रोमिंग जर्नलिस्ट

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

हरदोई में गंवई बिजली का सच सुनकर होंगे हैरान

लखनऊ। आजादी के साढ़े छह दशक बाद उत्तर प्रदेश का कितना विकास हुआ? इसको देखने के लिए अगर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में बिजली की पहुंच सिर्फ देखें तो अब तक की सभी सरकारों को शर्म आनी चाहिए। विकास की बड़ी-बड़ी बातें हम चाहे जो करे लेकिन हकीकत यह है कि प्रदेश के कई जिलों में नब्बे फीसदी से ज्यादा गंवई घरों में आज तक बिजली नहीं पहुंची। प्रदेश की राजधानी से सटे हरदोई जिले का हाल सबसे खराब है। यहां तो ९३ फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों के घरों में बिजली अब तक नहीं पहुंची है। दूसरे नंबर पर सीतापुर है। सीतापुर के ग्रामीण इलाकों में ९२ फीसदी घरों में बिजली नहीं है। कमोवेश यही स्थिति उन्नाव,श्रावस्ती,बदायूं,फतेहपुर की भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में नब्बे फीसदी से ज्यादा घरों में आज तक बिजली नहीं पहुंच पायी है।
देश में जनगणना निदेशालय द्वारा बटोरे गये आकड़ें इस बात की गवाही दे रहे हैं कि यूपी के ग्रामीण इलाकों में विकास की रौशनी कितनी पहुंची है? प्रदेश को ऊर्जा मंत्री देने वाले इस जिले का हाल सुनकर हैरानी होगी, यहां के ६.५० फीसदी गंवई घरों में ही बिजली कनेक्शन पहुंच पाया है। राजधानी के पड़ोसी जिले हरदोई का यह हाल जहां हैरान करने वाला है, वहीं सीतापुर का भी हाल बहुत बुरा है। सीतापुर के भी गांवों में बिजली की रौशनी सिर्फ ७.१० प्रतिशत ही पहुंच पायी है। उन्नाव की बात करें तो वहां भी ग्रामीण इलाकों में ८.४० प्रतिशत ही घरों में आज तक बिजली पहुंची है। श्रावस्ती के ९.५० गंवई घरों में बिजली पहुंची है। बहराइच में ९.८० प्रतिशत तो बंदायू में ९.२० प्रतिशत घरों में जहां बिजली है, वहीं फतेहपुर में ९.३० गंवई घरों बिजली से रौशन हो रहे हैं। अस्सी फीसदी गंवई घरों में जिन जिलों में बिजली नहीं पहुंची, उनकी संख्या भी कम नहीं है। औरेया में १७.५० प्रतिशत, बांदा में १४.२० प्रतिशत, बाराबंकी व बरेली में १४.४० प्रतिशत, चित्रकूट में १९.७० प्रतिशत,एटा में १४ फीसदी,फर्रूखाबाद में १५.७०,गाजीपुर में १६ प्रतिशत,गोंडा में १५.१० प्रतिशत,हमीरपुर में १८.१० प्रतिशत,ज्योतिबाफूलेनगर १२.८० प्रतिशत,कन्नौज में १४.२० प्रतिशत,कानपुर देहात में १०.७० प्रतिशत,कानपुर नगर में १५.७० प्रतिशत,कांशीरामनगर में ११ प्रतिशत,कौशाम्बी में १२.५० प्रतिशत, लखीमपुर खीरी में ११.५० प्रतिशत,महोबा में १७.८० प्रतिशत, महोबा में १९.४० प्रतिशत,मैनपुरी में १६.४० प्रतिशत,मुरादाबाद में १४.३० प्रतिशत,पीलीभीत में १४ प्रतिशत,शाहजहांपुर में ११.७० प्रतिशत व सोनभद्र में १७.२० प्रतिशत गंवई घरों में ही बिजली पहुंची है।
बीस से चालीस फीसदी के बीच जिन जिलों के गंवई घरों में बिजली पहुंच गयी है उसमें गोरखपुर में ३१.८० प्रतिशत, बलिया में २०.९०,बस्ती में २५.४०,बिजनौर में ३२.७०, बुलन्दशहर में २५.८०,चंदौली में २७.७०,देवरिया में २७.८०,इटावा में २९.३०, जालौन में २६.१०,जौनपुर में २२.८० प्रतिशत,झांसी में ३०.१०,लखनऊ में ३०.२०,फैजाबाद में २२.९०,फिरोजबाद में २९.३०,अलीगढ़ में २६.६०,इलाहाबाद में ३०.५०,आजमगढ़ में २४.१०, मऊ में ३७.५० ,मिर्जापुर में ३०.७० प्रतिशत,संत कबीरनगर २८ फीसदी, संत रविदासनगर भदोही में ३२.१० प्रतिशत,सिद्घार्थनगर में २२.२० प्रतिशत, सुल्तानपुर में ३४.६० प्रतिशत व वाराणसी में ३९.७० प्रतिशत गंवई घरों में ही बिजली पहुंची है। सूबे के उन जिलों पर नजर डाले जहां के चालीस से साठ प्रतिशत के बीच घरों में बिजली पहुंच गयी है तो उसमें सहारनपुर में ५८.८० प्रतिशत, मथुरा में ५८.५० प्रतिशत, गौतमबुद्घनगर में ५७.१० प्रतिशत,मेरठ में ५६.९० प्रतिशत, बागपत में ५१ फीसदी, महामायानगर में ४३.१०,मुजफ्फरनगर में ४२.९० प्रतिशत,गप्रदेश के उन जिलों पर अगर नजर डाले जहां के साठ फीसदी से ज्यादा गंवई घरों में बिजली पहुंच गयी है तो सबसे ऊपर आगरा का नाम है। आगरा के ग्रामीण क्षेत्रों में ६७.९० प्रतिशत घरों में बिजली पहुंच गयी है। गाजियाबाद में ६४.५० प्रतिशत ग्रामीण घरों में बिजली है।

सोमवार, 21 जनवरी 2013

शौचालय के आंकड़े दिखा रहे हैं शर्मनाक सच

दिनेश चंद्र मिश्र
लखनऊ। आजादी के बाद इंडिया भले ही शाइनिंग विज्ञापनों में करे लेकिन गांवों में बसे असल भारत में विकास की तस्वीर क्या है? इसको अगर हम उत्तर प्रदेश के ७५ जिलों में घरों में मौजूद शौचालय की संख्या पर नजर डालते हुए देखेंगे तो एक शर्मनाक सच दिखाई पड़ेगा। इस शर्मनाक सच के पीछे छिपा है गांव-देहात में होने वाले बलात्कार का कड़वा सच। उत्तर प्रदेश में पिछले तीन साल में हुए बलात्काल के आंकड़े इस बात के गवाह है कि रेप की घटनाएं सबसे ज्यादा उस ग्रामीण भारत में हुई, जहां मां-बहन हो या बेटी उन्हें शौच के लिए घर से बाहर जाना पड़ता है। घर में शौचालय न होने के कारण खेत-खलिहान में शौच जाने के दौरान ही मां,बहन और बेटियों के साथ वहशी दरिंदें, जिस तरह मुंह काला करते हैं, उस नजरिए प्रदेश के किसी भी जिले का मुंह साफ-सुथरा नहीं है।
प्रदेश के किस जिलें में कितने प्रतिशत घरों में शौचालय न होने के कारण महिलाओं के साथ बदसलूकी की घटनाएं आम बात है। आइए शौचालय के उन आंकड़ों को देखे जो प्रदेश में शर्मनाक सच को दिखा रहे हैं। सबसे पहले बात उस जिले की जहां की रहनुमाई संसद में केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की मुखिया सोनिया गांधी करती है। बात रायबरेली जिले की हो रही है, यहां के सिर्फ १८.३ प्रतिशत घरों में ही शौचालय है। अस्सी प्रतिशत से ज्यादा घरों की महिलाएं शौच के लिए खेत-खलिहान में जाती है। यहीं हाल केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र बाराबंकी का भी है १८.३ प्रतिशत घरों में ही शौचालय है। श्रावस्ती में सबसे कम १२ फीसदी घरों में ही शौचालय है तो गोंडा में १२.५ प्रतिशत, सिद्घार्थनगर में १२.७ प्रतिशत घरों में ही शौचालय है। प्रतापगढ़ मेें १४ फीसदी घरों में ही शौचालय है। संतकबीरनगर में १५ प्रतिशत घरों में शौचालय सुविधा है। बलरामपुर में १५ फीसदी, बहराइच में १५.७ प्रतिशत, बस्ती में १६.४ प्रतिशत,कौशांबी में १६.७,चित्रकूट में १६.५,सुलतानपुर में सिर्फ १६.२ प्रतिशत, कुशीनगर में १७ तथा संतरविदासनगर भदोही में १८.८ प्रतिशत,सीतापुर में १८.३ प्रतिशत, महाराजगंज में १८.८,अंबेडकरनगर में १८.६ प्रतिशत,एटा में १९.८ फीसदी व ललितपुर में १९.४ प्रतिशत घरों में ही शौचालय है। उत्तर प्रदेश के यह वह जिलें हैं, जिनके अस्सी फीसदी घरों की महिलाएं जाड़ा हो या बरसात शौच के लिए बाहर जाने को मजबूर है।
शौचालय के मामले में साठ फीसदी से ज्यादा घरों में जहां शौचालय है उन जिलों की संख्या उत्तर प्रदेश में एक दर्जन भी नहीं है। गाजियाबाद जिले में सबसे ज्यादा ८४.६ प्रतिशत घरों में जहां शौचालय है, वहीं मेरठ में ७४.१ प्रतिशत,गौतमबुद्घनर में ७७.७ प्रतिशत,मुजफ्फरनगर में ६६ प्रतिशत,बिजनौर में ६०.५ प्रतिशत,मुरादाबाद में ६३.२ प्रतिशत,रामपुर में ६६.२ प्रतिशत,बागपत में ६४.७,बरेली में ६२ प्रतिशत,लखनऊ में ६५.६ तो कानपुर में ६३.३ प्रतिशत घरों में शौचालय मौजूद है। तीस से साठ फीसदी के बीच जिन घरों में शौचालय मौजूद है, उनके नाम है वाराणसी, सहारनपुर, झांसी, जालौन, पीलीभीत, फर्रूंखाबाद, ज्योतिबाफूले नगर ,शाहजहांपुर,आगरा,फिरोजाबाद,बुलन्दशहर व मथुरा है। इन जिलों में भी आधे से ज्यादा घरों की महिलाओं को शौच के लिए बाहर जाना पड़ता है। साठ से सत्तर फीसदी घरों में जिन जिलों में शौचालय नहीं है, उनमें हरदोई,लखीमपुरखीरी,उन्नाव, फतेहपुर,बांदा,हमीरपुर,मैनपुरी,औरेया,महोबा,इटावा, कांशीरामनगर,बंदायू,कन्नौज,फैजाबाद,मऊ,गाजीपुर,बलिया,देवरिया,चंदौली,मिर्जापुर,सोनभद्र,इलाहाबाद का भी नाम शुमार है। घरों में शौचालय न होने की यह शर्मनाक तस्वीर शाइनिंग इंडिया के सबसे बड़े सूबे का शर्मनाक सच है।

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

तुलसीदास किये थे काशी में संगीत का श्रीगणेश

दिनेश चंद्र मिश्र
वाराणसी। विश्व प्रसिद्घ धार्मिक नगरी काशी में संगीत परम्परा का श्रीगणेश  राम चरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसी दास ने की थी। काशी में संगीत की व्यावहारिक परम्परा कब शुरु हुअी इस पर विवाद था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय राजनीतिशास्त्र विभाग के प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्र ने अपने शोध से इस विवाद को लगाम लगा दिया है। प्रो. मिश्र ने अपने शोध में पाया है कि तुलसीदास शास्त्रीय संगीत के मर्मज्ञ थे । वह राग, ताल,अलाप और स्वर को साधना जानते थे। उन्होंने महाकाव्य के अतिरिकत रागों में भजन का निर्माण किया। तुलसीदास ने अपनी भकित के माध्यम से शास्त्रीय संगीत को नया आयाम दिया। उनका संगीत ईश्वर को समर्पित तथा निर्गुण एवं सगुण दोनों ही था।
श्रीटाइम्स से बातचीत में प्रो. मिश्र ने कहा कि तुलसी दास द्वारा रचित रागों में बद्ध भजन यह स्पष्ट करते हैं कि काशी में उनके युग में शास्त्रीय संगीत की परम्परा स्थापित हो चुकी थी। प्राप्त रिकार्डों से पता चलता है कि सन् १७०० में काशी में कई संगीतकार थे और संगीत की साधना होती थी । यह युग तुलसी के देहावसान के बाद का है। श्री मिश्र ने कहा कि सन १७४०  के एक भजन संग्रह जिसे पं.राममूर्ति ने संकलित किया था,  उसमें लिखा है कि सभी भजनों पर तुलसीदास और भारतीय सांस्कृतिक साहित्य का प्रभाव था। बहुत से एेसे रागों में उन्होंने भजन संग्रहित किये जो आज दुर्लभ है। तुलसीदास के समय में संकटमोचन और विश्वनाथ मंदिर शास्त्रीय संगीत के केन्द्र थे। तुलसी मंदिर में शास्त्रीय संगीत की चौपाल लगती थी और संगीत के साथ भांग, पान और ठंडई जमती थी। काशी संगीत परम्परा का उदगम स्थल तुलसीदास द्वारा स्थापित संकटमोचन मंदिर था । इस मंदिर के महन्तों ने संगीत की परम्परा को समृद्ध करने में अपनी भूमिका का निर्वाह किया। संकटमोचन संगीत समारोह का व्यवस्थित रुप ८० वर्षों से लगातार चल रहा है। २०१६ में इस संगीत समारोह में १०० वर्ष पूरे होंगे। शोधपत्र में यह भी दावा किया गया है कि संस्कृत साहित्य का उद्गम स्थल भी काशी है। जबसे संस्कृत साहित्य का व्यवस्थित रुप सामने आया तभी से भारतीय संगीत का रुप सुनियोजित हुआ।

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

सियासी सडक़ पर मुलायम का ठोस कदम

सियासी सडक़ पर मुलायम का ठोस कदम
दिनेश चंद्र मिश्र 
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानमण्डल के १२५ वर्ष पूरे होने पर आयोजित उत्तरशती रजत जयंती समारोह के समापन के साथ मीन-मेख निकालने वाले भले ही कुछ कहें लेकिन भविष्य पर नजर रखने वाले सियासत की सडक़ पर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के ठोस कदम की थाप सुन रहे हैं। राजनीति की जिस रोड पर मुलायम सिंह यादव ने कदम रखा है, वह दिल्ली जाती है। कुश्ती के अखाड़े में कभी चरखा दांव चलकर एक से एक पहलवानों को चित्त करने में महारथ हासिल मुलायम ने भविष्य की सियासी सडक़ पर जिस तरह यह सियासी कदम की छाप छोड़ी है, उससे उनके विरोधी जहां भयभीत है, वहीं उनके ऊपर मुरीद होने वाले सियासी खिलाडिय़ों की संख्या कई गुना बढ़ गयी है। दलों की दीवार तोडक़र मुलायम की तारीफ में दिल से कसीदे पढऩे वाले तीन दिनी समारोह के दौरान विधानमंडल के भीतर से लेकर सडक़ तक कई गुना बढ़ गये हैं।
जिस विधानसभा में राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन, गोविन्द वल्लभ पंत, चन्द्रभानु गुप्ता, चौधरी चरण सिंह, बाबू बनारसी दास,हेमवती नंदन बहुगुणा,नारायण दत्त तिवारी जैसे लोग रहें, जो अपने कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण नजीरें कायम की। उसी विधानसभा में मुलायम सिंह यादव की इच्छा का सम्मान करते हुए उनके मुख्यमंत्री पुत्र अखिलेश यादव ने इस समारोह को जो ऊंचाई दी, उसके कायल होने वालों की तादाद में रिकार्ड इजाफा ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी बन गयी। यहीं कमाई ही भविष्य की सियासी सडक़ पर मिशन २०१४ की सफलता के सीढ़ी कहां-कहां बनेगी, इसका अंदाजा नहीं भविष्य में देखा जा सकता है।
प्रदेश सरकार की ओर से उत्तरशती रजत जयंती समारोह को जो भव्यता प्रदान की गयी, ऐसा किसी राजनीतिक दल ने शायद ही सोचा हो। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भले ही अखिलेश यादव बैठे हो लेकिन यह सोच राजनीतिक पुरोद्घा मुलायम सिंह यादव की। आजादी के बाद उत्तर प्रदेश की पहली विधानसभा के कितने सदस्य हमारे बीच मौजूद हैं, यह बात बताने के लिए वर्तमान जनप्रतिनिधियों को भी अपने जेहन पर काफी जोर डालना पड़ता। उत्तर प्रदेश के चार बार मुख्यमंत्री रहने के साथ उत्तराखंड की भी रहनुमाई कर चुके नारायण दत्त तिवारी के साथ राजाराम किसान और कमाल अहमद रिजवी तीन लोगों को जो सम्मान इस समारोह में दिया गया, उसका संदेश बहुत दूर तलक जाएगा। आंध्र प्रदेश के राज्यपाल पद से हटने के बाद सियासी सियापे में चले गए नाराणण दत्त तिवारी को सडक़ से लेकर सदन तक इस समारोह में दिल से जो सम्मान मुलायम के साथ अखिलेश सरकार ने दिया, उसको किसी पैमाने पर नहीं नापा जा सकता है। एनडी तिवारी से राजनीति और विकास का मंत्र सीखने की बात कहकर मुलायम ने जो संदेश दिया, उसको सियासी स्लेट से मिटाना आसान नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश के एक हजार से ज्यादा पूर्व विधायकों को नए साल में इस समारोह में बुलाकर जो सम्मान देने के साथ उनकी इच्छा के अनुरूप मुख्यमंत्री ने पेंशन बढ़ाने, परिवारीजनों को भी पेंशन के दायरे में लाने और कूपन की राशि बढ़ाने के भी आश्वासन दिए। कहने को इस सबका श्रेय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को जाता है, लेकिन समारोह में इसके लिए सबसे ज्यादा धन्यवाद मुलायम को दिया गया। यह धन्यवाद उन सियासी खिलाडिय़ों का था जो आज की तारीख में अपने क्षेत्र में कम दखल नहीं रखते हैं। उनके दिल से निकले शुक्रिया के दो बोल मिशन-२०१४ की मंजिल के सफर में सुहाने ही लगेंगे। भविव्य की ओर देखने वाले मुलायम सिंह यादव ने समारोह के दौरान अपनी संवेदनशीलता दिखाते हुए सर्दी व भूख से मौतों को शर्मनाक बताते हुए खुशहाली और बराबरी के लिए संघर्ष करने का जो संदेश दिया, उससे जनता के दिल में उनकी जगह और मजबूत ही हुई। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को समारोह के समापन मे बुलाने से इसके गौरव में चार चांद लग गए। इसकी एक और खास बात रही कि  मुलायम ने जहां वाहवाही लूटी          वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की शालीनता, विपक्ष से संवाद बनाए रखाने की योग्यता तथा उनकी संवेदनशीलता की भूरि-भूरि प्रशंसा करने में कोई नहीं थका। बिना किसी रागद्वेष के राजनीति के मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष करने में मुलायम सिंह यादव की प्रशंसा करने वालों की कतार और लंबी हो गई।
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.