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गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

राष्टपति शासन या जनादेश का शासन!

राष्टपति शासन या जनादेश का शासन!
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। यूपी में सत्ता हथियाने की जो रण छिड़ा है, उसमें सबके अपने-अपने हथियार है। चुनाव जैसे-जैसे सूबे में हो रहे हैं, वैसे-वैसे रणनीति की राह पर राजनीतिक दलों के सूरमा अपने हथियारों को चमकाने लगे हैं। सबके अपने हथियार अपनी रणनीति है वोट हथियाने से लेकर कुर्सी पाने तक की। इस सियासी संग्राम में प्रदेश की सत्ता से 22 साल से दूर कांग्रेस की रणनीति की जो राह दिखाई पड़ रही है, उसमें कुर्सी से पहले राष्टï्रपति शासन दिखाई ही नहीं दे रहा है बल्कि धमकी के अंदाज में सुनाई पडऩे लगा है। कभी यह धमकी मतदाताओं को कांग्रेस के बड़े नेता तो कभी केंद्रीय मंत्री दे रहे हैं। कांग्रेस के बड़े नेताओं की धमकी को राजनीतिक पंडित जुबान फिसलने या मीडिया द्वारा बयान को तोड़मरोड़ कर पेश करने की तर्क को खारिज करते हुए कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा बताते हैं। राजनीतिक जानकार भी इन सबको देखने और सुनने के बाद रणनीति की राह में राष्टï्रपति शासन को देखने लगे हैं।
यूपी में तेरहवीं बार राष्टï्रपति शासन की आहट को समझने के लिए आपको चुनाव की तारीखों की घोषणा से समझना होगा। वर्तमान समय में प्रदेश में पंद्रहवी विधानसभा विद्यमान है, तेरह मई 2007 को इसका गठन हुआ था, पांच साल के हिसाब से कार्यकाल तेरह मई 2012 को पूरा होगा। ऐसा लगता है यूपी में वापसी के लिए बेताब कांग्रेस की बैचेनी को समझते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने आनन-फानन में तारीख की घोषणा कर दी। हड़बड़ाहट इस कदर थी कि देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी ने पहले चरण का चुनाव मुसलिमों के पाक त्योहार वारावफात के दिन ही रखने के साथ इसकी घोषणा कर दी। चुनाव तरीखों की घोषणा के बाद जब राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया तो पहले चरण का चुनाव तीन मार्च को कर दिया। वोटों की गिनती छह मार्च को होगी, आठ मार्च को होली है। होली के त्योहार को राजनीति के रंग से बदरंग बना दिया। होली के बाद सोलहवीं विधानसभा के गठन की घोषणा निर्वाचन आयोग द्वारा कर दी जाएगी। अब सवाल यह उठता है कि मान लीजिए प्रदेश में किसी दल को बहुमत नहीं मिला तब क्या-क्या होगा। एक तरह छह मार्च को निर्वाचन का प्रमाणपत्र लिए नए परिसीमन के हिसाब से चुने गए विधायक होंगे तो दूसरी वह विधायक होंगे जिनका कार्यकाल कायदे के हिसाब से 13 मई 2012 को पूरा होगा। छह मार्च से तेरह मई के बीच लगभग सवा दो महीने तक सूबे में क्या-क्या होगा? अगर किसी दल को बहुमत नहीं मिला तो विधायकों की खरीद-फरोख्त का खेल होगा। यूपी के राजनीतिक इतिहास को देखे तो चुनाव परिणाम आने के एक सप्ताह के भीतर अक्सर यह खेल हो गए हैं। किसी दल को बहुमत न मिलने पर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के साथ वर्तमान विधायक बने रहेंगे, ऐसे में संख्याबल में जो भारी होगा, उसके पक्ष में खड़े होने के लिए पालाबदल करने वाले नवनिर्वाचित विधायकों को रोकने के लिए प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करवाना कांग्रेस की पहली वरीयता होगी। विधानसभा का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही चुनाव होने के बाद नए विधायकों के सामने वेतन से लेकर तमाम संवैधानिक सहूलियत का संकट प्रदेश में इसके पहले दो बार खड़ा हो चुका है। एक बार मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे तो दूसरी बार राजनाथ सिंह प्रदेश की मुख्यमंत्री थे। तीसरी बार यह संकट प्रदेश में छह मार्च के बाद खड़ा होने जा रहा है। किसी दल को बहुमत न मिलने पर कांग्रेस के पास इसके लिए सियासी शस्त्र राष्टï्रपति शासन है।
प्रदेश में पांच चरणों के चुनाव में मतदाताओं को रिकार्ड तोड़ रुझान किसी खास दल के पक्ष में देखने को नहीं मिल रहा है, उसे देखकर राजनीतिक विश्लेषक ही नहीं कई पार्टियों के नेता भी मान रहे हैं प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा का गठन होगा। चुनाव परिणाम से पहले राजनीतिक पूर्वनुमान को भांपकर ही शायद कांग्रेस के नेता राष्टï्रपति शासन का बयान देने लगे हैं। आज कानपुर में श्रीप्रकाश जयसवाल ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने की बात कहकर राजनीति गरम कर दी। राज्य में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना है लेकिन यदि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति आती है तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगेगा। इससे पहले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की संभावना जताई थी। कांग्रेस के बड़े नेता अपने बयान से भले ही पलटी मार दे लेकिन प्रदेश में जिस तरह वोट पड़ रहा है, उससे किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलने की संभावना फिलहाल नहीं दिखाई दे रही है। सियासी संग्राम के इस मुकाम पर आपको भी अब कांग्रेस की रणनीति की राह में राष्टï्रपति शासन खड़ा दिखाई देने लगा होगा।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी कहते हैं पंद्रहवीं विधानसभा का कार्यकाल तेरह मई 2012 को पूरा हो रहा है। चुनाव आयोग ने जिस तरह हड़बड़ी में तारीख की घोषणा वारावफात और होली को नजरअंदाज करके  की, उसके बाद कांग्रेस के बड़े नेताओं व केंद्रीय मंत्रियों के जो बयान आ रहे हैं, उससे साफ जाहिर है यूपी में सत्ता के लिए कांग्रेस कुछ भी कर सकती हैं। राष्टï्रपति शासन की धमकी कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस का सच नेताओं के जुबान पर अक्सर आ जा रहा है। धारा 356 का प्रयोग करके जनमत को कुचलने का कांग्रेस का गंदा इतिहास है। कांग्रेस यूपी के गवर्नर हाउस को कांग्रेस हाउस बनाने के लिए परेशान है।
पंद्रहवीं विधानसभा का कार्यकाल तेरह मई 2012 को पूरा होगा, सोलहवें विधानसभा चुनाव का परिणाम छह मार्च को आ जाएगा, उसके बाद क्या होगा? यह धर्म संकट का छह मार्च के बाद खड़ा होगा। आसन्न संकट के इस सवाल पर विधानसभा के वर्तमान अध्यक्ष सुखदेव राजभर ने कहा कि  सोलहवीं विधानसभा के चुनाव परिणाम भारत निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित कर दिए जाने के बाद पंद्रहवीं विधानसभा को भंग करने के लिए मुख्यमंत्री राज्यपाल से सिफारिश करेंगी। विधानसभा कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव परिणाम आ जाने से एक धर्म संकट खड़ा होगा। किसी दल को बहुमत न मिलने पर राज्यपाल की रिपोर्ट पर प्रदेश में राष्टï्रपति शासन लागू हो सकता है।
सूबे में कब-कब राष्टï्रपति शासन
पहली बार- 25 फरवरी 1968 से 26 फरवरी 1969
दूसरी बार- पहली अक्टूबर 1979 से 18 अक्टूबर 1970
तीसरी बार- तेरह जून 1973 से 8 नवंबर 1973
चौथी बार- 30 नवंबर 1975 से 21 जनवरी 1976
पांचवीं बार- 30 अप्रैल 1977 से 23 जून 1977
छठवीं बार- 17 फरवरी 1980 से 9 जून 1980
सातवीं बार - 6 दिसंबर 1992 से 4 दिसंबर  1993
आठवीं बार- 18 अक्टूबर 1995 से 17 अक्टूबर 1996
नौवीं बार- 17 अक्टूबर 1996 से 21 मार्च 1997
दसवीं बार- 8 मार्च 2002 से 3 मई 2002

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

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