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बुधवार, 28 नवंबर 2012

यूपी बना ‘मनोरंजन के मंदिरों’ का कब्रिस्तान



दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन सहित सैकड़ों अभिनेता और अभिनेत्री जिस उत्तर प्रदेश की सरजमीं में पैदा हुए, वह अब ‘मनोरंजन के मंदिरों’ का कब्रिस्तान बन गया है। मध्यमवर्ग के लिए मनोरंजन मुहैया कराने के लिए छोटे शहरों से लेकर प्रदेश की राजधानी तक सिंगल स्क्रीन सिनेमाहालों के बंद होने से इस कब्रिस्तान की झलक आप देख सकते हैं। बड़े महनगरों में सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर बंद होने के बाद मल्टीप्लेक्स खुलने से मनोरंजन के साधन जिंदा हैं, लेकिन सूबे के दो तिहाई जिलों में तो एक भी सिनेमाघर जिंदा नहीं बचा है। मनोरंजन के इन मंदिरों का कब्रिस्तान पूर्वांचल के पिछड़े जिले बस्ती हो या धार्मिक व सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी कहीं भी देखा जा सकता है। मल्टीप्लेक्स के युग में सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के बंद होने से मध्यमवर्ग मनोरंजन से मरहूम हो गया है।
एक तरफ मल्टीप्लेक्स को बढ़ावा देने के लिए पिछली सपा सरकार के समय लागू की गई प्रोत्साहन योजना से सूबे में मल्टीप्लेक्स तो धड़ाधड़ खुले लेकिन उनकी चकाचौंध के आगे सिंगल स्क्रीन सिनेमाहाल का वजूद न सिर्फ खतरे में पड़ता जा रहा है,बल्कि बंद होने की संख्या बढ़ती जा रही है। मल्टीप्लेक्स के युग में सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के सामने दर्शक घटने की जहां चुनौती थी, वहीं खर्चो के बढ़ते रहने से सिनेमाहाल चलाना घाटे का सौदा दिखने पर इसके मालिक बंद करना ही मुनासिब समझ रहे हैं। इसी कारण  प्रदेश के १०१८ सिंगल स्क्रीन सिनेमाहालों में से अब तक ५३४ में ताले लग चुके हैं। मनोरंजन के इन मंदिरों के रजत कपाट बंद होने से उसके मालिक जहां अपने को असहाय पा रहे हैं, वहीं यहां काम करने वाले कर्मचारी रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं। सिनेमाहाल बंद होने के बाद उसे तोडक़र उस भूमि के व्यावसायिक उपयोग पर प्रतिबंधित लगने के कारण है प्रदेश की राजधानी हो या पड़ोसी जिला सीतापुर ऐसे खंडहर की शक्ल में तब्दील ऐसे मनोरंजन के मंदिरों को देखा जा सकता है। इनके सामने से जब वहां के लोग गुजरते है तो उनके जेहन में मनोरंजन के मंदिरों से जुड़ी ढेरों यादें ताजा हो जाती है। मध्यम वर्ग के साथ गरीबों का मनोरंजन का साधन कहे जाने वाले सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के बंद होने के पीछे सिनेमा मालिक को उठाना पड़ा घाटा जहां प्रमुख कारण के रूप में उभरा वहीं इनमें दर्शकों की संख्या घटने से राजस्व की कमी के चलते सरकार भी उदासीन हो गयी। गरीबों का मनोरंजन का साधन कहे जाने वाले सिंगल स्क्रीन सिनेमानघरों के प्रति सरकार की उदासीनता के चलते पूर्वांचल में पचास फीसदी से ज्यादा सिनेमाघर बंद हो गये। एक तरफ  सरकार मल्टीप्लेक्स सिनेमाहालों को मनोरंजन कर में छूट दे रही है तो दूसरी तरफ  सिंगल स्क्रीन के सिनेमाहालों पर ६० प्रतिशत मल्टीप्लेक्स टैक्स लगा कर उन्हें हतोत्साहित भी कर रही है। उत्तर प्रदेश सिनेमा एग्जीबिटर्स फेडरेशन के महामंत्री आलोक दूबे ने बताया कि पूर्वाचल के अधिकांश सिनेमाहाल बंद हो चुके हैं और जो बचे हैं वे बंद होने के कगार पर हैं। वह बताते हैं वाराणसी में कभी २७ सिनेमाहाल हुआ करते थे लेकिन अब १२ ही रह गए हैं। चंदौली जिले में १२ सिनेमा हाल थे लेकिन अब सिर्फ  ४ ही रह गए हैं। इसी तरह मिर्जापुर में १३ में से ७ बंद हो चुके हैं। गाजीपुर में चार सिनेमाहाल हाल हुआ करते थे लेकिन अब सिर्फ  एक ही हाल रह गया है। बस्ती जिले में कभी छह सिनेमाहाल हुआ करता था, आज की तारीख में सब बंद हो गये हैं। गरीब और मध्यमवर्ग को मनोरंजन का साधन मुहैया कराने के लिए सत्तर के दशक में सरकार ने उत्तर प्रदेश चलचित्र निगम बनाया था। जिसका उद्देश्य था कि इसके माध्यम से सरकार गरीबों को सस्ते दर पर मनोरंजन उपलब्ध कराने का उत्तरदायित्व पूरा करेगी। इसके लिए उस समय निगम ने पूरे प्रदेश में ४३ सिनेमाहालों का निर्माण भी करवाया था लेकिन इनका भी वही हश्र हुआ जो अन्य सरकारी प्रयासों का होता है। चलचित्र निगम द्वारा बनाये गए सभी सिनेमाहाल दस साल के भीतर ही प्रदेश में बंद हो गए हैं। उत्तर प्रदेश में मनोरंजन के मंदिरों का जितना बड़ा कब्रिस्तान आज की तारीख में दिखाई दे रहा है, उतना बड़ा देश के किसी भी प्रदेश में नहीं है।

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