रोमिंग जर्नलिस्ट

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

पाकिस्तान के हिंदुओं का मायावती को पैगाम

पाकिस्तान के हिंदुओं का मायावती को पैगाम
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। पाकिस्तान के हिंदुओं ने प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को एक पैगाम भेजा है। इस पैगाम में पाक के दलितों के दर्द संग मदद की गुहार की आस भी है। यह पैगाम हिंदुओं के भलाई के लिए काम करने वाली पाकिस्तान हिंदू समिति(पीएचएस)ने भेजा है। पीएचएस के पैगाम में पाकिस्तान के दलितों के उत्पीडऩ की नहीं बल्कि मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार स्थल की बदहाली की कहानी है। पीएचएस को आस है कि मायावती ने दलितों के लिए जिस तरह उत्तर प्रदेश में ढेरों योजनाएं चलाई उसी तरह पाकिस्तान के हिंदू दलितों के अंतिम संस्कार स्थल के पुर्ननिर्माण के लिए मदद करेंगी। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो व प्रदेश की मुख्यमंत्री को पीएचएस की ओर से भेजे गए पैगाम में कराची शहर में मौजूद दलितों के अंतिम संस्कार स्थल की बदहाली का जिक्र करते हुए वहां की एक फोटो भी भेजी गयी है। इस फोटो को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि दलितों के अंतिम संस्कार स्थल किस हाल में है। कराची में हिंदुओं के अंतिम संस्कार के लिए तीन स्थान हैं, इसमें से एक दलितों का प्राचीन कब्रिस्तान है। जंगली झाडिय़ों से घिरे अंतिम संस्कार स्थल में कचरा भरमार होने से अंतिम यात्रा में शामिल होने वाले लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। आवारा जानवरों की भरमार के साथ शव को दफनाने की कोई व्यवस्था नहीं है। हिंदू दलितों की संख्या पाकिस्तान में ज्यादा है। इसमें अंतिम विश्राम के लिए यही शवों को लाया जाता है। इस अंतिम संस्कार स्थल में मारवाड़ी, मद्रासी, मराठा के साथ सिखों को भी लाया जाता है। हजारों हिंदुओं की कब्रों के होने के बाद रखरखाव की व्यवस्था न होने के कारण टूटी दीवार के चलते नशेडिय़ों का अड्ïडा भी यह स्थान बना है। अंतिम यात्रा के लिए आने वाले लोगों को यहां भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि कोई भी सुविधा नहीं है। अंतिम संस्कार स्थल पर कब्र खोदने का काम करने वाले सुहेल अहमद ने पाकिस्तान हिंदू
समिति से संपर्क करने के बाद इसके पुर्ननिर्माण की गुजारिश की। पीएचएस के पदाधिकारी वहां जाकर देखे तो सुविधाओं के नाम पर सन्ï 1984 से एक कोने में एक टूटी हुई बेंच भर है, जो श्री महाराष्ट्र पंचायत द्वारा दान किया गया  है। दिन में आने वाले शवों को किसी तरह तो दफना दिया जाता है लेकिन रात में आने वाले शवों को दफनाने के लिए बिजली तक की व्यवस्था न होने से मशाल का सहारा लेना पड़ता है। पीएचएस से जुड़े कालिदास ने कहा कि इसके पुर्ननिर्माण और सुविधाओं के लिए पाकिस्तान सरकार के पास 18.5 लाख रुपए का प्रोजेक्ट सालों से लंबित पड़ा है। इस धनराशि के न मिलने के कारण सडक़, बिजली जैसी मामूली सुविधाएं भी अंतिम संस्कार स्थल पर नहीं मिल पा रही है। कराची में तीन अंतिम संस्कार स्थलों में से एक ऊंची जातियों के लिए आरक्षित है। हिंदू दलितों के इस अंतिम संस्कार स्थल की साफ-सफाई के लिए पाकिस्तान हिंदू सेवा के कल्याण संगठन के स्वयंसेवकों ने एक दिन सफाई दिवस का आयोजन किया। पीएचएस ने ङ्क्षहदू दलितों के इस अंतिम संस्कार स्थल के पुर्ननिर्माण के लिए प्रदेश की मुख्यमंत्री को ई-मेल से खत भेजने के साथ इस सोशल
नेटवर्किंग साइट्ï पर रोमिंग जर्नलिस्ट के नाम से मौजूद खबरनवीस को भी इसकी कापी भेजी है। इस खत में बसपा सुप्रीमो से मदद की गुहार लगाई गई है ताकि हिंदू दलितों के अंतिम संस्कार के वक्त जो बदइंतजामी है, उसको खत्म किया जा सके।
दलित चिंतक व प्रमुख साहित्यकार मुद्राराक्षस का कहना है जिस तरह हिंदुस्तान में भेदभाव है, उसी तरह पाकिस्तान में भी स्थिति है। भेदभाव मनुष्य का स्वभाग है। वहां भी सामाजिक परिवर्तन के प्रयास चल रहे हैं, काफी लोग लगे हैं, खासकर महिलाओं की अच्छी-खासी संख्या है। पाकिस्तान में हिंदू दलितों के अंतिम संस्कार स्थल की दुर्दशा की जो कहानी सामने आयी है, वह पीड़ादायक है। हर जगह भेदभाव मुनुष्य का स्वभाव है। इस मामले में भारत सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए।  बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति व जनजाति छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष व युवा दलित चिंतक डा.प्रमोद कुमार का कहना पाकिस्तान की जो सामाजिक संरचना है वह हिंदुस्तान से अलग नहीं है। हिंदुस्तान में दलितों को मुख्य धारा में लाने के लिए संविधान निर्माता डा.भीम राव अंबेडकर ने जो पहल की है, उसे आज  यूपी की मुख्यमंत्री मायावती जी जो आगे बढ़ाई उसके कारण सामाजिक सोच में परिवर्तन हुआ। पाकिस्तान में आजादी के बाद ऐसी कोई पहल नहीं हुई, जिसके कारण हिंदू दलितों की बात हो या समग्र हिंदू समाज की दयनीय स्थिति है। वहां हिंदू  समाज के सामाजिक सरोकार की सुधबुध सरकार नहीं लेती। पाकिस्तान हिंदू समिति ने जो पैगाम मुख्यमंत्री जी को भेजा है, उस पर उनको गंभीरता से विचार करना चाहिए।

 

दिग्गी राजा की जब हो गई बोलती बंद

दिग्गी राजा की जब हो गई बोलती बंद
लखनऊ। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव दिग्विजय सिंह के बोल के आगे सबके बोल बेकार हैं, अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आपका नजरिया सोमवार को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दफ्तर में उनकी प्रेसवार्ता में जो कुछ हुआ, ...उसका हाल जानने के बाद बदल जाएगा।
चुनावी मौसम में पत्रकारों की जिस तरह संख्या बढ़ जाती है, उसी तरह आज टीवी चैनलों की तादाद में कई गुना इजाफा हो जाता है। बड़े नेताओं की प्रेसवार्ता का लाइव प्रसारण के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया के ओवी वैन के साथ कैमरों की भी भरमार रहती है। ऐसे माहौल के बीच आमतौर पर सभी दलों में प्रेसवार्ता होती है, लेकिन कांग्रेस के बड़े नेताओं का नखरे कुछ अलग रहते हैं। सोमवार को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव व प्रांतीय प्रभारी दिग्विजय सिंह की प्रेसवार्ता को कवर करने प्रिंट मीडिया के फोटोग्राफर भी दर्जन संख्या में उनके हाव-भाव को कैमरे में कैद करने के लिए पहुंचे थे। मीडिया रूम में आने के बाद दिग्विजय सिंह ने दो मिनट का समय प्रिंट फोटोग्राफरों को देते हुए बोले ‘अच्छा आप लोग अब चलिए’ एक बार उनकी आवाज जब पे्रस फोटोग्राफर नहीं ध्यान दिए तो फिर बोले ‘चलिए-चलिए’। चुनाव के मौसम में कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद सहित कई बड़े नेताओं के साथ दिग्विजय सिंह के मुंह चलिए-चलिए का डायलॉग सुनने के बाद फोटोग्राफर उनके ऊपर भडक़ उठे। द हिंदू के वरिष्ठ फोटोजर्नलिस्ट सुबीर दा दिग्विजय सिंह को अंगुली दिखाते हुए बोले जब यह सलूक करना है तो प्रेसवार्ता में क्यों बुलाते हैं। दिग्विजय सिंह ने कहा मुझे कोई दिक्कत नहीं है इलेक्ट्रानिक मीडिया के फोटोग्राफरों को दिक्कत है। दिग्विजय सिंह अपनी बात में इलेक्ट्रानिक मीडिया के फोटोग्राफरों से हां में हां करवाने में जुट गए। खैर पांच मिनट तक प्रेस फोटोग्राफर और दिग्विजय के बीच इस मुद्ïदे को लेकर कहासुनी होती रही। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दो नेता जब फोटोग्राफरों को समझाने आए तो उनको डांट कर किनारे कर दिया गया। पांच मिनट तक कहासुनी के बाद प्रेस फोटोग्राफर वहां से चले गए। दिग्विजय सिंह को पूरे घटनाक्रम के दौरान ऐसा लगा जैसे उनकी बोलती बंद हो गई। दिग्विजय सिंह के चलिए-चलिए के अंदाज पर नाराजगी जाहिर करने वालों में सुबीर दा के साथ प्रमोद शर्मा, मो. अशफाक, मो. अतहर, रितेश यादव, सुशील सहाय सहित कई लोग थे।

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

राष्टपति शासन या जनादेश का शासन!

राष्टपति शासन या जनादेश का शासन!
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। यूपी में सत्ता हथियाने की जो रण छिड़ा है, उसमें सबके अपने-अपने हथियार है। चुनाव जैसे-जैसे सूबे में हो रहे हैं, वैसे-वैसे रणनीति की राह पर राजनीतिक दलों के सूरमा अपने हथियारों को चमकाने लगे हैं। सबके अपने हथियार अपनी रणनीति है वोट हथियाने से लेकर कुर्सी पाने तक की। इस सियासी संग्राम में प्रदेश की सत्ता से 22 साल से दूर कांग्रेस की रणनीति की जो राह दिखाई पड़ रही है, उसमें कुर्सी से पहले राष्टï्रपति शासन दिखाई ही नहीं दे रहा है बल्कि धमकी के अंदाज में सुनाई पडऩे लगा है। कभी यह धमकी मतदाताओं को कांग्रेस के बड़े नेता तो कभी केंद्रीय मंत्री दे रहे हैं। कांग्रेस के बड़े नेताओं की धमकी को राजनीतिक पंडित जुबान फिसलने या मीडिया द्वारा बयान को तोड़मरोड़ कर पेश करने की तर्क को खारिज करते हुए कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा बताते हैं। राजनीतिक जानकार भी इन सबको देखने और सुनने के बाद रणनीति की राह में राष्टï्रपति शासन को देखने लगे हैं।
यूपी में तेरहवीं बार राष्टï्रपति शासन की आहट को समझने के लिए आपको चुनाव की तारीखों की घोषणा से समझना होगा। वर्तमान समय में प्रदेश में पंद्रहवी विधानसभा विद्यमान है, तेरह मई 2007 को इसका गठन हुआ था, पांच साल के हिसाब से कार्यकाल तेरह मई 2012 को पूरा होगा। ऐसा लगता है यूपी में वापसी के लिए बेताब कांग्रेस की बैचेनी को समझते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने आनन-फानन में तारीख की घोषणा कर दी। हड़बड़ाहट इस कदर थी कि देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी ने पहले चरण का चुनाव मुसलिमों के पाक त्योहार वारावफात के दिन ही रखने के साथ इसकी घोषणा कर दी। चुनाव तरीखों की घोषणा के बाद जब राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया तो पहले चरण का चुनाव तीन मार्च को कर दिया। वोटों की गिनती छह मार्च को होगी, आठ मार्च को होली है। होली के त्योहार को राजनीति के रंग से बदरंग बना दिया। होली के बाद सोलहवीं विधानसभा के गठन की घोषणा निर्वाचन आयोग द्वारा कर दी जाएगी। अब सवाल यह उठता है कि मान लीजिए प्रदेश में किसी दल को बहुमत नहीं मिला तब क्या-क्या होगा। एक तरह छह मार्च को निर्वाचन का प्रमाणपत्र लिए नए परिसीमन के हिसाब से चुने गए विधायक होंगे तो दूसरी वह विधायक होंगे जिनका कार्यकाल कायदे के हिसाब से 13 मई 2012 को पूरा होगा। छह मार्च से तेरह मई के बीच लगभग सवा दो महीने तक सूबे में क्या-क्या होगा? अगर किसी दल को बहुमत नहीं मिला तो विधायकों की खरीद-फरोख्त का खेल होगा। यूपी के राजनीतिक इतिहास को देखे तो चुनाव परिणाम आने के एक सप्ताह के भीतर अक्सर यह खेल हो गए हैं। किसी दल को बहुमत न मिलने पर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के साथ वर्तमान विधायक बने रहेंगे, ऐसे में संख्याबल में जो भारी होगा, उसके पक्ष में खड़े होने के लिए पालाबदल करने वाले नवनिर्वाचित विधायकों को रोकने के लिए प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करवाना कांग्रेस की पहली वरीयता होगी। विधानसभा का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही चुनाव होने के बाद नए विधायकों के सामने वेतन से लेकर तमाम संवैधानिक सहूलियत का संकट प्रदेश में इसके पहले दो बार खड़ा हो चुका है। एक बार मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे तो दूसरी बार राजनाथ सिंह प्रदेश की मुख्यमंत्री थे। तीसरी बार यह संकट प्रदेश में छह मार्च के बाद खड़ा होने जा रहा है। किसी दल को बहुमत न मिलने पर कांग्रेस के पास इसके लिए सियासी शस्त्र राष्टï्रपति शासन है।
प्रदेश में पांच चरणों के चुनाव में मतदाताओं को रिकार्ड तोड़ रुझान किसी खास दल के पक्ष में देखने को नहीं मिल रहा है, उसे देखकर राजनीतिक विश्लेषक ही नहीं कई पार्टियों के नेता भी मान रहे हैं प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा का गठन होगा। चुनाव परिणाम से पहले राजनीतिक पूर्वनुमान को भांपकर ही शायद कांग्रेस के नेता राष्टï्रपति शासन का बयान देने लगे हैं। आज कानपुर में श्रीप्रकाश जयसवाल ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने की बात कहकर राजनीति गरम कर दी। राज्य में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना है लेकिन यदि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति आती है तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगेगा। इससे पहले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की संभावना जताई थी। कांग्रेस के बड़े नेता अपने बयान से भले ही पलटी मार दे लेकिन प्रदेश में जिस तरह वोट पड़ रहा है, उससे किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलने की संभावना फिलहाल नहीं दिखाई दे रही है। सियासी संग्राम के इस मुकाम पर आपको भी अब कांग्रेस की रणनीति की राह में राष्टï्रपति शासन खड़ा दिखाई देने लगा होगा।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी कहते हैं पंद्रहवीं विधानसभा का कार्यकाल तेरह मई 2012 को पूरा हो रहा है। चुनाव आयोग ने जिस तरह हड़बड़ी में तारीख की घोषणा वारावफात और होली को नजरअंदाज करके  की, उसके बाद कांग्रेस के बड़े नेताओं व केंद्रीय मंत्रियों के जो बयान आ रहे हैं, उससे साफ जाहिर है यूपी में सत्ता के लिए कांग्रेस कुछ भी कर सकती हैं। राष्टï्रपति शासन की धमकी कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस का सच नेताओं के जुबान पर अक्सर आ जा रहा है। धारा 356 का प्रयोग करके जनमत को कुचलने का कांग्रेस का गंदा इतिहास है। कांग्रेस यूपी के गवर्नर हाउस को कांग्रेस हाउस बनाने के लिए परेशान है।
पंद्रहवीं विधानसभा का कार्यकाल तेरह मई 2012 को पूरा होगा, सोलहवें विधानसभा चुनाव का परिणाम छह मार्च को आ जाएगा, उसके बाद क्या होगा? यह धर्म संकट का छह मार्च के बाद खड़ा होगा। आसन्न संकट के इस सवाल पर विधानसभा के वर्तमान अध्यक्ष सुखदेव राजभर ने कहा कि  सोलहवीं विधानसभा के चुनाव परिणाम भारत निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित कर दिए जाने के बाद पंद्रहवीं विधानसभा को भंग करने के लिए मुख्यमंत्री राज्यपाल से सिफारिश करेंगी। विधानसभा कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव परिणाम आ जाने से एक धर्म संकट खड़ा होगा। किसी दल को बहुमत न मिलने पर राज्यपाल की रिपोर्ट पर प्रदेश में राष्टï्रपति शासन लागू हो सकता है।
सूबे में कब-कब राष्टï्रपति शासन
पहली बार- 25 फरवरी 1968 से 26 फरवरी 1969
दूसरी बार- पहली अक्टूबर 1979 से 18 अक्टूबर 1970
तीसरी बार- तेरह जून 1973 से 8 नवंबर 1973
चौथी बार- 30 नवंबर 1975 से 21 जनवरी 1976
पांचवीं बार- 30 अप्रैल 1977 से 23 जून 1977
छठवीं बार- 17 फरवरी 1980 से 9 जून 1980
सातवीं बार - 6 दिसंबर 1992 से 4 दिसंबर  1993
आठवीं बार- 18 अक्टूबर 1995 से 17 अक्टूबर 1996
नौवीं बार- 17 अक्टूबर 1996 से 21 मार्च 1997
दसवीं बार- 8 मार्च 2002 से 3 मई 2002

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

रोमिंग जर्नलिस्ट: सिब्बल जब भी मुंह खोलते हैं कोई ....

रोमिंग जर्नलिस्ट: सिब्बल जब भी मुंह खोलते हैं कोई ....: सिब्बल का अब सुप्रीम कोर्ट से पंगा सिब्बल जब भी मुंह खोलते हैं कोई हंगामा जरूर खड़ा होता है। पहले उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त फिर चुनाव आयोग ...

सिब्बल जब भी मुंह खोलते हैं कोई ....

सिब्बल का अब सुप्रीम कोर्ट से पंगा
सिब्बल जब भी मुंह खोलते हैं कोई हंगामा जरूर खड़ा होता है। पहले उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त फिर चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाया था और इस बार सुप्रीमकोर्ट के निर्णय पर ही उंगली उठा दी है। सुप्रीमकोर्ट के 2जी घोटाले पर फैसले से अन्य क्षेत्रों पर असर पडऩे की बात कह कर एक तरह से सर्वोच्च अदालत की अवमानना की है। याद रहे कुछ वर्ष पहले सिब्बल ने स्पेक्ट्रम घोटाले से हुए नुकसान पर लेखा महापरीक्षक की रिपोर्ट के खिलाफ बयानबाजी की थी।
दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर आवंटित 122 दूरसंचार लाइसेंस रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का खनन जैसे क्षेत्रों पर दूरगामी असर पड़ेगी। खनन जैसे क्षेत्रों में भी पहले आओ, पहले पाओ की नीति का पालन किया जाता है। सिब्बल ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, ‘मैं बार-बार कहता रहा हूं कि फैसले का दूरगामी असर पड़ेगा। इसका प्रभाव सिर्फ  दूरसंचार क्षेत्र पर ही नहीं बल्कि अन्य क्षेत्रों पर भी  पड़ेगा।’
उल्लेखनीय है कि शीर्ष अदालत ने तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा द्वारा आवंटित लाइसेंस को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन का बेहतर तरीका नीलामी है। सिब्बल ने कहा कि सरकार फैसले के प्रभाव का अध्ययन कर रही है और इस मामले में आगे बढऩे के बारे में निर्णय करेगी। उन्होंने खनन एवं खनिज नियमन एवं विकास कानून का उदाहरण दिया जो देश में खनिज संसाधनों का संचालन करती है और इन संसाधनों की नीलामी से चुनौतियां सामने आ सकती हैं। सिब्बल ने कहा, ‘मान लीजिए हम किसी विशेष खनिज का खनन करना चाहते हैं और हमें यह पता नहीं होता कि भूगर्भ में खनिज की मात्रा कितनी है और यह कहां है। ऐसे में आप उद्यमियों को अनुरोध करेंगे कि वे आगे आएं और उसकी संभावना के बारे में पता लगाएं।’ दूरसंचारमंत्री ने कहा कि अगर उद्यमी 60 करोड़ डालर खर्च कर खनिज की संभावना के  बारे में पता करता है तो क्या इसकी नीलामी के लिए नीति होनी चाहिए। यह सब कुछ ऐसे सवाल हैं, जिस पर गौर किए जाने की जरूरत है।’ उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का देश में भविष्य में आने वाले निवेश पर पड़ेगा। सिब्बल ने कहा कि हमें प्रत्येक चीजों का अध्ययन करना होगा। उसके बाद हम इस पर कोई निर्णय करेंगे।’
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.