पाएंगे? 
संवाददाता-अध्यक्ष जी किसान डिग्री कालेज बस्ती में छात्रसंघ पदाधिकारी रहा हूं, आज की तारीख में युवाओं के बीच अच्छी-खासी पैठ है, आप टिकट दीजिए, बस्ती के लोग ‘बस्ती का लाल-फलाने पाल’  का नारा भूल जाएंगे।
राष्टï्रीय अध्यक्ष- आपके अंदर कुछ करने का जो जज्बा है, वह अच्छी बात है, लेकिन चुनाव लडऩे के लिए कुछ खर्च-वर्च तो करना ही पड़ेगा।
संवाददाता- अध्यक्ष जी आप आदेश दीजिए, परिवार की दाल-रोटी में से समाज के लिए भी कुछ खर्च कर सकता हूं।
राष्टï्रीय अण्यक्ष- सबसे पहले तो आपको पार्टी की सदस्यता आपको लेनी होगी, इसके लिए 675 रुपए शुल्क तय है। टिकट का आवेदन करने के लिए दस हजार रुपए शुल्क निर्धारित है।
संवाददाता- अध्यक्ष जी युवाओं को कुछ रियायत नहीं मिल सकती है।
राष्टï्रीय अध्यक्ष- चुनाव लडऩा आज की तारीख में आम आदमी के वश की बात नहीं है। बड़ी-बड़ी पार्टियों में टिकट बिकता है, हम तो केवल आपसे शुल्क देने के लिए कह रहे हैं, जो पार्टी ने तय किया है।
संवाददाता-वह तो हम दे ही देंगे अध्यक्ष जी, बस पूछ रहा था कुछ रियायत मिल सकती है क्या? टिकट के लिए सबसे पहले आपके पास ही आए हैं, वैसे किन-किन पार्टियों में टिकट बिक रहा है?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- बहुजन समाज पार्टी से जिनको टिकट नहीं मिला, वह तो मीडिया में जाकर आरोप लगा रहे हैं,अखबार में यह सब पढ़ते ही होंगे। समाजवादी पार्टी में भी यही सब हो रहा है। पीस पार्टी ने तो बकायदा 20 से 25 लाख रुपए रेट तय कर दिए हैं। (पार्टी दफ्तर के भीतर एक सजी-संवरी अधेड़ महिला अचानक आ जाती है, अध्यक्ष जी उसको दो मिनट तक देखते हैं फिर उसको बोलते ही कल आओ बात करेंगे )
संवाददाता-पार्टी कब चुनाव आयोग में पंजीकृत हुई अध्यक्ष जी, विधानसभा चुनाव में कितने लोग पार्टी से लड़ रहे हैं?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- सन्ï 96 में पार्टी का पंजीकरण हुआ, चुनाव आयोग के निमयों के अनुसार कम से कम 45 टिकट देना ही होगा, ताकि सबको एक ही चुनाव निशान मिल सके। अब तक सत्तर-पचहत्तर आवेदन आ चुके हैं?
संवाददाता- आप भी अध्यक्ष जी कहीं से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- लखनऊ से चुनाव लड़ा था अटल जी के टक्कर में। विधानसभा में नहीं लड़ रहा हूं, चुनाव दौरा करना होगा। हम ही फंस जाएंगे तो कहां जाएंगे, चुनावी दौरा करना होगा ना। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी की ओर से मिर्जापुर से लालती देवी, भदोही से लड़े थे सैलानी गुप्ता, रायबरेली से परचा खारिज हो गया था, लखनऊ में भी परचा खारिज हो गया था। परचा बड़़ी बारीकी से परचा भरना होगा। प्रस्तावक मजबूत होना चाहिए, प्रस्तावक को जांच के समय हाजिर रहना चाहिए। बेहतर होगा किसी अधिवक्ता की मदद ले लीलिए।
संवाददाता-अब तक कुल कितने टिकट दे दिए हैं?
राष्टï्रीय अध्यक्ष-चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार हमको कुल 45 टिकट देना है। चुनाव आयोग के नियम के अनुसार दस फीसदी सीटों पर लडऩे के बाद ऐसे दलों को एक चुनाव निशान मिलेगा।
संवाददाता- विकास पार्टी के नाम पर क्या यह दफ्तर एलाट हुआ है अध्यक्ष जी?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- एलाट नहीं हुआ है, कब्जे पर है। मायावती तोड़वाना चाहती थी, कब्जे के आधार पर हाईकोर्ट में पेटीशन दायर किया, वहां से यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया गया है। कोई भी सरकार आए दफ्तर देना ही होगा, जब तक कहीं दूसरे जगह पार्टी के लिए आफिस नहीं मिलेगा, यहां अपना कब्जा है।
संवाददाता- चुनावी घोषणापत्र छपा है कि नहीं?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- छपे हैं, कुछ प्रेस में हैं। (दो पन्ने का घोषणापत्र का पम्पलेट थमाते हुए ) यह है विकास पार्टी का घोषणापत्र। अब इसको बड़ा रूप देकर बड़े अक्षरों में छपवाया जाएगा।
संवाददाता- टिकट वाले में कुछ कनशेसन नहीं हो सकता है अध्यक्ष जी, जो दस हजार शुल्क है उसमें?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- वह पार्टी का शुल्क है, उसमें कुछ रियायत नहीं हो सकती है। दस हजार जमानत राशि भी देनी होगी। पडरौना के एक मैनेजर सिंह थे, उन्होंने अपने बूते पांच टिकट ले गए थे। तब पडरौना था, कुशीनगर नहीं बना था। नामांकन कराए..यहां भी पैसा दिए, वहां भी पैसा दिए थे। पडरौना में वह दावा किए थे कि पांचो सीट जीत कर आएंगे।  पाचों प्रत्याशियों का पूरा खर्चा उठाया था, भगवान को मंजूर नहीं था  जिस दिन सिंबल मिलना था, उसी दिन उनका इंतकाल हो गया।
संवाददाता- भगवान के आगे किसी की नहीं चलती, सब ऊपर वाले की माया है।
राष्टï्रीय अध्यक्ष- बुजुर्ग थे काफी बेचारे।
संवाददाता- यहां बाकी पार्टियों में भी क्या पैसा लेकर टिकट मिल रहा है?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- वो तो जिसका जितना है उतना ले रही है। बाकी पार्टियां बहुत पैसा ले रही हैं। सपा-बसपा करोड़ों रुपए ले रही है,पीस पार्टी भी लाखों ले रही है।  हर आवेदन के साथ दस हजार तो सभी पार्टियां ले रही है। पार्टी मजबूत हुई तो ज्यादा ले रही है पैसा।
संवाददाता- पीस पार्टी कितना ले रही होगी?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- पीस पार्टी जैसा प्रत्याशी पा रही है, वैसा पैसा ले रही है। अखिलेश सिंह ने तो पांच करोड़ एक मुश्त दिया हैं। सदर विधायक ने पांच करोड़ एकमुश्त दिए। पूरी जिम्मेदारी ली पंद्रह-बीस प्रत्याशियों को लड़ाने की। उनके पास पैसे की कौन कमी?
संवाददाता- पीस पार्टी में अध्यक्ष पैसा ले रहे हैं या महासचिव?
राष्टï्रीय अध्यक्ष-पीस पार्टी में पैसा एकाउंटेंट लेता है।
संवादाता- पार्टियों में पैसा जो दिया जाता है उसकी लिखापढ़ी थोड़े होती होगी, वह तो काला धन होता होगा?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- कहीं से भी पैसा लाएं, उससे थोड़े मतलब है। काला धन कहीं से ले आएं वह पार्टी में आकर नंबर एक का हो जाएगा। कोई दिक्कत नहीं है। काला धन पार्टी में लाइए सफेद धन हो जाएगा। चुनाव आयोग अब सख्त हो गया है, हमारे पास भी कम से कम चार बार इनकम टैक्स वाले आए।
संवाददाता- इनकमटैक्स वाले क्या आपके पास आए?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- आपका पैन नंबर क्या है? रिर्टन दाखिल किया है कि नहीं? अधिकारियों ने चुनावी शिकंजा कस रखाा है। उत्तर प्रदेश में 1307 पार्टियां हैं। इसमें ज्यादा से ज्यादा पचीस पार्टियों का पता राजधानी में चला है, बाकी का पता ही नहीं पा रहे हैं। कई पार्टियां तो बैग में ही हंै, राष्टï्रीय अध्यक्ष जी के बैग में ही पार्टी चलती रहती है। हमारी पार्टी का पता सत्याग्रह मार्ग लिखा है, खोजने में दिक्कत नहीं हुई। इनकमटैक्स वाले बहुत खुश हुए, कहा आपकी पार्टी को खोजने में दिक्कत नहीं हुई लेकिन बाकी पार्टियों का पता नहीं चल रहा है, कई पार्टियों का पता हम लोगों ने बताया।
संवादादाता- काला धन सफेद हो सकता है इन सब पार्टियों में? जैसे अगर यहां कोई आपको एकाध करोड़ काला धन दे तो व्हाइट हो जाएगा?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- बस यही सब तो ढूंढऩा है आपको (जवाब सुनकर हंसी आ गयी)
संवाददाता- हंसते हुए कहा हमें ढूंढऩा है ऐसे लोगों को, ब्लैक मनी कहां से आए जो आप तक पहुंचा जाए?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- यही करना है, जितना काला धन आएगा सबको हम सफेद कर देंगे।
संवाददाता- अगर काले धन वाले एकाध सौदागरों को मैं पकडक़र लाऊं तो आपके पास आकर वह व्हाइट मनी हो जाएगा?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- ऐसा कोई मिलेगा तो पैसा लाने में सावधानी बरतिएगा।
संवाददाता- क्या सावधानी बरतनी होगी?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- यही कि रास्ते में काला धन कहीं कैच न हो, इनकम टैक्स वाले जगह-जगह सूंघ रहे हैं। इसको बड़ी बारीकी से देखना है। यहां आ गया और हमारे एकाउंट में चला गया तो नंबर एक को पैसा हो गया। अब यह धन कहां से आया इसका जवाब हम दे देंगे।
संवाददाता- आप क्या जवाब देंगे, अगर इसके बारे में पूछताछ हुई?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- हम कह देंगे, हमारे दो लाख कार्यकर्ता हैं। सबसे चंदा लिए है। कोई बीस लाख तो कोई पचास लाख दिया है। कहां-कहां इनकमटैक्स वाले खोजने जाएंगे। इतने कार्यकर्ताओं को गिना दिया जाएगा कि उनकी समझ में नहीं आएगा।
संवाददाता- क्या इनकमटैक्स वाले चंदा देने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं की पड़ताल नहीं करेंगे?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- कितनी पड़ताल करेंगे, जितना चाहेंगे उतने कार्यकर्ताओं का रजिस्टर बन जाएगा। उसकी चिंता आपको नहीं करनी है, बस ऐसे लोगों को खोजिए जो काला धन सफेद कराना चाह रहे हों। काला धन लाने वालों को परसेंटेज भी दिया जाएगा।
संवाददाता-काला धन लाने वालों को कितना परसेंटेज दिया जाएगा?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- बीस परसेंट, पचीस परसेंट, चालीस परसेंट काला धन सफेद करके वापस दिया जा सकता है। पचास परसेंट तक दिया जा सकता है। वह कहेंगे पार्टी को चंदा दिए, हम उनका पचास प्रतिशत काला धन सफेद करके वापस दे देंगे।
संवाददाता-पिछले चुनाव मे काला धन को सफेद करने वाले कुछ लोग आए थे?
राष्टï्रीय अध्यक्ष-हां आए थे, लोकसभा चुनाव में आए थे।
संवाददाता- काला धन वालों को खोजने का तरीका क्या है?
राष्टï्रीय अध्यक्ष-देखिए कारपोरेट वाले पार्टियों की दो लिस्ट बना लेते हैं, जिसके संपर्क में हैं उसके माध्यम से यह काम होता है। हमारे राष्टï्रीय महासचिव हैं टीएन पांडेय जी वहीं ऐसे कारपोरेट धरानों से संपर्क रखते है।
संवाददाता- टीएन पांडेय जी कहां के रहने वाले है?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- इनका जन्मस्थान तो गोरखपुर है। रहते देवरिया में है। अब वह आलराउंडर हो गए हैं। पूरा देश घूमते हैं। कारपोरेट कंपनियों के संपर्क में रहते हैं, बड़ी -बड़ी कंपनियों को करोड़ों रुपए का इसी तरीके से लाभ पहुंचाते हैं। उनका कहना है प्रत्याशियों की लिस्ट दे दीजिए, फिर हम उन लोगों के लिए कुछ व्यवस्था करते हैं। उनके संपर्क में बहुत हैं। वह यही काम ही करते हैं।
संवाददाता- काला धन सफेद करने का काम पांडेय जी ही करते हैं?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- हां वह यही काम ही करते हैं। बताया न आल राउंडर है।
संवाददाता- पांडेय जी लखनऊ नहीं आएंगे?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- आएंगे, पार्टियों की लिस्ट जारी करने के बाद उनसे फोन पर वार्ता हो जाएगी फिर वह व्यवस्था करेंगे।
संवाददाता- पांडेय जी का फोन नंबर होगा क्या?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- रोमिंग में रहते हैं, आएंगे तो संपर्क हो जाएगा।
संवाददाता- मैं चाहता हूं आपका आर्शीवाद लेते हुए टिकट व सिंबल के साथ फोटो हो जाए?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- प्रेस फोटोग्राफर वर्मा जी को बुलाता हूं। ( फोन के कुछ देर बाद वह आ जाते हैें)
संवाददाता- अध्यक्ष जी आपके साथ एक फोटो हो जाए तो बस्ती सदर विधानसभा चुनाव में जाकर प्रचार-प्रसार करने के साथ अखबार में बयान जारी कर दूं
राष्टï्रीय अध्यक्ष- ठीक है कोई दिक्कत नहीं है। चुनाव मजबूती से लडि़ए, आप ऊर्जावान हैं, कुछ कर दिखाएंगे।
संवाददाता- अध्यक्ष जी यही सोचा कि इस बार चुनाव मैदान में उतरूं, सोचा इस बार चुनाव में उतरकर किस्मत अजमाई जाए। तमाम अंगूठाछाप विधानसभा से लेकर संसद तक पहुंच गए हैं, इसलिए सोचा क्यों न मैं भी चुनाव लड़ूं। बीएससी किया, लखनऊ विश्वविद्यालय से एमजेएमसी किया है सोचा क्यों नहीं एक बार किस्मत अजमाई जाए।
(पार्टी के पैड पर इस संवाददाता की उम्मीदवारी की घोषणा की बात लिखते हुए अध्यक्ष जी कहते हैं,  लक्ष्मी जी का आशीर्वाद है न आपके ऊपर?)
संवाददाता-लक्ष्मी जी यह देखकर नहीं आती हैं कि कौन कितना पढ़ा-लिखा है। मां सरस्वती के साधक हैं, इसलिए लक्ष्मी जी उतनी मेहरबान नहंी है। बस इतना है दाल-रोटी का खर्चा चल जाता है। अध्यक्ष जी वैसे आप जो ब्लैक मनी को मंत्र बता रहे हैं, उस काम में मैं आपकी मदद करूंगा। (अध्यक्ष जी पैसा पाने के बाद उम्मीदवारी का पत्र लिखने में मशगूल रहे)
संवाददाता- बिजली का मीटर न देखकर जब यह पूछा कि पार्टी दफ्तर में बिजली का कोई चार्ज नहीं लगता क्या
राष्टï्रीय अध्यक्ष- कोई चार्ज नहीं है।
संवाददाता- आपका आवास भी यहीं है
राष्टï्रीय अध्यक्ष- गोमती नगर
संवाददाता-गोमतीनगर मेंं कहां रहते हैं?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- विनीत खंड में रहते हैं।
संवाददाता- नाम कहीं पूरा लिख दीजिएगा, नाम दिनेश चंद्र मिश्रा, पिता का नाम श्रीकृपाशंकर मिश्रा, नार्मल स्कूल के पीछे गांधीनगर जिला बस्ती।
राष्टï्रीय अध्यक्ष- यह लीजिए आपका पत्र तैयार हो गया (उम्मीदवारी घोषणापत्र और पार्टी का झंडा सौंपते हुए राष्टï्रीय अध्यक्ष फोटो खिंचवाते हैं)
संवाददाता- धन्यवाद अध्यक्ष जी, अब मैं फिर आऊंगा, बाकी का शुल्क देने, अध्यक्ष जी पार्टी के झंडे के साथ एक फोटो हो जाए
राष्टï्रीय अध्यक्ष- यह लीजिए वीआईपी झंडा और उम्मीदवारी घोषणा का पत्र। (दोनों के साथ फोटो होती है)
संवाददाता- अध्यक्ष जी आज शाम का क्या प्रोग्राम है?
राष्टï्रीय अध्यक्ष- कुछ नहीं यहीं मिलूंगा।
संवाददाता- आज शाम को आप मेरा डिनर कबूल करें, अभी कुछ अपना प्राइवेट काम निपटा लूं, आपके ब्लैक मनी वाले कुछ एजेंट को खोजता हूं।
राष्टï्रीय अध्यक्ष- बहुत अच्छा, बाकी बात रात को होगी।
(जय हिंद बोलकर यह खबरनवीस विकास पार्टी के दफ्तर से निकल जाता है )


 
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