रोमिंग जर्नलिस्ट

शुक्रवार, 24 मई 2013

सोनभद्र का हलक यूपी में सबसे ज्यादा सूखा


दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। गर्मी में तो वैसे सबका हलक चार कदम चलने के बाद सूख जाता है लेकिन सूबे के सोनभद्र जिले के ग्रामीण क्षेत्र में लोगों का हलक सबसे ज्यादा सूखा है। प्रदेश के दर्जनभर से ज्यादा जिलों के ग्रामीण इलाकों में आज भी एक चौथाई घरों में पानी नहीं मौजूद है। पानी की तलाश में इन लोगों को लंबा सफर करना पड़ता है। सबसे ज्यादा खराब स्थिति सोनभद्र जिले की है। सोनांचल कहे जाने वाले इस इलाके ३३.७० प्रतिशत घरों में पानी का इंतजाम नहीं है। पानी के लिए इनको घर से दूर सरकारी हैंडपंप से लेकर कुंआ,नदी व तालाब का सहारा लेना पड़ता है। गर्मी में यहां भी पानी सूख जाता है तो लोगों को हलक में दो बंूद पानी के लिए लंबी जद्ïदोजहद करनी पड़ती है।
भारत सरकार द्वारा देश के सभी जिलों में कितने घरों पानी का इंतजाम मौजूद है? कितनों में नहीं है? यह जानने के लिए किये सर्वे से इस बात का खुलासा हुआ कि सोनभद्र के ग्रामीण इलाकों का हलक सबसे ज्यादा सूखा है। सोनभद्र देहात के ३३.७० प्रतिधत घरों में जहां पानी मौजूद नहीं है वहीं शहरी इलाकों में ११.६० प्रतिशत घर भी बेपानी है। सोनभद्र के बाद भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा का भी हलक काफी सूखा है। मथुरा के गांवों में भी ३३.३० प्रतिशत घरों में आज की तारीख में पानी नहीं पहुंचा है। मथुरा शहर में ऐसे घरों की संख्या ८.४० प्रतिशत है। मिर्जापुर के ग्रामाीण क्षेत्रों में भी पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची है। यहां के गांवों में २८.६० प्रतिशत घरों में पानी नहीं है। संत रविदासनगर भदोही में २३.२० प्रतिशत ग्रामीण घरों में रोजाना पानी की दरकार है।
बुन्देलखंड में भी पानी की किल्लत कम नहीं है। भगवान राम की नगरी चित्रकूट में भी पानी की किल्लत बहुत है। चित्रकूट के ग्रामीण इलाकों में २७.१० प्रतिशत घरों में आज भी पानी नहीं पहुंचा है। पानी के लिए यहां के ग्रामीणों का घाट-घाट का चक्कर लगाना पड़ता है। फहेतपुर में भी पानी की समस्या विकराल है। फतेहपुर के २६.८० प्रतिशत ग्रामीण घरों में पानी नहीं है। झांसी के ग्रामीण इलाकों में एक चौथाई घरों में पानी नहीं पहुंचा है। यहां रोजाना ग्रामीणों को पानी के लिए किसी लड़ाई से कम जद्ïदोजहद नहीं करनी पड़ती है। हमीरपुर में भी २१.८० प्रतिशत ग्रामीण इलाकों के घरों में पानी नहीं है। कानपुर देहात के देहात में भी पानी का रोना कम नहीं है। इस जिले के देहाती इलाकों में २४.८० प्रतिशत घरों में पानी नहीं मौजूद है। मुख्यमंत्री की पत्नी व सपा सांसद डिंपल यादव की राजनीतिक कर्मभूमि कन्नौज के गांव भी पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं। कन्नौज के ग्रामीण इलाकों में २३.८० प्रतिशत घरों में पानी नहीं पहुंचा है। कौशांबी में भी पानी की समस्या बरकरार है। कौशांबी में २६.६० प्रतिशत ग्रामीण घरों में पानी नहीं मौजूद है।  संगमनगरी इलाहाबाद में भी पानी की समस्या कम नहीं है। इलाहाबाद के एक चौथाई गंवई घर बेपानी है। इलाहाबाद के २५.८० प्रतिशत घरों में पानी मौजूद नहीं है। चंदौली में भी पानी की समस्या जगजाहिर है। चंदौली में २३.३० प्रतिशत घरों में पानी नहीं पहुंचा है। रोजमर्रा की जरूरत का पानी लेने के लिए भी ग्रामीणों को घर से दूर जाना पड़ता है। बांदा में भी कमावेश यही स्थिति है। बांदा के २३ प्रतिशत ग्रामीणा घरों में बूंद-बूंद पानी के लिए लोगों को चक्कर लगाना पड़ता है।

शुक्रवार, 17 मई 2013

खेतों के लिए बज रही है खतरे की घंटी


- प्रदेश की मिट्टी में तेजी से घटे पोषक तत्व,अपनी मिट्ïटी पहचाने अभियान ने किया सचेत 
- जीवांश कार्बन की मात्रा घटकर हुई आधी,नाइट्रोजन,फास्फोर,सल्फर,जिंक की भी हुई कमी
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। प्रदेश की माटी अनाज तो खूब उगल रही है लेकिन वह दिन दूर नहीं जब पैदावार कम होने लगे। यह खतरा प्रदेश के कृषि विभाग को मिट्ïटी के मृदा परीक्षण के बाद नजर आ रहा है। प्रदेश के खेतों में बड़ी तेजी से पोषक तत्व घट रहे हैं। पोषक तत्वों के घटने के पीछे कारण बड़ी संख्या में किसानों द्वारा धान-गेहूं का फसल चक्र अपनाना है। धान-गेहूं का फसल चक्र ही लगातार अपनाने के कारण स्वस्थ्य भूमि के मुख्य पोषक तत्वों के साथ सूक्ष्म पोषक तत्व भी तेजी से घट रहे हैं। प्रदेश में इस समय चल रहे मिट्ïटी पहचाने अभियान के प्रथम चरण के मृदा परीक्षण रिपोर्ड कार्ड जो जारी किया गया है, उसके अनुसार सेहतमंद खेत के लिए जरूरी पोषक तत्व जीवांश कार्बन माना जाता है। जीवांश कार्बन की मात्रा ०.८ प्रतिशत होनी चाहिए, प्रदेश में अब यह घटकर ०.४ प्रतिशत रह गयी है।
मिट्टी के पोषक तत्वों की कमी के कारण प्रदेश के खाद्यान्न उत्पादन में कुछ वर्षों के दौराव ठहराव आ गया है। इस ठहराव को खत्म करने के लिए प्रदेश में खरीफ व रबी फसल अभियान के दौरान मिट्ïटी पहचाने अभियान प्रारंभ किया गया है। मृदा स्वास्थ्य के दृष्टिïकोण प्रारंभ हुए इस अभियान का पहला चरण इस वर्ष २६ अप्रैल को प्रदेशभर में चला। लगभग छह लाख मिट्ïटी के नमूने प्रदेशभर में किसान जांच कराने के लिए पहुंचे। मिट्टी के इन नमूनों का पंद्रह मई को मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किया गया। मिट्ïटी के  इन नमूनों से जो निष्कर्ष निकलकर सामने आया, उसके अनुसार जीवांश कार्बन की मात्रा जहां सभी जिलों मानक से घटकर आधी रह गयी है, वहीं अन्य पोषक तत्व भी तेजी से घटे हैं। प्रदेश के अधिकांश जनपदों में मुख्य पोषक तत्वों के साथ-साथ द्वितीय तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी कमी हो रही है। पौधों के अच्छे विकास के लिए १६ पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है जिनमें से पौधे वायु मण्डल् तथा जल से तीन पोषक तत्वा कार्बन,हाईड्रोजन तथा आक्सीन ग्रहण करते हैं एवं १३ पोषक तत्व भूमि से ग्रहण करते हैं। भूमि से जो प्रमुख पोषक तत्व पौधे ग्रहण करते हैं वह है नाइट्रोजन,फास्फोरस,पोटास के अलावा द्वितीयक पोषक तत्व कैल्सियम,मैज्निश्सियम,सल्फर तथा सूक्ष्म पोषक तत्व जिंक, आयरन, मैज्नीज,कापर,बोरान,मालिब्डेनम एवं क्लोरीन भूमि से ग्रहण करते हैं।
प्रदेश में मिट्टी पहचाने अभियान के प्रथम चरण के नमूनों से जो निष्कर्ष निकले हैं वह खेतों के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। प्रदेश के खेतों में जहां जीवांश कार्बन की मात्रा घटकर आधी रह गयी है, वहीं अधिकांश जिलों में नत्रजन,फास्फोरस,सल्फर,जिंक,लोहा, तांबा, मैज्नीज आदि महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की भूमि में कमी दिख रही हैं। प्रदेश के खेतों महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की कमी के पीछे अधिकांश किसानों द्वारा धान-गेहूं की फसल लगातार बोने के साथ रसायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग कारण ऐसा हो रहा है। प्रदेश में इस वर्ष सरकार ने ४० लाख २० हजार मृदा नमूनों की जांच का लक्ष्य रखा है। पहले चरण का परिणाम जहां खेतों के लिए खतरे की घंटी बजा  रहे हैं, वहीं दूसरे चरण में जो नमून जांच के लिए एकत्र होने के बाद परीक्षण किए जा रहे , वह क्या कहेंगे? इसका पता तीस मई के बाद चलेगा।

शुक्रवार, 10 मई 2013

मंत्री के शादी की सिल्वर जुबली ने सबका मनमोहा



- उत्तर प्रदेश के लोकनिर्माण राज्यमंत्री सुरेंद्र पटेल ने वाराणसी में १०२ कन्याओं का बसाया घर, मांगा सांसद बनने का आर्शीवाद
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। जनप्रतिनिधियों के शानो-शौकत के किस्से आए दिन सुनने को मिलते हैं, लेकिन सादगी के साथ मिसाल कायम करने की बात कभी-कभी सामने आती है। शुकवार को ऐसी ही एक मिसाल कायम कि प्रदेश के लोक निर्माण राज्यमंत्री सुरेंद्र पटेल ने। अपनी शादी की २५ वीं सालगिरह पर उन्होंने वाराणसी-इलाहाबाद मार्ग पर स्थित राजातालाब में १०२ कन्याओं का विवाह कराने का पुनीत कार्य किया। एक सौ दो कन्याओं का विवाह कराने के बाद राज्यमंत्री ने कन्याओं का पैर छूकर सांसद बनने का आर्शीवाद मांगा। गौरतलब है समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव ने सुरेंद्र पटेल को वाराणसी लोकसभा क्षेत्र से सपा का टिकट सुरेंद्र को दिया है।
वाराणसी-इलाहाबाद हाईवे पर स्थित राजातालाब में आयोजित इस समोराह में दहेज जैसी कुरोतियों को दरकिनार करके १०२ जोड़े एक-दूसरे को माला पहनाकर परिणयसूत्र में बंध गये। सामूहिक विवाह समारोह में दो मुस्लिम परिवारों ने भी हिस्सा लिया। ढोल-नगाड़ों के बीच सैकड़ों ग्राम प्रधानों ने इस समारोह में घराती-बराती की भूमिका अदा की। लोक निर्माण राज्य मंत्री सुरेंद्र पटेल और उनकी पत्नी श्रीमती प्रभा सिंह ने कन्यादान की रस्म अदा की। राजातालाब के प्रसिद्घ दांगड़वीर हनुमान मंदिर में आयोजित इस समारोह में वर-वधू को आर्शीवाद देने के लिए देशी-विदेशी मेहमान भी पहुंचे। सामूहिक विवाह समारोह में लोकनिर्माण राज्य मंत्री की ओर सये सभी जोड़ों को एक-एक साइकिल, उनकी पत्नी की ओर से पलंग,रजाई-गद्ïदा व तकिया, लोक समिति व ग्राम प्रधानों की ओर से एक-एक सिलाई मशीन, पूर्व विधायक अब्दुल समद अंसारी ने बनारसी साड़ी, समाजसेवी गोविन्दजी पापुलर बेकरी की तरफ से रंगीन टीवी, संकट मोचन से आए मुन्ना मौर्या की ओर से एक-एक पंखा, आराजीलाइन ब्लाक प्रमुख महेंद्र पटेल ने एक-एक कलाई घड़ी, केशवभाई पटेल ने एक-एक पेंट शर्ट, यूनियन बैंक राजातालाब की ओर से घरेलू बर्तन उपहार में दिया।

सोमवार, 6 मई 2013

यूपी में रोजाना साढ़े छह करोड़ लड़ते हैं रोटी की जंग

-यूपी के ग्रामीण इलाकों में है मजदूरों की संख्या पांच करोड़ १९ लाख ५० हजार ९८०
-सूबे के शहरों में रोजाना एक करोड़ ३८ लाख ६३ हजार ७३५ लोग करते है दिहाड़ी
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। बीस करोड़ की आबादी वाले उत्तरप्रदेश में रोजाना साढ़े छह करोड़ से ज्यादा लोगों रोजी-रोटी हासिल करने की जंग लड़ते हैं। एक तिहाई से ज्यादा आबादी मजदूरी कर रही है। मजदूरों की इतनी बड़ी संख्या देश के किसी भी प्रदेश में नहीं है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से जारी ताजा आंकड़ों को देखकर उत्तर प्रदेश का विकास के किस पायदान पर खड़ा है,इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में मजदूरों की संख्या छह करोड़ ५८ लाख १४ हजार ७१५ दर्ज की गयी है। इसमें पुरुषों की संख्या चार करोड़ ९८ लाख ४६ हजार ७६२ तथा महिला मजदूरों की संख्या एक करोड़ ५९ लाख ६७ हजार ९५३ है।
उत्तर प्रदेश में मजदूरों की संख्या को लेकर तीस अप्रैल को केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा जारी आंकड़ों से जो तस्वीर उभरकर आयी है, वह बताती है उत्तर प्रदेश में रोजी-रोटी के लिए लोगों को कितना संघर्ष करना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में मजदूरों की संख्या पांच करोड़ १९ लाख ५० हजार ९८० दर्ज की गयी है। जबकि सूबे के शहरों में भी रोजाना एक करोड़ ३८ लाख ६३ हजार ७३५ लोग करते है मजदूरी। गाजियाबाद और गौतमबुद्घनगर को छोडक़र प्रदेश के सभी जिलों में ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों की संख्या शहर की तुलना में ज्यादा है। मजदूरों की यह संख्या बता रही है कि प्रदेश में रोजी-रोटी के लिए लोग कितना संघर्ष कर रहे हैं।
मजदूरों की संख्या उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा इलाहाबाद में २१११९०७ मजदूर है। श्रम नगरी कानपुर में १५७२२३२ है। कानपुर शहर में दस लाख से ज्यादा तो देहात में पांच लाख से ज्यादा मजदूर रोजाना रोजी-रोटी की जंग लड़ रहे हैं। लखनऊ में १५ लाख ४२ हजार आठ सौ छह मजदूरों की गिनती हुई है। लखनऊ शहर में इनकी संख्या  १०२०६४६, देहात में ५२२१६० है। उसके बाद गाजियाबाद में १५ लाख २० हजार ५३८ है। गाजियाबाद शहर में १०२४४६१ तथा देहात में ४९६०७७ लोग मजदूरी कर रहे हैं।  सीतापुर में १४२२६०२,पीतल नगरी मुरादाबाद में  १४१७८११, बरेली में १४०१९७१,आगरा में १३८९८४४, हरदोई में १३१८९४६,लखीमपुर खीरी में १२६४७१८,रायबरेली में १२०७१०,अलीगढ़ में ११७४३६१, बुलन्दशहर में ११७३२६०,उन्नावं में ११२४७४४, बंदायू में ११०७३४३,मेरठ में १०९०५३९, शाहजहांपुर में ८९२२१४, मथुरा में ८४०९३९, फिरोजाबबाद में ७६१५२१, पीलीभीत में ६१८६०५,मैनपुरी में ५६०८४०,रामपुर में  ७३७२६१, ज्योतिबफूलेनगर में ५९९०८९,बागपत में ४१६६९५,सहारनपुर में १०३७३४४,मुज्जफरनगर में १२९१६४४,बिजनौर में १०८८०३६, महामायानगर में ४८४११५,फर्रूखाबाद में ५३२२६७,कन्नौज में ५२४६७६,इटावा में ५०६०७२, औरेया में ४४२०२३, कानपुर देहात में ६२८८६४, जालौन में ६२०७६४, झांसी में ८१४९१४,ललितपुर में ५०३३५१, हमीरपुर में ४४३६५५, महोबाद में ३४९६७६, बांदा में ७०१६८९, चित्रकूट में ३९४१९७, फतेहपुर में १०६३९२९,प्रतापगढ़ में १०६६६०१,कौशांबी में ६३९०८६,बाराबंकी में ११९२८५०,फैजाबाद में ८३१२०९,अंबेडकरनगर में ७८७३९८, सुल्तानपुर में १२४२६३२, बहराइच में ११५२१६०, श्रावस्ती में ४०३७५५,बलरामपुर में ७६०२५३,गोंडा में ११७०५५२,सिद्घार्थनगर में ८७८८९८,बस्ती में ७८३६८८,संतकबीर नगर में ५३९४६९, गोरखपुर में १३५१६२९,महाराजगंज में ९९४२५३, कुशीनगर में १११६९७३, देवरिया में ८७६२४६, आजमगढ़ में १३७२०३२,मऊ में ६९६७४७, बलिया में १०१९४८३, जौनपुर में १४३७३७५, गाजीपुर में १२०४६०२, चंदौली में ६५२५४३, वाराणसी में १२२०७०८, भदोही में ४७०६०८, मिर्जापुर में ८८१९९६, सोनभद्र में ७३०३९९, एटा में ५४५९८४ एवं कांशीरामनगर में ३७५२१३ मजदूरों की संख्या दर्ज की गयी है।

कम्प्यूटर क्रांति में सुनिए दलितों का पदचाप

दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। ज्ञान पर किसी जाति,धर्म का अधिकार नहीं होता है बल्कि हर इंसान ज्ञान से सबकुछ हासिल करता है। ज्ञान की इस कसौटी पर समय के साथ आगे बढऩे में अनुसूचित जाति और जनजाति भी किसी से पीछे नहीं है। प्रदेश में तेजी से हो रहे कम्प्यूटर क्रांति में दलितों की पदचाप सुनकर इसको नजदीक से महसूस किया जा सकता है। समय के साथ सूचना व प्रौद्योगिकी की दौड़ में आगे बढ़ रहे हिन्दुस्तान में सालों से उपेक्षित व शोषित दलित और आदिवासी तबके में क्या बदलाव आया है? भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने यह जानने के लिए सभी राज्यों में अनुसूचित जाति और जनजाति के कितने प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर या लैपटाप पहुंच गया है, इसकी जानकारी बटोरी। इस गणना के दौरान जो तसवीर उभरी है उसे देखकर आप भी कम्प्यूटर क्रांति में दलितों की सुखद पदचाप सुन सकते हैं। देश में सबसे ज्यादा दलितों की आबादी लगभग चार करोड़ उत्तरप्रदेश में है।
उत्तर प्रदेश में सबसे हाईटेक जिलों में शुमार गौतमबुद्घनगर के दलित घर में कम्प्यूटर या लैपटाप रखकर कम्प्यूटर क्रांति में आगे बढऩे में सबसे आगे हैं। गौतमबुद्घनगर में १३.५० प्रतिशत दलितों के घर लैपटाप या कम्प्यूटर मौजूद है। दूसरे नंबर पर गाजियाबाद है, यहां १३.१० प्रतिशत अनुसूचित जाति के घरों में कम्प्यूटर या लैपटाप पहुंच गया है। गाजीपुर में ९.८० प्रतिशत अनुसूचित जाति के घरों में माउस क्लिक होने लगा है तो आगरा में ऐसे दलित घरों की संख्या ९.२० प्रतिशत है। अलीगढ़ में ७.६० प्रतिशत, इलाहाबाद में ७.१० प्रतिशत, अंबेडकरनगर में ७.३० प्रतिशत,औरेया में ५.२० प्रतिशत,आजमगढ़ में ६.५० प्रतिशत,बागपत में ८.९० प्रतिशत,बहराइच में ५.८० प्रतिशत,बलिया में ९.४० प्रतिशत,बलरामपुर में ४.७०,बांदा में ५.३० प्रतिशत,बाराबंकी में ४ प्रतिशत,बरेली में ५.९० प्रतिशत, बस्ती में ७.८० प्रतिशत,बिजनौर में ४.५० प्रतिशत, बंदायूं में ५.१० प्रतिशत,बुलन्दशहर में ५.४० प्रतिशत,चंदौली में ६.२० प्रतिशत,चित्रकूट में ४.६० प्रतिशत,देवरिया ७.३० प्रतिशत,एटा में ५.४० प्रतिशत,इटावा में ६.४० प्रतिशत,फैजाबाद में ७.९० प्रतिशत, फर्रूखाबाद में ६.३० प्रतिशत, फतेहपुर में ७ प्रतिशत, फिरोजबाद में ६.६० प्रतिशत,गोंडा में ५.५० प्रतिशत,गोरखपुर में ७.६० प्रतिशत, हमीपुर में ४.८० प्रतिशत,हरदोई में ४ प्रतिशत,जालौन में ६.३० प्रतिशत,जौनपुर में ७.१० प्रतिशत, झांसी में ९.१० प्रतिशत,ज्योतिबाफूलेनगर में ५ प्रतिशत,कन्नौज में ६.७० प्रतिशत,कन्नौज में ६.९० प्रतिशत, कानपुर देहात में ६.७० प्रतिशत, कानपुर नगर में ५.८० प्रतिशत, कांशीरामनगर में ५.८० प्रतिशत,कौशांबी में ५.४० प्रतिशत, लखीमपुर खीरी में ३.५० प्रतिशत, कुशीनगर में ६.२० प्रतिशत,ललितपुर में ४ फीसदी, लखनऊ में ८.४० प्रतिशत,महामायानगर में ६.२० प्रतिशत, महोबाद में ६.७० प्रतिशत, महाराजगंज में ६.१० प्रतिशत, मैनपुरी में ७.१० प्रतिशत, मथुरा में ७.२० प्रतिशत,मऊ में ७.७० प्रतिशत, मेरठ में ८.२० प्रतिशत,मिर्जापुर में ५.४० प्रतिशत,मुरादाबाद में ६.५० प्रतिशत,मुज्जफरनगर में ६.४० प्रतिशत,पीलीभीत में ५.१० प्रतिशत,प्रतापगढ़ में ६ प्रतिशत,रायबरेली में ५.२० प्रतिशत,रामपुर में ६ प्रतिशत, सहारनपुर में ४.१० प्रतिशत,संतकबीरनगर में ७.५० प्रतिशत, संतरविदासनगर में ६.४० प्रतिशत, शाहजहांपुर में ४.८० प्रतिशत,श्रावस्ती में ५.५० प्रतिशत, सिद्घार्थनगर में ६.४० प्रतिशत,सीतापुर में ४.१० प्रतिशत, सोनभद्र में ५.५० प्रतिशत,सुल्तानपुर में ६.४० प्रतिशत,उन्नाव में ४.६० प्रतिशत व वाराणसी में ७.८० प्रतिशत दलितों के घर में कम्प्यूटर या लैपटाप दाखिल हो गया है।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

अमेरिका के मुंह पर अखिलेश का तमाचा


- आजम के अपमान पर मुख्यमंत्री ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में किया लेक्चर का बायकाट
- आजम ने कहा कि अमेरिका आने पर मुझे खेद है, मुस्लिम होने के कारण ऐसा सलूक
लखनऊ। सुरक्षा के नाम पर जांच-पड़ताल अमेरिकी दादागिरी के खिलाफ उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विरोध का जोरदार तमाचा मारकर हिन्दुस्तानियों का दिल जीतने का काम किया है। सपा नेता आजम खान के अपमान मामले को लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हार्वर्ड लेक्चर का बायकॉट कर दिया है। अखिलेश यादव के इस फैसले पर उनको बधाई देने वालों का तांता उनकी सोशलनेटवर्किंग साइट पर लग गयी है। गौरतलब प्रदेश के नगर विकास मंत्री मोहम्मद आजम खान मुख्यमंत्री के साथ हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक आयोजन में हिस्सा लेने अमेरिका गए है। बुधवार को बोस्टन लोगन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उनको पूछताछ के लिए लगभग दस मिनट तक रोके रखा गया। अमेरिका के आव्रजन अधिकारियों द्वारा अमेरिका की घरेलू सुरक्षा के नाम पर हुई पूछताछ का आजम खां ने उसी वक्त विरोध किया था। आजम का आरोप है कि मुस्लिम होने के कारण उन्हें रोका गया है।
प्रदेश के नगर विकास मंत्री के साथ हुए इस दुव्र्यवहार पर न्यूयार्क स्थित भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया और खान को हवाई अड्डे से सुरक्षा घेरे में बाहर लाया गया। इस घटना को लेकर अमेरिकी अधिकारियों द्वारा खेद न व्यक्त किए जाने पर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में आयोजित लेक्चर का बायकाट करके कड़ा विरोध जताया है। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में नगर विकास मंत्री मोहम्मद आजम खां ने तो व्याख्यान दिया लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बोस्टन में आजम खां के साथ पूछताछ के लिए रोके जाने को एक भारतीय का अपमान बताते हुए खुद लेक्चर का बायकाट कर दिया। नगरविकास मंत्री ने आधिकारिक रूप से एचबीएस में अपना विरोध दर्ज कराया। उन्होंने कहा वे भारत लौटने के बाद अपनी भावी कार्रवाई पर विचार करेंगे। आजम ने अमेरिका आने के अपने फैसले पर खेद जताया है। नगरविकास मंत्री के निजी सहायक मुक्तिनाथ झा ने एक बयान जारी किया जिसमें आजम खान ने आरोप लगाया कि उनकी तलाशी लेने के बहाने घरेलू सुरक्षा विभाग के अधिकारियों ने उनका अपमान किया। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके साथ यह व्यवहार इसलिए किया गया, क्योंकि वह मुस्लिम हैं। अमेरिका के अंदर हवाई अड्डे की सभी गतिविधियां घरेलू सुरक्षा विभाग के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। वहां के हवाई अड्डों पर भारतीय विशिष्ट व्यक्तियों को रोके जाने का यह प्रकरण सबसे ताजा उदाहरण है। इसके पहले पिछले साल बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान को न्यूयॉर्क हवाई अड्डे पर पूछताछ के लिए रोका गया था। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और अमेरिका में भारतीय राजदूत रहीं मीरा शंकर के साथ भी इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

लखनऊ के एक चौथाई घरों में कम्प्यूटरराज


-प्रदेश के चालीस शहरों में तेजी से लोगों के घरों में कम्प्यूटर ने जगह बनायी
-गौतमबुद्घनगर नंबर वन, गाजियाबाद नंबर दो  और लखनऊ तीसरे स्थान पर
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। कम्प्यूटर क्रांति का ककहरा पढ़ रहे उत्तर प्रदेश के महानगरों में बड़ी तेजी से लोगों के घरों में कम्प्यूटर या लैपटाप अपना स्थान बना रहा है। प्रदेश के चालीस शहरों में तो दस फीसदी आबादी के घर में कम्प्यूटर पहुंच गया है। गांव-देहात भी सूचना क्रांति की इस रेस में पीछे नहीं रहना चाहते हैं। प्रदेश के सभी जिलों के ग्रामीण इलाकों में भी चार से आठ फीसदी घरों में कम्प्यूटर माउस घूमने के साथ देश-दुनिया की जानकारियों का खजाना खुल रहा है। भारत के महारजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया की ओर से देश के सभी राज्यों में कम्प्यूटर की घरों में पहुंच को लेकर जो सर्वे कराया गया, उसमें यूपी के आठ फीसदी घरों में इसकी पहुंच बन गयी है। यूपी के भीतर किस शहर के कितने घरों में कम्प्यूटर की पहुंच हो गयी है? आंकड़ों में जब इसको देखेंगे तो प्रदेश के ४० शहरों में कम्प्यूटर माउस लोगों के घरों में तेजी से घूमते दिखाई देंगे।
घरों में कम्प्यूटर या लैपटाप के मामले में प्रदेश में सबसे आगे गौतमबुद्घनगर का नाम है। इस जिले के २७.६० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर पहुंच गया है। गौतमबुद्घ नगर के ग्रामीण इलाकों में अगर १२ प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर माउस घूम रहे हैं तो शहरी क्षेत्र में यह संख्या सबसे ज्यादा ३५.८० प्रतिशत है। गौतमबुद्घनगर के बाद दूसरे नंबर पर गाजियाबाद का स्थान है। गाजियाबाद के २१.६० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर पहुंच गया है। प्रदेश की राजधानी लखनऊ इस मामले में तीसरे स्थान पर है। लखनऊ के १८.५० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर पहुंच गया है। लखनऊ शहर में रहने वाले एक चौथाई लोगों के घरों में कम्प्यूटर या लैपटाप मौजूद है। सर्वे के अनुसार लखनऊ शहर में २५.२० प्रतिशत तो ग्रामीण इलाकों के ५.१० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर पहुंच गया है। रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया के सर्वे बताते हैं राजधानी के एक चौथाई घरों में कम्प्यूटरराज हो गया है। प्रदेश की राजधानी के बाद आगरा व मेरठ का नंबर है। इन दोनों जिले के १२.२० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर अपनी जगह बना लिया है। कानपुर नगर और झांसी के ११.४० फीसदी घरों में कम्प्यूटर की दखल जहां हो गयी है, वहीं वाराणसी के भी १०.६० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर पहुंच गया है।
प्रदेश के ७५ जिलों के शहरी इलाकों में कम्प्यूटर कितने घरों में समय के हिसाब से जरूरी उपकरण बन गया है। इस पर नजर डालेंगे तो चालीस शहरों में दस फीसदी से ज्यादा घरों में कम्प्यूटर की पहुंच इस बात की गवाही देती है कम्प्यूटर क्रांति का ककहरा उत्तर प्रदेश तेजी से पढ़ रहा है। इलाहाबाद शहर में १९.६० प्रतिशत,अलीगढ़ में १६.१० प्रतिशत, वाराणसी शहर में १५.८० प्रतिशत,बागपत में १७.६० प्रतिशत,आजमगढ़ में १३.४० प्रतिशत,बलिया शहर में ११.२० प्रतिशत,बरेली में १२.७० प्रतिशत,बस्ती में १४.१० प्रतिशत,बुलंदशहर में १२.३० प्रतिशत,एटा में ११.३० प्रतिशत,फैजाबाद में १२.५० प्रतिशत,फिरोजाबाद में ११.४० प्रतिशत,गाजीपुर में १२.८० प्रतिशत,गोंडा में १३.४० प्रतिशत,गोरखपुर में १८.८० प्रतिशत,जौनपुर में ११.६० प्रतिशत,झांसी में १६.८० प्रतिशत,कानपुर देहात में १५.२० प्रतिशत,कानपुर नगर में १५.३० प्रतिशत,कुशीनगर में १०.२० प्रतिशत, मैनपुरी में ११.२० प्रतिशत,मथुरा में १४.७० प्रतिशत,मऊ में १०.३० प्रतिशत,मेरठ में १७.३० प्रतिशत,मिर्जापुर में ११.१० प्रतिशत, मुरादाबाद में ११.८० प्रतिशत,मुज्जफरनगर में १२.६० प्रतिशत,प्रतापगढ़ में १०.२० प्रतिशत,रायबरेली में ११.४० प्रतिशत, सहारनपुर में ११.७० प्रतिशत, संतकबीर में ११ प्रतिशत, सुलतानपुर में १५.३० प्रतिशत व सोनभद्र शहर के १६.४० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर की पहुंच हाईटेक यूपी की तसवीर बताने के लिए काफी है।

यूपी के आठ फीसदी घरों में पहुंच गया कम्प्यूटर


देश में चंडीगढ़ है साइबर की रेस में सबसे आगे, छत्तीसगढ़ है सबसे पीछे
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। सूचना प्रौद्योगिकी की दौड़ में चंडीगढ़ देश में सबसे आगे हैं, इस दौड़ में हिस्सा लेने के लिए यूपी भी अब कम्प्यूटर क्रांति का ककहरा सीखने लगा है। भारत के रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया की ओर से देशभर के सभी राज्यों में जिन घरों में कम्प्यूटर या लैपटाप मौजूद है? इसकी गिनती के बाद जो आंकड़े आए हैं वह बता रहे है कि प्रदेश के ८.१० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर या लैपटाप पहुंच गया है। यूपी के शहरों में ऐसे घरों की तादाद १५.४० प्रतिशत तो गांवों में भी ५.९० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर क्रांति की अलख जग गयी है। प्रदेश सरकार द्वारा लैपटाप बांटने की योजना का श्रीगणेश करने से आने वाले दिनों में इस अलख की लौ और तेज होने की उम्मीद है। वैसे उत्तराखंड यूपी से इस मामले में आगे है। उत्तराखंड के १०.९० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर पहुंच गया है।
हिन्दुस्तान में सूचना क्रांति के बाद किस प्रदेश में कितनी प्रगति हुई? इसका अंदाजा महारजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया की ओर से कम्प्यूटर और लैपटाप रखने वालों की संख्या देखकर आप बखूबी लगा सकते है। चंडीगढ़ के लोग सूचना व प्रौद्योगिकी की रेस में सबसे आगे है। चंडीगढ़ में ३३.२० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर या लैपटाप मौजूद है। इस हिसाब से चंडीगढ़ के हर तीसरे घर में कम्प्यूटर क्रांति की अलग पहुंच गयी है। चंडीगढ़ के बाद गोवा का नंबर है। गोवा में ३१.२० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर पहुंच गया है। देश की राजधानी दिल्ली इस मामले में तीसरे नंबर पर है। दिल्ली के २९.१० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर पहुंच गया है। चौथे पायदान पर केरला का नाम है। केरल के १५.७० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर पहुंच गया है तो मिजोरम में ऐसे घरों की संख्या १५.२० प्रतिशत है। लक्षद्वीप में १४ प्रतिशत,पांडीचेरी के १३.६० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर पहुंच गया है तो महाराष्टï्र में ऐसे घरों की संख्या १३.३० प्रतिशत है।

हरियाना में ऐसे घरों की संख्या १३.२० प्रतिशत,कनार्टक में १२.८० प्रतिशत, पंजाब में १२.८० प्रतिशत, सिक्किम में ११.६० प्रतिशत,तमिलनाडु में १०.६० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर या लैपटपाट पहुंच गया है।  असम व दमन में ९.३० प्रतिशत, मणिपुर में ९ फीसदी, नागालैंड में ८.९० प्रतिशत, गुजरात व अंडमान निकोबार में ८.८० प्रतिशत,जम्मू-कश्मीर,आंध्रप्रदेश व हिमांचल प्रदेश में ८.४० प्रतिशत,पश्चिम बंगाल में ८.३० प्रतिशत, दादर एंड नागर हवेली में ८.२० प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश में ८.१० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर या लैपटाप पहुंच गया है। मेघालय में ७.६० प्रतिशत, त्रिपुरा में ऐसे घरों की संख्या ७.४० प्रतिशत तो बिहार में ७ प्रतिशत,राजस्थान व झारखंड में ६.९० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर क्रांति की अलख पहुंच गयी है। मध्य प्रदेश में ५.९० प्रतिशत,उड़ीसा में ५.१० प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर या लैपटाप पहुंच गया है।


रविवार, 7 अप्रैल 2013

बाइक की रेस में यूपी करोड़पति नंबर वन


स्पीड की सडक़
उत्तर प्रदेश में पंजीकृत बाइक की संख्या एक करोड़ के पार पहुंच गयी
उत्तराखंड बंटने के बाद यूपी में वाहनों की संख्या में आठ गुना इजाफा
बाइक के बाद वाहनों के मामले कार दूसरे, ट्रैक्टर तीसरे नंबर पर है
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। जिंदगी एक रेस है। रेस में दौडऩे के लिए हम कार,बाइक,बस,टैक्सी,ट्रक्टर व प्राइवेट कैरियर के वाहन का उपयोग करते है। इस रेस में अगर आपके पास अपना वाहन हो तो जिंदगी स्पीड की सडक़ पर मंजिल की तरफ दौड़ पड़ती है। इस दौड़ में उत्तर प्रदेश अब बाइक के मामले करोड़पति बन गया है। बाइक मालिकों की संख्या जितना यहां दर्ज की गयी उतना किसी भी राज्य में नहीं है। प्रदेश के परिवहन विभाग में सन् ८० से दिसंबर २०१२  तक मोटर साइकिल पंजीकरण कराने वालों की संख्या संख्या एक करोड़ ३७ लाख, ५९ हजार ८६० हो गयी है। उत्तराखंड बनने के बाद अगर यूपी में सन ९१ से बाइक पंजीकरण कराने वालों की संख्या जोड़े तो भी एक करोड़ से ज्यादा है।
यूपी की सडक़ों पर अगर वर्ष २०१२ में बाइक खरीदने वालों की तादाद देंखे तो उनकी संख्या परिवहन विभाग में दर्ज आंकड़ों के अनुसार बारह लाख से ज्यादा है। वर्ष २०११-१२ में बाइक खरीदने व पंजीकरण कराने वालों की संख्या अभी तक की सबसे ज्यादा दर्ज की गयी है। इस दौरान १३६८५२४ मोटरसाइकिल पंजीकरण हुए है। वर्ष २०१० में १२६९५५०, वर्ष २००९ में ११२०७४८ मोटरसाइकिल परिवहन विभाग में पंजीकरण हुए है। यूपी में बाइक की संख्या सबसे ज्यादा अभी तक दूसरे राज्यों की तुलना में है। उत्तर प्रदेश में बाइक की संख्या अगर एक करोड़ से ज्यादा है।
उत्तर प्रदेश में बाइक  ही नहीं दूसरे वाहनों की संख्या में भी काफी इजाफा हुआ है। वाहनों की बढ़ती संख्या  परिवहन विभाग के लिए एक चुनौती बन गयी है। प्रदेश के परिवहन आयुक्त की माने तो प्रदेश में आवागमन एवं यातायात व्यवस्था में होने वाली प्रगति का अनुमान पंजीकृत मोटर वाहनों को देखकर लगाया जा सकता है। वर्ष १९९०-१९९१ में वर्तमान उत्तराखंड को लेकर जहां मार्ग पर चलित सभी प्रकार के वाहनों की संख्या १९४१६८७ वहीं ३१ मार्च २०१२  को उत्तराखंड छोडक़र सभी प्रकार के वाहनों की संख्या १५४२१५४७ है। इस प्रकार पिछले १९ साल में वाहनों की संख्या में लगभग आठ गुना की बढ़ोत्तरी हुई है। वाहनों की संख्या में इतना इजाफा देश के किसी दूसरे राज्य में अभी तक होने का रिकार्ड नहीं है।
उत्तर प्रदेश बाइक के मामले में जहां करोड़पति क्लब का देश में पहला मेंबर है, वहीं कार की संख्या में पिछले साल की तुलना में थोड़ी गिरावट दर्ज की गयी है। प्रदेश के परिवहन विभाग के आंकड़ों के अनुसार कार की संख्या २०४०४९१ दर्ज है। वर्ष २०११-१२ में जहां प्रदेश में अब तक सबसे ज्यादा १३४५८० कार लोगों ने खरीदकर पंजीकरण कराया वहीं पिछले वर्ष इसकी संख्या में मामूली कमी दर्ज की गयी। वर्ष २०१२ में दिसंबर तक १०७३८९ कार लोगों ने खरीदी। प्रदेश में पिछले चार साल से प्रतिवर्ष एक लाख से ज्यादा लोग कार खरीद रहे हैं। प्रदेश में पजीकृत वाहनों की संख्या में बाइक सबसे ज्यादा है, वहीं दूसरे नंबर कार की संख्या है। कृषि  प्रदेश में बाइक, कार के बाद वाहनों में नंबर आता है ट्रैक्टर का। प्रदेश में पंजीकृत बीस लाख ट्रैक्टर देश में खेती के मामले में यूपी को आगे रखने में अपना योगदान दे रहे हैं। बस की संख्या ५२४१४, मिनी बस २८२०४,ट्रक ४३१३१५, तीन पहिया डिलवरी वाहनों की संख्या ९१९२५, टैम्पो-आटो रिक्शा की संख्या ३११७५९ है।

गुरुवार, 28 मार्च 2013

संजू पर संकट देख होली नहीं मनाएं स्कूली मास्टर




लखनऊ। बालीवुड अभिनेता संजय दत्त को चाहने वालों की तादाद को गिनना अपने आप में टेढ़ी खीर है। संजू बाबा के ऐसे चहेतों में उनके एक गुरु भी है तो आठ साल उसकी देखरेख में कोई कसर नहीं छोड़ी। संजय दत्त जब शिमला के सनोबर हिल्स में मौजूद लारेंस स्कूल में पढ़ते थे तो उस समय हाउस मास्टर के रूप में तैनात डा.डीके गुप्ता संजू बाबा को मिली सजा को लेकर सदमे जैसी स्थिति में है। होली के दिन जब इस खबरनवीस ने डा.गुप्ता को फोन करके हैप्पी होली बोला तो वह बड़े मायूस दिखे। होली के दिन डा.गुप्ता के मायूसी का कारण पूछने पर पता चला कि टीवी पर संजू को सजा को लेकर रोते देखकर होली मनाने का दिल नहीं किया।
होली की चर्चा चली तो डा.गुप्ता को वह दिन याद आ गये जब संजू बाबा एक बार होली में घर नहीं जा पाया था। डा.गुप्ता कहते हैं बात अस्सी के दशक की है, संजू के साथ कई स्टूडेंट घर नहीं जा पाये थे। उनके बीच फिर होली का आयोजन किया। स्वादिष्टï मिठाई के साथ अबीर-गुलाल के बीच संजू और उसके साथियों की मस्ती देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। मुझे लगा कि मैं ही इनका यहां मां और बाप दोनों का रोल अदा कर रहा हूं। एक वह होली दूसरी आज की होली। टीवी न्यूज चैनल पर संजू का कोर्ट के साथ समर्पण करने की घोषणा के साथ आई लव इंडिया कहते हुए रोता देखकर मेरा मन भी भर गया है। संजू का परिवार जिस सदमे से गुजर रहा है, उसको देखकर मेरा दिल भी होली मनाने का नहीं किया। होली के दिन लारेंस स्कूल की एलबम निकालकर उन चित्रों को देखता रहा।
प्रदेश की राजधानी में रह रहे संजू बाबा के स्कूली गुरु डा.डीके गुप्ता सन्ï १९९३ में मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट से जुड़े मुकदमें में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं। गौरतलब है कि संजय दत्त को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध तरीके से हथियार रखने के जुर्म में पांच साल की सजा सुनाई है। डेढ़ साल की जेल में सजा काट चुके संजय दत्त को बाकी की सजा काटनी है। देशभर में संजय की सजा माफी को उठ रही आवाजों को लेकर सियासत होने को अनुचित बताते हुए डा.गुप्ता कहते हैं अदालती फैसले में हस्तक्षेप करना ठीक नहीं होगा। डा.गुप्ता को उम्मीद है संजू को जो सजा मिली, वह अपने अच्छे आचरण के बदले अदालत से कम करवा सकता हैं।

मंगलवार, 19 मार्च 2013

पूर्वांचल में परिवार नियोजन मतलब ‘हम दो हमारे सात’

- आजमगढ़ में सबसे ज्यादा २७.४० फीसदी लोग बनाए हैं ‘हम दो हमारे सात’ का परिवार
- मऊ जिले में चालीस फीसदी से ज्यादा घरों में फहर रहा ‘हम दो हमारे पांच’ का परचम
दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। जनसंख्या विस्फोट के मुहाने पर खड़े हिंदुस्तान में ‘हम दो हमारे दो’ की जगह ‘हम दो हमारे सात’ का फार्मूला अपनाने में उत्तर प्रदेश अव्वल है। मियां-बीबी और बच्चों की तादाद पांच से लेकर सात तक की संख्या खड़े करने में उत्तरप्रदेश जहां पूरे देश में आगे वहीं प्रदेश में पूर्वांचल ऐसे ‘बिग परिवार’ की संख्या सबसे ज्यादा है। नेशनल पापुलेशन रजिस्टर बनने की कवायद के दौरान देश के महारजिस्ट्रार आफ इंडिया ने उत्तर प्रदेश के जो आंकड़े मुहैया कराये हैं, उसके हिसाब पूर्वांचल में ‘बिग परिवार’ ज्यादा है। परिवार नियोजन के नारों को हवा में उड़ाकर परिवार बढ़ाने में पूर्वांचल ने किस तरह पैर पसारा? महा रजिस्ट्रार आफ इंडिया द्वारा देश के सभी राज्यों में परिवार के बारे में जो आंकड़ें बटोरे हैं, उसको देखकर जनसंख्या विस्फोट किस कदर किस जिले में कितना हो रहा है? इसको बखूबी देखा जा सकता है।
प्रदेश में परिवार नियोजन की नीति को तवज्जों देने की बजाए खुद की चाह को वरीयता देने से पूर्वांचल में किस कदर जनसंख्या बढ़ी, इसको देखने के लिए सबसे पहले उन जिलों की तसवीर देखते हैं जो ‘हम दो हमारे सात’ को अपनाने में अव्वल है। पति-पत्नी के साथ पांच या इससे ज्यादा बच्चों को पैदा करने के बाद परिवार को पाल-पोस रहे लोगों की तादाद आजमगढ़ में सबसे ज्यादा है। आजमगढ़ में २७.४० प्रतिशत लोगों ने ‘हम दो हमारे दो’ की जगर ‘हम दो हमारे सात’ का नारा खुद गढक़र परिवार बनाने में विश्वास रखा। आजमगढ़ के बाद जौनपुर का नंबर है। जौनपुर में भी ‘हम दो हमारे सात’ का फैमिली फार्मूला बनाने वाले घरों की तादाद २६.३० प्रतिशत है। नेपाल सीमा पर मौजूद सिद्घार्थनगर जिले में ऐसे बिग परिवार की संख्या २५. ५० प्रतिशत है। देवरिया में २५.४० प्रतिशत,मऊ में २४. ९० प्रतिशत, संत कबीरनगर में २४.८० प्रतिशत,गाजीपुर में २४.६० प्रतिशत, बलिया में २३.१० प्रतिशत,बलरामपुर में २३.४० प्रतिशत,अंबेडकर नगर में २२.८० प्रतिशत, बस्ती में २२.८० प्रतिशत, गोंडा में २०.५० प्रतिशत के साथ गोरखपुर में २०.२० प्रतिशत घरों में ‘हम दो हमारे सात’ की गूंज है।
जनसंख्या विस्फोट के मुहाने पर बैठे उत्तर प्रदेश में ‘हम दो हमारे पांच’ का परिवार खड़ा करने वाले जिलों मऊ सबसे आगे है। मऊ जिले में ४०.३० प्रतिशत घरों में ‘हम दो हमारे पांच’ का परचम फहर रहा है। चालीस फीसदी से ज्यादा घरों में ‘हम दो हमारे पांच’ का फार्मूला अपनाने में मऊ अकेले नहीं है। कुशीनगर में ४०.२० प्रतिशत,एटा में ४०.१० प्रतिशत व ज्योतिबाफूलेनगर में ४० प्रतिशत घर इसी श्रेणी में आते हैं। मैनपुरी ३९.३० प्रतिशत,बदायूं ३९.२० प्रतिशत,मुरादाबाद ३९.१० प्रतिशत,गाजीपुर व बलिया में ३९ प्रतिशत,अलीगढ़,बुलंदशहर में ३८.९० प्रतिशत, संतकबीरनगर ३८.८० प्रतिशत,बागपत ३८.७० प्रतिशत,अंबेडकरनगर, महाराजगंज में ३८.६० प्रतिशत, आगरा में ३८.५० प्रतिशत, बिजनौर में ३८.३० प्रतिशत,बदायूं में ३८.२० प्रतिशत,बरेली में ३८.१० प्रतिशत,चंदौली में ३७.९० प्रतिशत,चित्रकूट में ३७.५० प्रतिशत, औरेया ३६.९० प्रतिशत, इटावा में ३६.७० प्रतिशत, इलाहाबाद में ३६.३० प्रतिशत, बलरामपुर व बांदा में ३६.२० प्रतिशत, बहराइच में ३५.५० प्रतिशत,लोग ‘हम दो हमारे पांच’ पर चलकर जिंदगी की गाड़ी चला रहे हैं।  दो तिहाई जिलों में ऐसे लोगों की संख्या तीस से पैतीस फीसदी के बीच है। प्रदेश में पूर्वांचल के जिलों में बड़ा परिवार को फार्मला जिस तरह लोगों ने अख्तियार किया, उसके कारण कई समस्याओं का जन्म हुआ है।

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

जीवन का नाम है........


रोमिंग जर्नलिस्ट की रिपोर्ट 27
गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है चलना ही जिंदगी है चलती ही जा रही है.. जम्मू से नईदिल्ली जाने के लिए निकली पूजा एक्सप्रेस के कोच में अचानक यह गाना गूंजने लगा। अपनी जिंदगी की भी कहानी इस गाने से काफी मिलती-जुलती होने के कारण देखा तो साइड बर्थ पर सो रहे बीएसएफ के जवान के मोबाइल में यह गाना बज रहा था। नीद से जागने के बाद वह जवान फोन पर बात करने में व्यस्त हो गया। मेरा दिमाग सोच के समंदर में गोते लगाने लगा कि इतनी शार्ट नोटिस पर अमर उजाला के समूह संपादक शशिशेखर ने आखिर क्यों बुलाया है? इस सोच से बाहर निकलले पर टे्रेन की खिडक़ी से बाहर के दृश्य देखने लगा। भगवान भास्कर अस्ताचल की ओर जा रहे थे, टे्रेन पटरियों पर दौड़ रही थी और मेरे दिमाग की पटरी पर भी मेमोरी एक्सप्रेस पटरियां बदल रही थी। ट्रेन की गति धीमी होने लगी और चक्कीबैंक स्टेशन पर ठहर गयी। काशी से कश्मीर आते समय जब यह स्टेशन पड़ा था तो नाम थोड़ा अजीब सा लगा था,पर वापसी की यात्रा में चक्कीबैंक के नाम के साथ अपनत्व का भाव जाग गया। चक्की बैंक स्टेशन पर सेना के जवानों की अच्छी-खासी संख्या हर ट्रेन पर चढ़ती-उतरती है। भारत-पाकिस्तान सीमा पर तैनात जवानों को चक्कीबैंक से मोर्चें पर ले जाने के लिए सेना का विशेष इंतजाम रहता है। ट्रेन ठहरने के साथ बैग-बक्सा के साथ कई जवान ट्रेन में चढ़े, मेरे सामने वाली सीट पर दिल्ली का एक सिंधी परिवार माता रानी के दर्शन करके वापस लौट रहा था तो बगल वाली सीट पर एक जवान अपने सामान के साथ आया। अपना सामान वह बर्थ के नीचे डालकर आराम से बैठ गया। ट्रेन सीटी देकर चल दी, साइड बर्थ पर लेटा नए फौजी साथी को देखकर जय माता दी ..बोलकर फिर पैर पसारकर लेटने की मुद्रा में आ गया। खिडक़ी के बाहर अब अंधेरा पैर पसार चुका था, लोअर बर्थ होने के कारण मैं खिडक़ी के किनारे बैठा था, फौजी साथी से बोला भाई साहब जब आपको सोना होगा बर्थ उठा लीजिएगा..मुझे कोई प्राब्लम नहीं होगी। सर अपनो से क्या प्राब्लम? सेना के जवानों में अपनत्व की भावना जम्मू-कश्मीर में जिस कदर देखने को मिली थी उसका पहले से ही कायल था। सहयात्री की ओर मुखातिब हुआ तो जवान के नेमप्लेट पर निगाह पड़ी.. अशफाक लिखा देखकर बोला भाई आपने सही कहा अपनो से क्या प्राब्लम। परिचय हुआ अपना विजिटिंग कार्ड निकालकर दिया.. पढ़ते हुए अशफाक ने कहा भाई साहब आप जम्मू में पत्रकार हैं। जवाब में हां की मुद्रा में सिर हिलाया, बोला अगर आप बुरा न माने तो पूछ सकता हूं कहां के रहने वाले हैं। काशी से कश्मीर तक की कहानी संक्षेप में सुनायी। अशफाक बोले भाई साहब आपसे मिलकर अच्छा नहीं बहुत अच्छा लगा। हम सोचते थे जवान ही सीमा पर मुस्तैद है, लेकिन आपसे मिलकर ऐसा लगा कि आप लोगों की मुस्तैदी में कोई कोर-कसर नहीं है। इसके बाद सवालों का दौर सा चल पड़ा? कितने दिन से हैं? कहां-कहां गये? ऐसे कई सवालों को लेकर बातचीत के बीच में घड़ी की सुई पर नजर डाली तो रात के नौ बजने को थे। नए साल का पहला दिन लोग नयी खुशियों के साथ नए जोश, नई ऊर्जा के साथ कुछ अच्छा खाते-पीते हुए मनाते हैं ताकि साल की शुरुआत बेहतर हो लेकिन अपने लिए पहली जनवरी को रघुनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन के बाद अचानक नोएडा से आए बुलावो के कारण ऐसी हड़बड़ाहट रही कि लंच करना ही भूल गया और डिनर का भी कुछ अता-पता नहीं था। अशफाक से पूछा भाई पूजा एक्सप्रेस में पेंट्री कार नहीं लगता क्या? जवाब था भाई सरकार के लिए जम्मू जाने वाली ट्रेनों का मतलब होता है कंकड़-पत्थर के बीच रहकर रुखा-सूखा खाकर देश के लिए जान देने के लिए हरदम तैयार रहने वाले जवान, जिनकी जिंदगी में लंच और डिनर में खाए जाने वाले लजीज व्यंजनों की कोई जगह नहीं होती, इसलिए शायद ऐसा कोई इंतजाम नहीं है। लखनपुर बार्डर जब ट्रेन पहुंचेगी तो वहां कुछ खाने को मिल सकता है। ट्रेन दौड़ रही थी कि अचानक साइड में लेटे जवान के मोबाइल में फिर वही गाना बजा..गाड़ी बुला रही है.. सीटी बजा रही है चलना ही जंदगी चलती ही जा रही का गीत बजने लगा। गाजियाबाद के रहने वाले अशफाक इसे सुनकर बोले भाई साहब हम लोगों की जिंदगी का यही नंगा सच है। आज यहां कल वहां.. परसो कहां मालूम नहीं। सही कह रहे हैं, कहकर हुंकारी भरते हुए जम्हाई ली। कुछ देर बात बर्थ खोलने के साथ मैं भी लोअर बर्थ पर कंबल ओढक़र लेट गया। आंखों से नींद गायब थी, नोएडा में शशि शेखर ने क्यों बुलाया है? रह-रहकर यही प्रश्न बार-बार दिमाग में चक्कर लगा रहा था। अमर उजाला जम्मू-कश्मीर में छपी खबरों को लेकर कोई बात होगी या कुछ और? यही कयास लगा रहा था। इसी सब सोच के साथ घड़ी की सुई अपनी गति से भाग रही थी। ठंड के साथ-साथ पेट में कूद रहे चूहे भी नींद की राह में रोड़ा बने हुए थे। लखनपुर रेलवे स्टेशन पर टे्रन ठहरी तो कंबल छोडक़र डिब्बे के गेट के पास पहुंचा कि शायद खाने-पीने का कुछ इंतजाम बन जाये पर प्लेटफार्म पर खड़े खम्भों पर कुछ फ्यूज तो कुछ जल रहे बल्बों के साथ अपने हाथ भी निराशा ही आयी। बैग में रखी पानी की बोतल निकालकर आधा बोतल पानी पेट में डालने के बाद कंबल ओढक़र माता रानी को नाम लेकर लेट गया। जाने कब नींद आ गयी,सबेरे नींद खुली तो सात बजने वाले थे, अशफाक भाई जाग गये थे, पूछा भाई कहां तक आ गये बोले दिल्ली अब दूर नहीं है। दिल्ली दूर नहीं है सुनकर कंबल के भीतर अलसाये शरीर में न जाने कहां से चेतना आ गयी। जागने के बाद फ्रेश होकर सीट पर आने के साथ ही कंबल अपने एयरबैग में लपेटकर रख दिया। तब तक पहले पूजा एक्सप्रेस में अवैध वेंडर चाय-काफी बेचने के लिए आ गये थे। चाय की चुस्की के साथ फिर वही सवाल आखिर शशि शेखर ने क्यों बुलाया है? इसी सवाल के साथ ट्रेन ने निजामुद्ïदीन रेलवे स्टेशन पर आमद दर्ज की। जब तक शशि शेखर से मुलाकात नहीं होती तब तक यही सवाल दिमाग में जवाब तलाशने में लगा था और मैं नोएडा अमरउजाला आफिस जाने के लिए टैक्सी की तलाश में निकल पड़ा।
क्रमश..........

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

हरदोई में गंवई बिजली का सच सुनकर होंगे हैरान

लखनऊ। आजादी के साढ़े छह दशक बाद उत्तर प्रदेश का कितना विकास हुआ? इसको देखने के लिए अगर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में बिजली की पहुंच सिर्फ देखें तो अब तक की सभी सरकारों को शर्म आनी चाहिए। विकास की बड़ी-बड़ी बातें हम चाहे जो करे लेकिन हकीकत यह है कि प्रदेश के कई जिलों में नब्बे फीसदी से ज्यादा गंवई घरों में आज तक बिजली नहीं पहुंची। प्रदेश की राजधानी से सटे हरदोई जिले का हाल सबसे खराब है। यहां तो ९३ फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों के घरों में बिजली अब तक नहीं पहुंची है। दूसरे नंबर पर सीतापुर है। सीतापुर के ग्रामीण इलाकों में ९२ फीसदी घरों में बिजली नहीं है। कमोवेश यही स्थिति उन्नाव,श्रावस्ती,बदायूं,फतेहपुर की भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में नब्बे फीसदी से ज्यादा घरों में आज तक बिजली नहीं पहुंच पायी है।
देश में जनगणना निदेशालय द्वारा बटोरे गये आकड़ें इस बात की गवाही दे रहे हैं कि यूपी के ग्रामीण इलाकों में विकास की रौशनी कितनी पहुंची है? प्रदेश को ऊर्जा मंत्री देने वाले इस जिले का हाल सुनकर हैरानी होगी, यहां के ६.५० फीसदी गंवई घरों में ही बिजली कनेक्शन पहुंच पाया है। राजधानी के पड़ोसी जिले हरदोई का यह हाल जहां हैरान करने वाला है, वहीं सीतापुर का भी हाल बहुत बुरा है। सीतापुर के भी गांवों में बिजली की रौशनी सिर्फ ७.१० प्रतिशत ही पहुंच पायी है। उन्नाव की बात करें तो वहां भी ग्रामीण इलाकों में ८.४० प्रतिशत ही घरों में आज तक बिजली पहुंची है। श्रावस्ती के ९.५० गंवई घरों में बिजली पहुंची है। बहराइच में ९.८० प्रतिशत तो बंदायू में ९.२० प्रतिशत घरों में जहां बिजली है, वहीं फतेहपुर में ९.३० गंवई घरों बिजली से रौशन हो रहे हैं। अस्सी फीसदी गंवई घरों में जिन जिलों में बिजली नहीं पहुंची, उनकी संख्या भी कम नहीं है। औरेया में १७.५० प्रतिशत, बांदा में १४.२० प्रतिशत, बाराबंकी व बरेली में १४.४० प्रतिशत, चित्रकूट में १९.७० प्रतिशत,एटा में १४ फीसदी,फर्रूखाबाद में १५.७०,गाजीपुर में १६ प्रतिशत,गोंडा में १५.१० प्रतिशत,हमीरपुर में १८.१० प्रतिशत,ज्योतिबाफूलेनगर १२.८० प्रतिशत,कन्नौज में १४.२० प्रतिशत,कानपुर देहात में १०.७० प्रतिशत,कानपुर नगर में १५.७० प्रतिशत,कांशीरामनगर में ११ प्रतिशत,कौशाम्बी में १२.५० प्रतिशत, लखीमपुर खीरी में ११.५० प्रतिशत,महोबा में १७.८० प्रतिशत, महोबा में १९.४० प्रतिशत,मैनपुरी में १६.४० प्रतिशत,मुरादाबाद में १४.३० प्रतिशत,पीलीभीत में १४ प्रतिशत,शाहजहांपुर में ११.७० प्रतिशत व सोनभद्र में १७.२० प्रतिशत गंवई घरों में ही बिजली पहुंची है।
बीस से चालीस फीसदी के बीच जिन जिलों के गंवई घरों में बिजली पहुंच गयी है उसमें गोरखपुर में ३१.८० प्रतिशत, बलिया में २०.९०,बस्ती में २५.४०,बिजनौर में ३२.७०, बुलन्दशहर में २५.८०,चंदौली में २७.७०,देवरिया में २७.८०,इटावा में २९.३०, जालौन में २६.१०,जौनपुर में २२.८० प्रतिशत,झांसी में ३०.१०,लखनऊ में ३०.२०,फैजाबाद में २२.९०,फिरोजबाद में २९.३०,अलीगढ़ में २६.६०,इलाहाबाद में ३०.५०,आजमगढ़ में २४.१०, मऊ में ३७.५० ,मिर्जापुर में ३०.७० प्रतिशत,संत कबीरनगर २८ फीसदी, संत रविदासनगर भदोही में ३२.१० प्रतिशत,सिद्घार्थनगर में २२.२० प्रतिशत, सुल्तानपुर में ३४.६० प्रतिशत व वाराणसी में ३९.७० प्रतिशत गंवई घरों में ही बिजली पहुंची है। सूबे के उन जिलों पर नजर डाले जहां के चालीस से साठ प्रतिशत के बीच घरों में बिजली पहुंच गयी है तो उसमें सहारनपुर में ५८.८० प्रतिशत, मथुरा में ५८.५० प्रतिशत, गौतमबुद्घनगर में ५७.१० प्रतिशत,मेरठ में ५६.९० प्रतिशत, बागपत में ५१ फीसदी, महामायानगर में ४३.१०,मुजफ्फरनगर में ४२.९० प्रतिशत,गप्रदेश के उन जिलों पर अगर नजर डाले जहां के साठ फीसदी से ज्यादा गंवई घरों में बिजली पहुंच गयी है तो सबसे ऊपर आगरा का नाम है। आगरा के ग्रामीण क्षेत्रों में ६७.९० प्रतिशत घरों में बिजली पहुंच गयी है। गाजियाबाद में ६४.५० प्रतिशत ग्रामीण घरों में बिजली है।

सोमवार, 21 जनवरी 2013

शौचालय के आंकड़े दिखा रहे हैं शर्मनाक सच

दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। आजादी के बाद इंडिया भले ही शाइनिंग विज्ञापनों में करे लेकिन गांवों में बसे असल भारत में विकास की तस्वीर क्या है? इसको अगर हम उत्तर प्रदेश के ७५ जिलों में घरों में मौजूद शौचालय की संख्या पर नजर डालते हुए देखेंगे तो एक शर्मनाक सच दिखाई पड़ेगा। इस शर्मनाक सच के पीछे छिपा है गांव-देहात में होने वाले बलात्कार का कड़वा सच। उत्तर प्रदेश में पिछले तीन साल में हुए बलात्काल के आंकड़े इस बात के गवाह है कि रेप की घटनाएं सबसे ज्यादा उस ग्रामीण भारत में हुई, जहां मां-बहन हो या बेटी उन्हें शौच के लिए घर से बाहर जाना पड़ता है। घर में शौचालय न होने के कारण खेत-खलिहान में शौच जाने के दौरान ही मां,बहन और बेटियों के साथ वहशी दरिंदें, जिस तरह मुंह काला करते हैं, उस नजरिए प्रदेश के किसी भी जिले का मुंह साफ-सुथरा नहीं है।
प्रदेश के किस जिलें में कितने प्रतिशत घरों में शौचालय न होने के कारण महिलाओं के साथ बदसलूकी की घटनाएं आम बात है। आइए शौचालय के उन आंकड़ों को देखे जो प्रदेश में शर्मनाक सच को दिखा रहे हैं। सबसे पहले बात उस जिले की जहां की रहनुमाई संसद में केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की मुखिया सोनिया गांधी करती है। बात रायबरेली जिले की हो रही है, यहां के सिर्फ १८.३ प्रतिशत घरों में ही शौचालय है। अस्सी प्रतिशत से ज्यादा घरों की महिलाएं शौच के लिए खेत-खलिहान में जाती है। यहीं हाल केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र बाराबंकी का भी है १८.३ प्रतिशत घरों में ही शौचालय है। श्रावस्ती में सबसे कम १२ फीसदी घरों में ही शौचालय है तो गोंडा में १२.५ प्रतिशत, सिद्घार्थनगर में १२.७ प्रतिशत घरों में ही शौचालय है। प्रतापगढ़ मेें १४ फीसदी घरों में ही शौचालय है। संतकबीरनगर में १५ प्रतिशत घरों में शौचालय सुविधा है। बलरामपुर में १५ फीसदी, बहराइच में १५.७ प्रतिशत, बस्ती में १६.४ प्रतिशत,कौशांबी में १६.७,चित्रकूट में १६.५,सुलतानपुर में सिर्फ १६.२ प्रतिशत, कुशीनगर में १७ तथा संतरविदासनगर भदोही में १८.८ प्रतिशत,सीतापुर में १८.३ प्रतिशत, महाराजगंज में १८.८,अंबेडकरनगर में १८.६ प्रतिशत,एटा में १९.८ फीसदी व ललितपुर में १९.४ प्रतिशत घरों में ही शौचालय है। उत्तर प्रदेश के यह वह जिलें हैं, जिनके अस्सी फीसदी घरों की महिलाएं जाड़ा हो या बरसात शौच के लिए बाहर जाने को मजबूर है।
शौचालय के मामले में साठ फीसदी से ज्यादा घरों में जहां शौचालय है उन जिलों की संख्या उत्तर प्रदेश में एक दर्जन भी नहीं है। गाजियाबाद जिले में सबसे ज्यादा ८४.६ प्रतिशत घरों में जहां शौचालय है, वहीं मेरठ में ७४.१ प्रतिशत,गौतमबुद्घनर में ७७.७ प्रतिशत,मुजफ्फरनगर में ६६ प्रतिशत,बिजनौर में ६०.५ प्रतिशत,मुरादाबाद में ६३.२ प्रतिशत,रामपुर में ६६.२ प्रतिशत,बागपत में ६४.७,बरेली में ६२ प्रतिशत,लखनऊ में ६५.६ तो कानपुर में ६३.३ प्रतिशत घरों में शौचालय मौजूद है। तीस से साठ फीसदी के बीच जिन घरों में शौचालय मौजूद है, उनके नाम है वाराणसी, सहारनपुर, झांसी, जालौन, पीलीभीत, फर्रूंखाबाद, ज्योतिबाफूले नगर ,शाहजहांपुर,आगरा,फिरोजाबाद,बुलन्दशहर व मथुरा है। इन जिलों में भी आधे से ज्यादा घरों की महिलाओं को शौच के लिए बाहर जाना पड़ता है। साठ से सत्तर फीसदी घरों में जिन जिलों में शौचालय नहीं है, उनमें हरदोई,लखीमपुरखीरी,उन्नाव, फतेहपुर,बांदा,हमीरपुर,मैनपुरी,औरेया,महोबा,इटावा, कांशीरामनगर,बंदायू,कन्नौज,फैजाबाद,मऊ,गाजीपुर,बलिया,देवरिया,चंदौली,मिर्जापुर,सोनभद्र,इलाहाबाद का भी नाम शुमार है। घरों में शौचालय न होने की यह शर्मनाक तस्वीर शाइनिंग इंडिया के सबसे बड़े सूबे का शर्मनाक सच है।

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

तुलसीदास किये थे काशी में संगीत का श्रीगणेश

दिनेश चंद्र मिश्र
वाराणसी। विश्व प्रसिद्घ धार्मिक नगरी काशी में संगीत परम्परा का श्रीगणेश  राम चरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसी दास ने की थी। काशी में संगीत की व्यावहारिक परम्परा कब शुरु हुअी इस पर विवाद था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय राजनीतिशास्त्र विभाग के प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्र ने अपने शोध से इस विवाद को लगाम लगा दिया है। प्रो. मिश्र ने अपने शोध में पाया है कि तुलसीदास शास्त्रीय संगीत के मर्मज्ञ थे । वह राग, ताल,अलाप और स्वर को साधना जानते थे। उन्होंने महाकाव्य के अतिरिकत रागों में भजन का निर्माण किया। तुलसीदास ने अपनी भकित के माध्यम से शास्त्रीय संगीत को नया आयाम दिया। उनका संगीत ईश्वर को समर्पित तथा निर्गुण एवं सगुण दोनों ही था।
श्रीटाइम्स से बातचीत में प्रो. मिश्र ने कहा कि तुलसी दास द्वारा रचित रागों में बद्ध भजन यह स्पष्ट करते हैं कि काशी में उनके युग में शास्त्रीय संगीत की परम्परा स्थापित हो चुकी थी। प्राप्त रिकार्डों से पता चलता है कि सन् १७०० में काशी में कई संगीतकार थे और संगीत की साधना होती थी । यह युग तुलसी के देहावसान के बाद का है। श्री मिश्र ने कहा कि सन १७४०  के एक भजन संग्रह जिसे पं.राममूर्ति ने संकलित किया था,  उसमें लिखा है कि सभी भजनों पर तुलसीदास और भारतीय सांस्कृतिक साहित्य का प्रभाव था। बहुत से एेसे रागों में उन्होंने भजन संग्रहित किये जो आज दुर्लभ है। तुलसीदास के समय में संकटमोचन और विश्वनाथ मंदिर शास्त्रीय संगीत के केन्द्र थे। तुलसी मंदिर में शास्त्रीय संगीत की चौपाल लगती थी और संगीत के साथ भांग, पान और ठंडई जमती थी। काशी संगीत परम्परा का उदगम स्थल तुलसीदास द्वारा स्थापित संकटमोचन मंदिर था । इस मंदिर के महन्तों ने संगीत की परम्परा को समृद्ध करने में अपनी भूमिका का निर्वाह किया। संकटमोचन संगीत समारोह का व्यवस्थित रुप ८० वर्षों से लगातार चल रहा है। २०१६ में इस संगीत समारोह में १०० वर्ष पूरे होंगे। शोधपत्र में यह भी दावा किया गया है कि संस्कृत साहित्य का उद्गम स्थल भी काशी है। जबसे संस्कृत साहित्य का व्यवस्थित रुप सामने आया तभी से भारतीय संगीत का रुप सुनियोजित हुआ।

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

सियासी सडक़ पर मुलायम का ठोस कदम

सियासी सडक़ पर मुलायम का ठोस कदम
दिनेश चंद्र मिश्र 
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानमण्डल के १२५ वर्ष पूरे होने पर आयोजित उत्तरशती रजत जयंती समारोह के समापन के साथ मीन-मेख निकालने वाले भले ही कुछ कहें लेकिन भविष्य पर नजर रखने वाले सियासत की सडक़ पर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के ठोस कदम की थाप सुन रहे हैं। राजनीति की जिस रोड पर मुलायम सिंह यादव ने कदम रखा है, वह दिल्ली जाती है। कुश्ती के अखाड़े में कभी चरखा दांव चलकर एक से एक पहलवानों को चित्त करने में महारथ हासिल मुलायम ने भविष्य की सियासी सडक़ पर जिस तरह यह सियासी कदम की छाप छोड़ी है, उससे उनके विरोधी जहां भयभीत है, वहीं उनके ऊपर मुरीद होने वाले सियासी खिलाडिय़ों की संख्या कई गुना बढ़ गयी है। दलों की दीवार तोडक़र मुलायम की तारीफ में दिल से कसीदे पढऩे वाले तीन दिनी समारोह के दौरान विधानमंडल के भीतर से लेकर सडक़ तक कई गुना बढ़ गये हैं।
जिस विधानसभा में राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन, गोविन्द वल्लभ पंत, चन्द्रभानु गुप्ता, चौधरी चरण सिंह, बाबू बनारसी दास,हेमवती नंदन बहुगुणा,नारायण दत्त तिवारी जैसे लोग रहें, जो अपने कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण नजीरें कायम की। उसी विधानसभा में मुलायम सिंह यादव की इच्छा का सम्मान करते हुए उनके मुख्यमंत्री पुत्र अखिलेश यादव ने इस समारोह को जो ऊंचाई दी, उसके कायल होने वालों की तादाद में रिकार्ड इजाफा ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी बन गयी। यहीं कमाई ही भविष्य की सियासी सडक़ पर मिशन २०१४ की सफलता के सीढ़ी कहां-कहां बनेगी, इसका अंदाजा नहीं भविष्य में देखा जा सकता है।
प्रदेश सरकार की ओर से उत्तरशती रजत जयंती समारोह को जो भव्यता प्रदान की गयी, ऐसा किसी राजनीतिक दल ने शायद ही सोचा हो। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भले ही अखिलेश यादव बैठे हो लेकिन यह सोच राजनीतिक पुरोद्घा मुलायम सिंह यादव की। आजादी के बाद उत्तर प्रदेश की पहली विधानसभा के कितने सदस्य हमारे बीच मौजूद हैं, यह बात बताने के लिए वर्तमान जनप्रतिनिधियों को भी अपने जेहन पर काफी जोर डालना पड़ता। उत्तर प्रदेश के चार बार मुख्यमंत्री रहने के साथ उत्तराखंड की भी रहनुमाई कर चुके नारायण दत्त तिवारी के साथ राजाराम किसान और कमाल अहमद रिजवी तीन लोगों को जो सम्मान इस समारोह में दिया गया, उसका संदेश बहुत दूर तलक जाएगा। आंध्र प्रदेश के राज्यपाल पद से हटने के बाद सियासी सियापे में चले गए नाराणण दत्त तिवारी को सडक़ से लेकर सदन तक इस समारोह में दिल से जो सम्मान मुलायम के साथ अखिलेश सरकार ने दिया, उसको किसी पैमाने पर नहीं नापा जा सकता है। एनडी तिवारी से राजनीति और विकास का मंत्र सीखने की बात कहकर मुलायम ने जो संदेश दिया, उसको सियासी स्लेट से मिटाना आसान नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश के एक हजार से ज्यादा पूर्व विधायकों को नए साल में इस समारोह में बुलाकर जो सम्मान देने के साथ उनकी इच्छा के अनुरूप मुख्यमंत्री ने पेंशन बढ़ाने, परिवारीजनों को भी पेंशन के दायरे में लाने और कूपन की राशि बढ़ाने के भी आश्वासन दिए। कहने को इस सबका श्रेय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को जाता है, लेकिन समारोह में इसके लिए सबसे ज्यादा धन्यवाद मुलायम को दिया गया। यह धन्यवाद उन सियासी खिलाडिय़ों का था जो आज की तारीख में अपने क्षेत्र में कम दखल नहीं रखते हैं। उनके दिल से निकले शुक्रिया के दो बोल मिशन-२०१४ की मंजिल के सफर में सुहाने ही लगेंगे। भविव्य की ओर देखने वाले मुलायम सिंह यादव ने समारोह के दौरान अपनी संवेदनशीलता दिखाते हुए सर्दी व भूख से मौतों को शर्मनाक बताते हुए खुशहाली और बराबरी के लिए संघर्ष करने का जो संदेश दिया, उससे जनता के दिल में उनकी जगह और मजबूत ही हुई। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को समारोह के समापन मे बुलाने से इसके गौरव में चार चांद लग गए। इसकी एक और खास बात रही कि  मुलायम ने जहां वाहवाही लूटी          वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की शालीनता, विपक्ष से संवाद बनाए रखाने की योग्यता तथा उनकी संवेदनशीलता की भूरि-भूरि प्रशंसा करने में कोई नहीं थका। बिना किसी रागद्वेष के राजनीति के मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष करने में मुलायम सिंह यादव की प्रशंसा करने वालों की कतार और लंबी हो गई।
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

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