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गुरुवार, 29 नवंबर 2012

‘मनोरंजन के मंदिरों’ में सरकारी आदेश से मातम


- एक तरफ सन् १९८८ में सरकार ने दिया पहला आदेश सिनेमा तोड़वाकर व्यावसायिक इमारत नहीं बनवा सकते
-दूसरी तरफ चलचित्र निगम के ४३ सिनेमाघर बंद होने पर प्रदेश सरकार ने खुद उसके दूसरे उपयोग को दे दिया 
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। इक्कीस करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में गरीब और मध्यमवर्ग के लोगों के लिए मनोरंजन के मंदिर कहे जाने वाले पांच सौ से ज्यादा सिनेमाघरों में पसरे मातम के पीछे सरकारी फरमान प्रमुख कारण है। सरकारी आदेशों के चलते किस कदर साल दर साल १०१८ में से ५३४ सिनेमाघर बंद हो गये, इसको जानने के लिए सरकारी आदेशों की फाइलों के पुराने पन्नों पर नजर डालनी होगी। बात सत्तर के दशक से शुरू होगी, जब सिनेमाहाल में टिकटों के लिए मारामारी के साथ छोटे-बड़े शहरों में हाउसफुल का बोर्ड अक्सर टंगा दिखते थे। सिनेमाघरों से उत्तर प्रदेश सरकार देश में सबसे ज्यादा मनोरंजन कर वसूलने के कारण मालामाल हो रही है।  
सन्ï १९८८ में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक आदेश पास किया था कि सिनेमाघर मालिक अपना सिनेमा तोड़वा कर कोई भी व्यावसायिक इमारत नहीं बनवा सकते और अगर वे ऐसा करते है तो उन्हें भारी जुर्माना देने के बाद ही यह अनुमति मिलेगी। जब सरकार ने यह आदेश लागू किया तो तर्क दिया कि सिनेमा आम आदमी के मनोरंजन का साधन है और किसी को भी यह हक नहीं है कि वह आम आदमी के मनोरंजन को रोके। सत्तर के इसी दशक में सरकार ने उत्तर प्रदेश चलचित्र निगम बनाने के साथ प्रदेश में ४३ सरकारी सिनेमाघरों का निर्माण करवाया। दस साल के भीतर चलचित्र निगम के सभी सिनेमाघर बन्द हो गये और बाद में उन्हें दूसरे व्यावसायिक कामों में लगा दिया गया। उस समय उत्तर प्रदेश सरकार को आम आदमी के मनोरंजन का ख्याल नहीं आया।  सरकार की इस दोहरी नीति से प्रदेश में सिनेमहाल घाटे के कारण बंद होने लगे। सिनेमाघरों का बंद होना न थमने के कारण सन २००४-२००५ में सिंगल स्क्रीन सिनेमाहालों को प्रोत्साहित करने को नई नीति लागू की गई। इस नीति के तहत सिनेमाहाल को पूरा तोडऩे व ३०० सीटों का बनाने पर ही व्यावसायिक गतिविधि की अनुमति देने जैसी शर्ते थी जिससे सिनेमा मालिक उसके प्रति आकर्षित ही नहीं हुए। आम आदमी के मनोरंजन के साधन बने सिनेमाघरों का बंद होना भूलकर सरकार मल्टीप्लेक्स को स्वागत करने के लिए कई सहूलियत देने में जुट गयी। प्रदेश सरकार ने सन्ï २००९ में मल्टीप्लेक्सेस को ५ वर्ष तक मनोरंजन कर में छूट देने के साथ कई सहूलियत देने की घोषणा की।  दूसरी तरफ जून २००९ में सिंगल स्क्रीन सिनेमा में सरकार ने टिकटों के रेट कम करने का एलान किया। टिकट कम करने का एलान करने के पीछे सरकार की जेब भरने की मंशा थी। पहले सरकार नेट पर ६० प्रतिशत टैक्स लेती थी पर इस एलान के बाद सरकार ने टोटल पर टैक्स लेना चालू किया। पहले १६ रुपये में ६ रुपये बतौर टैक्स मिलता था, तो इस एलान के बाद उसे ६ रुपए ४० पैसे मिलने लगे। सिनेमाघरों के हर टिकट में से ५० पैसे फिल्म विकास निधि को जाता है। आज की तारीख में उत्तर प्रदेश के फिल्म विकास निधि के पास अरबों की सम्पत्ति है पर फि र भी इस प्रदेश में खंडहर में तब्दील होते मनोरंजन के मंदिरों की संख्या पर रोक नहीं लग पा रहा है। प्रदेश के आधे से ज्यादा जिलों में कोई सिनेमाघर आज की तारीख में चालू नहीं है। धुंआधार बंद हो रहे छोटे सिनेमाहाल के मुकाबले राजधानी सहित कई बड़े महानगरों में जहां मल्टीप्लेक्स हाल हैं जिसमें एक साथ छह सिनेमा लगाये जाते हैं जिसका टिकट दर १०० रुपये से लेकर २०० रुपए तक है। जिसमें साधारण आदमी मनोरंजन के नाम पर इतना पैसा खर्च करने की स्थिति में नहीं होता है। ऐसे में सिंगल स्क्रीन सिनेमा को किस तरह जिंदा रखा जाये ताकि गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के मनोरंजन का साधन जिंदा रहें? प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सामने आज की तारीख में यह भी एक चुनौती ही है। 


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