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शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

तुलसीदास किये थे काशी में संगीत का श्रीगणेश

दिनेश चंद्र मिश्र
वाराणसी। विश्व प्रसिद्घ धार्मिक नगरी काशी में संगीत परम्परा का श्रीगणेश  राम चरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसी दास ने की थी। काशी में संगीत की व्यावहारिक परम्परा कब शुरु हुअी इस पर विवाद था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय राजनीतिशास्त्र विभाग के प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्र ने अपने शोध से इस विवाद को लगाम लगा दिया है। प्रो. मिश्र ने अपने शोध में पाया है कि तुलसीदास शास्त्रीय संगीत के मर्मज्ञ थे । वह राग, ताल,अलाप और स्वर को साधना जानते थे। उन्होंने महाकाव्य के अतिरिकत रागों में भजन का निर्माण किया। तुलसीदास ने अपनी भकित के माध्यम से शास्त्रीय संगीत को नया आयाम दिया। उनका संगीत ईश्वर को समर्पित तथा निर्गुण एवं सगुण दोनों ही था।
श्रीटाइम्स से बातचीत में प्रो. मिश्र ने कहा कि तुलसी दास द्वारा रचित रागों में बद्ध भजन यह स्पष्ट करते हैं कि काशी में उनके युग में शास्त्रीय संगीत की परम्परा स्थापित हो चुकी थी। प्राप्त रिकार्डों से पता चलता है कि सन् १७०० में काशी में कई संगीतकार थे और संगीत की साधना होती थी । यह युग तुलसी के देहावसान के बाद का है। श्री मिश्र ने कहा कि सन १७४०  के एक भजन संग्रह जिसे पं.राममूर्ति ने संकलित किया था,  उसमें लिखा है कि सभी भजनों पर तुलसीदास और भारतीय सांस्कृतिक साहित्य का प्रभाव था। बहुत से एेसे रागों में उन्होंने भजन संग्रहित किये जो आज दुर्लभ है। तुलसीदास के समय में संकटमोचन और विश्वनाथ मंदिर शास्त्रीय संगीत के केन्द्र थे। तुलसी मंदिर में शास्त्रीय संगीत की चौपाल लगती थी और संगीत के साथ भांग, पान और ठंडई जमती थी। काशी संगीत परम्परा का उदगम स्थल तुलसीदास द्वारा स्थापित संकटमोचन मंदिर था । इस मंदिर के महन्तों ने संगीत की परम्परा को समृद्ध करने में अपनी भूमिका का निर्वाह किया। संकटमोचन संगीत समारोह का व्यवस्थित रुप ८० वर्षों से लगातार चल रहा है। २०१६ में इस संगीत समारोह में १०० वर्ष पूरे होंगे। शोधपत्र में यह भी दावा किया गया है कि संस्कृत साहित्य का उद्गम स्थल भी काशी है। जबसे संस्कृत साहित्य का व्यवस्थित रुप सामने आया तभी से भारतीय संगीत का रुप सुनियोजित हुआ।

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